भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 568, कुल 656 में से

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पृष्ठ 568

५६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दृष्टिसे ओझल होकर रहने लगा ॥ ६४ ॥ उस दैत्यराज सिन्धुके इस प्रकारके सम्पूर्ण वृत्तान्तको शीघ्र ही जानकर देव मयूरेशने अपने गणोंसहित उच्च स्वरसे गर्जना की। उस नादने सहसा तीनों लोकोंको निनादित कर डाला ॥ ६५ ॥ तदनन्तर मयूरेशने अपने द्वारा प्रकट किये गये कृतान्तास्त्रको उसी प्रकार समेट लिया, जैसे कि मन्त्रको जाननेवाला सर्पको वापस अपने पास बुला लेता है। इसके पश्चात् वे मयूरेश अपने गणोंको साथ लेकर शीघ्र ही अपने भवनको चले गये ॥ ६६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुदैत्यका अपमान' नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२१ ॥ एक सौ बाईसवाँ अध्याय गौतम आदि महर्षियों तथा भगवान् शिवद्वारा मयूरेशकी महिमा एवं पराक्रमका वर्णन, षडानन आदिका देवर्षि नारदके साथ संवाद, देव मयूरेशका दैत्य सिन्धुसे युद्धके लिये सन्नद्ध होना, किंतु नन्दी, भृंगी आदिका उन्हें रोककर स्वयं युद्धके लिये प्रस्थान करना, वीरभद्र तथा भूतराजका भी साथमें जाना, दैत्य सिन्धुके साथ उनका युद्ध और दैत्यसेनाका पराजित होना ब्रह्माजी बोले-जब देव मयूरेश सिंहासनपर बैठे हुए थे और चारों ओरसे अपने गणोंसे घिरे हुए थे, उस समय गौतम आदि महर्षियोंने वहाँ आकर उन गुणेश्वरकी महिमाका गान किया ॥ १ ॥ ऋषिगण बोले-जिस दैत्यराज सिन्धुने देवराज इन्द्रपर विजय प्राप्त की तथा नागोंसहित पातालमें स्थित शेषनागको जीत लिया, फिर उसके समक्ष अन्य किसी औरकी क्या गणना ! ऐसे सिन्धुदैत्यको भी आपने जीत लिया। हे सुरेश्वर ! आपने उस दुष्ट सिन्धु दैत्यसे बहुतोंकी रक्षा की है, यदि आप ऐसा नहीं करते, तो गणोंका तथा अन्य सभी लोगोंका जीवन कैसे बच पाता ! ॥ २-३ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे जब ऋषिगण उन गुणेश्वरकी कीर्तिका गान कर रहे थे कि उसी समय देवी गिरिजा वहाँ आयीं और अपने पुत्र गुणेशका आलिंगन करके उनसे बोलीं-युद्धकी लालसा रखनेवाले तुम अत्यन्त थक गये हो ॥ ४ ॥ उसी समय शीघ्र ही भगवान् शिव भी वहाँ आये और उन्होंने उन मयूरेशका आलिंगनकर उनसे कहा- जो कार्य देवराज इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी असाध्य था, वह कार्य आपने करके दिखाया है। आप साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं, सम्पूर्ण चराचर जगत्के गुरु हैं, सब कुछ जाननेवाले हैं और पृथिवीके भारको हलका करनेमें सदा निरत रहते हैं, आपकी महिमाको, आपके यथार्थ स्वरूपको ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते हैं और न गौतम आदि मुनि ही भलीभाँति जानते हैं तो उसे जाननेकी सामर्थ्य हममें कैसे हो सकती है ? ॥ ५-७ ॥ ब्रह्माजी बोले-जब देवेश्वर भगवान् शिव इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय मुनिश्रेष्ठ नारदजी माता पार्वतीसे कहने लगे- हे माता ! आप मेरी बात सुनें ॥ ८ ॥ हे शिवे ! इस स्थानपर रहते हुए बहुत दिन व्यतीत हो गये हैं, हे अनघे ! वह अत्यन्त दुष्ट दैत्यराज सिन्धु कब मुक्तिको प्राप्त करेगा ? जिस दैत्य सिन्धुने इन्द्र आदि देवताओंको भी जीत लिया है, उसका विनाश कैसे होगा ? हे सुव्रते ! मयूरेशका विवाह कब होगा ? ॥ ९-१० ॥ हमें आप आज्ञा दीजिये, हम लोग जायँगे, पुनः शीघ्र ही लौट भी आयेंगे। दैत्यराज सिन्धुके बन्धनसे वे देवता कब मुक्त होंगे ? हे माता ! उस दैत्य सिन्धुका वध तो मुझे असाध्य ही प्रतीत होता है ॥ ११-१२ ॥ ब्रह्माजी बोले-देवर्षि नारदजीकी बातोंको सुनकर वे गण और षडानन आदि वीर उन सुरेश्वर देव मयूरेश्वरको उद्बुद्ध करनेके प्रयोजनसे देवदर्शन नारदजीसे कहने लगे- हे मुने ! हे अनघ ! हे नारद ! आश्चर्य है

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