श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 570, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चारों ओर बिखर गये॥ ३३-३५॥ सिन्धुने सर्पास्त्रको छोड़ा। उन सर्पोंने तीनों योद्धाओंको तदनन्तर वे तीनों वीर-नन्दी, वीरभद्र और भूतराज लपेट लिया, तब भृंगीने उसी समय एकाएक गरुड़ास्त्रका भी उस भृंगीके पास चले गये। युद्धके लिये आविष्ट उन संधान किया। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने आग्नेयास्त्र चलाया, सभीके मुख लालवर्णके हो गये थे और वे सेनासहित यह देखकर भृंगीने पर्जन्यास्त्रको छोड़ा ॥ ४५-४६॥ उस सिन्धुको निगल जानेकी इच्छा रखनेवाले थे ॥ ३६ ॥ तब सिन्धुदैत्यने वायव्यास्त्रका प्रयोग किया तो उन वीरोंका वैसा पराक्रमपूर्ण कर्म देख करके भृंगीने पर्वतास्त्रसे उसका निवारण किया। तदनन्तर नन्दी दैत्यराज सिन्धुकी सेना सामने आ गयी। वह सेना आदि वे चारों वीर उसके साथ बड़े ही मान-सम्मानके खड्ग, ढाल, धनुष-बाण, भाला तथा मुद्गर धारण की साथ क्रमशः मल्लयुद्ध करने लगे। नन्दीने दैत्य सिन्धुके हुई थी। 'मारो, इन चारों महान् वेगशाली वीरश्रेष्ठोंको मस्तकपर स्थित मुकुटको गिरा दिया, भृंगीने अत्यन्त रुष्ट मार डालो', ऐसा कहकर दैत्य सिन्धुके सैनिक उन होते हुए उस दैत्यकी पीठपर प्रहार किया ॥ ४७-४८ ॥ चारोंको मारनेके लिये आये ॥ ३७-३८ ॥ वीरभद्रने उस दैत्यके देखते-देखते उसकी भार्याके दैत्यराज सिन्धुके असंख्य सैनिक बड़े ही उत्साहसे बाल पकड़ लिये और भूतराजने वैरभावका स्मरण करके उन चारों वीरभद्रादिके साथ युद्ध करने लगे। 'मैं तुम्हें उस सिन्धुदैत्यको लातोंसे मारा। दैत्य सिन्धुकी पत्नी मारता हूँ, तुम मुझे मारो'-इस प्रकार कहते हुए दुर्गानि अपने नेत्र बन्द कर लिये, वह उस प्रकारकी [वीरोंका] वहाँ महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥ ३९ ॥ दुर्गति को प्राप्त अपने पतिको वैसी स्थितिमें देख न सकी। तदनन्तर दैत्यसेनाका उन चारोंके साथ भीषण वह अपने पतिके कर्मोंकी निन्दा करती हुई अपने भवनके संग्राम होने लगा। उठनेवाली धूलिके कारण वहाँ लिये पलायित हो गयी ॥ ४९-५० ॥ अन्धकार छा गया था, उस अन्धकारमें वे योद्धागण दैत्य सिन्धु भी अत्यन्त आवेशमें आ गया। उसने शस्त्रोंके चमचमाते प्रकाशमें युद्ध कर रहे थे ॥ ४० ॥ वीरभद्रका पाँव पकड़ लिया। नन्दीको मुष्टिकाके प्रहारसे उस युद्धमें नन्दी आदि चारों वीरोंने सैकड़ों करोड़ मारा और भृंगीकी चोटी पकड़कर जमीनपर गिरा दिया। दैत्योंको मार डाला। उन्होंने अपने ओजसे असंख्य भूतराज मूर्च्छित हो गये। तब दैत्यराज सिन्धु पुनः मुकुट महावीर दैत्योंका पाँव पकड़कर उन्हें भूमिपर पटक धारणकर और गलेमें मोतियोंकी माला पहनकर एक उत्तम दिया। फिर उन दैत्योंको बार-बार घुमाकर आकाशमें घोड़ेपर सवार हुआ और शेष बचे हुए सैनिकोंको बुलाकर फेंक दिया। वहाँसे जमीनपर गिरकर उनके सौ-सौ उनसे बोला- 'आज मैं उस मयूरेशको मार डालूँगा', ऐसा टुकड़े हो गये ॥ ४१-४२ ॥ कहकर वह पुनः युद्धके लिये चल पड़ा ॥ ५१-५३ ॥ उस युद्धभूमिमें बाणोंसे, विविध अस्त्रोंसे, शस्त्रोंसे, दैत्य सिन्धुने दिशाओं तथा विदिशाओंको गुंजायमान पाँवके प्रहारसे और हाथकी चोटसे दैत्योंकी उस सम्पूर्ण करते हुए गर्जना की। उस समयतक नन्दी आदि चारों सेनाका उन्होंने विनाश कर दिया ॥ ४३ ॥ वीर गणनायक मयूरेशके पास जा चुके थे, उन्होंने तदनन्तर वीरभद्र आदि वे चारों वीर वेगपूर्वक बताया कि दैत्यसेनाके सभी वीरोंको उन्होंने नष्ट कर दैत्यराज सिन्धुके भवनमें जाकर पलंगपर बैठे हुए उस डाला है। हे गणेश्वर ! उस सिन्धु दैत्यको भी हम सिन्धु दैत्यके बाल पकड़कर उसे विजयके स्मारक रणभूमिमें ले आये हैं। वह थोड़ी-सी सेनाके साथ है। स्तम्भके रूपमें रणक्षेत्रमें ले आये ॥ ४४ ॥ आप उसे इस भवसागरसे मुक्त कर दें। हे विघ्नराज ! तदनन्तर दैत्यराज सिन्धुने अपने महान् अस्त्रोंके आपकी आज्ञा नहीं थी, नहीं तो हम ही उसे मार द्वारा उन नन्दी आदिके साथ युद्ध किया। दैत्यराज डालते ॥ ५४-५६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुकी सेनाके संहारका वर्णन' नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२२ ॥