श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 569, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१२२] * गौतम तथा भगवान् शिवद्वारा मयूरेशके पराक्रमका वर्णन * ५६७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
कि आप सर्वज्ञ हैं, तथापि इस प्रकारकी बातें कर रहे हैं। ये प्रभु मयूरेश तो इसी कार्यकी सिद्धिके लिये अपने निज धामसे इस पृथ्वीपर आये हुए हैं ॥ १३-१४॥ ये मयूरेश सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण हैं, सम्पूर्ण पदार्थोंको प्रदान करनेवाले हैं। ये गुणातीत हैं, गुणोंके ईश हैं और सत्त्व-रज तथा तम—इन तीनों गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले हैं, इनके यथार्थ स्वरूपका निरूपण करनेमें ब्रह्मा आदि देव भी सर्वथा असमर्थ हैं, ये पृथ्वीके भारका हरण करनेके इच्छुक हैं, इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी अवध्य महाबलशाली असुरोंका वध करनेमें निरत हैं, ये अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंके नायक हैं, सम्पूर्ण जगत्के आत्मस्वरूप हैं और सभी लोकोंकी उत्पत्ति करनेवाले, पालन करनेवाले और फिर संहार करनेवाले भी ये ही हैं, क्या आप इन मयूरेशके स्वरूपको तथा इनके बल-पराक्रमको नहीं जानते ? ॥ १५-१७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—षडानन आदिकी इस प्रकारकी वाणी सुनकर देवर्षि नारदजी पुनः कहने लगे—जब मैं उस दैत्य सिन्धुको मरा हुआ देखूँगा और मुक्तिको प्राप्त हुआ देखूँगा, तभी मैं सभी वचनोंको सत्य मानूँगा, अन्यथा कभी नहीं ॥ १८-१९ ॥ नारदजीके इस प्रकारके वचनको सुनकर मयूरेश्वर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। वे क्रोधसे उद्दीप्त हो उठे और तीनों लोकोंको निनादित करते हुए गरजे ॥ २० ॥ उस समय वे तीनों लोकोंको जलाते हुए-से और इस पृथिवीको चूर-चूर करते हुए-से मेघके समान गम्भीर वाणीमें उन मुनि नारदजीसे बोले ॥ २१ ॥ मयूरेश बोले—हे मुनीश्वर नारदजी ! आप ब्रह्माजीके पुत्र होनेके कारण और सर्वज्ञ होनेके कारण माननीय हैं, अतः मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी मर्यादाका पालन करें ॥ २२ ॥ मैं आपकी कृपासे क्षणभरमें ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा यमराजको भी निगल जाऊँगा। भूलोकको उलट डालूँगा और सभी सागरोंको सोख डालूँगा। हे मुने ! मैं अपनी निःश्वासवायुसे मेरुको हिला डालूँगा। हे नारदजी ! हे सर्वत्रगामी ! आप मेरी इस सत्य प्रतिज्ञाका इस समय श्रवण करें। मैं उस दैत्य सिन्धुको मार
[दायाँ स्तम्भ]
डालूँगा, इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ २३-२४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर वे विनायक मयूरेश मयूरपर आरूढ़ होकर युद्धके लिये चल पड़े। उसी समय नन्दी तथा भृंगी—दोनोंने उन विनायकसे कहा—हम दोनों युद्ध करेंगे, आप हमारे रणकौशलको देखें ॥ २५-२६ ॥ ऐसा कह करके वे दोनों वायुके समान वेगसे गण्डकीपुरीकी ओर चल पड़े। उन दोनोंके जानेका समाचार सुनकर वीरभद्र तथा भूतराज भी युद्धके लिये निकल पड़े। उस समय धरती काँपने लगी और शेषनाग व्याकुल हो उठे। तदनन्तर कार्तिकेय आदि चारोंने उस दैत्य सिन्धुका वह दुर्ग देखा, जो देवराज इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी दुर्गम था ॥ २७-२८ ॥ उस दुर्गके भीतर एक पलंगपर सुखपूर्वक बैठे हुए दैत्यराज सिन्धुको उसके गुप्तचरोंने बताया कि हे महान् असुर ! पर्वतके समान विशाल आकृतिवाले चार वीर दसों दिशाओंको गुंजायमान करते हुए आपकी नगरीमें चले आये हैं, फिर आप निश्चिन्त क्यों बैठे हुए हैं ? इस प्रकारके वचनोंको सुनकर दैत्यराज सिन्धु क्षणभरमें ही चिन्तासागरमें निमग्न हो गया ॥ २९-३० ॥ सिन्धुपत्नी दुर्गा भी चिन्तासे व्याकुल हो उठी। दैत्य सिन्धुके समान ही उसका मुख भी काला पड़ गया। दोनोंका मुख नीचेको झुक गया और वे उसी क्षण महान् दुःखको प्राप्त हो गये ॥ ३१ ॥ दुर्गा कहने लगी—हे महाराज ! मैंने आपसे जो कुछ कहा था, उसे आपने नहीं किया, उसीका यह सब फल है, अब इस समय चिन्ता करनेसे क्या लाभ ? ॥ ३२ ॥ दुर्गा इस प्रकार बोल ही रही थी कि वे चारों श्रेष्ठ वीर—नन्दी, भृंगी, वीरभद्र और भूतराज राजाके सभामण्डपमें प्रविष्ट हो गये। वह सभामण्डप अनेक प्रकारके आश्चर्योंसे समन्वित था, विविध प्रकारके रत्नों तथा स्वर्णसे उसका निर्माण हुआ था तथा वह अनेक शिखरोंवाला था। क्रुद्ध होकर एकाएक भृंगी उछलकर उस सभामण्डपके बीचमें खड़े हो गये, उन महाबली भृंगीने बलपूर्वक तत्काल उस मण्डपको तोड़ डाला। उस मण्डपके टुकड़े-टुकड़े वहाँ आँगनमें