भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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क्री०ख०-अ०१२३ ] * देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम * ५६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ तेईसवाँ अध्याय देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम, मयूरेशका विराट्स्वरूप धारण करना, पुनः लघुस्वरूपमें होकर मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित परशुद्वारा सिन्धुका वध करना, शिव-पार्वती तथा देवोंका उपस्थित होना और मयूरेशस्तोत्रद्वारा स्तुति करना

ब्रह्माजी बोले- दैत्यराज सिन्धु आ गया है, यह समाचार सुनकर वे मयूरेश आनन्दित हो गये और अपने वाहन मयूरपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही युद्धके लिये निकल पड़े। वे अपने हाथोंमें धारण किये हुए चार आयुधोंसे सभी दिशाओं-विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उन्होंने प्रलयकालीन मेघोंकी गर्जनाके समान गर्जना करते हुए आकाशको निनादित कर डाला॥ १-२॥ उन्होंने देखा कि युद्ध करनेके निश्चयसे दैत्य सिन्धु आगे खड़ा है, वह दैत्य सिन्धु भी इन्हें युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें उपस्थित देखकर बार-बार उसी प्रकार उन्हें देखने लगा, जैसे हाथी सिंहको देखता है, सर्प गरुड़को देखता है, मधु और कैटभ दैत्योंनै जैसे भगवान् विष्णुको देखा था, त्रिपुरासुरने जैसे पार्वतीपति भगवान् शंकरको देखा और जैसे शुम्भ तथा निशुम्भ राक्षसोंने महाबलशालिनी जगदम्बाको देखा था। तदनन्तर विविध प्रकारके शस्त्रोंसे उन दोनों मयूरेश और दैत्य सिन्धुमें परस्पर युद्ध हुआ॥ ३-५॥ उस समय उन दोनोंकी देह रक्तसे सनी होनेके कारण जपापुष्पके समान लाल रंगकी हो गयी। उन दोनोंके शस्त्रोंके परस्पर आघातसे उत्पन्न अग्निने पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको जला डाला॥ ६॥ उस समय सागर, द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने एक बाण हाथमें लिया और उसे आग्नेयास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रितकर रणांगणमें उपस्थित उन देव मयूरेशको जला डालनेके लिये छोड़ा। वह अग्निबाण उस देवसेनाको जलाते हुए दसों दिशाओंकी ओर चला॥ ७-८॥ तदनन्तर तीनों लोकोंको कम्पित करते हुए मयूरेशने अपने पाश नामक आयुधको मेघास्त्रसे संयोजितकर दैत्यसेनापर छोड़ा। उस मेघास्त्रने जलधाराओंकी वर्षा

करते हुए आग्नेयास्त्रसे उत्पन्न अग्निको शान्त कर डाला। तब अत्यधिक अन्धकारके द्वारा दसों दिशाएँ व्याप्त हो गयीं॥ ९-१०॥ उन वेगशाली जलधाराओंने पर्वतोंको चूर-चूर कर डाला, वृक्षोंके समूहके समूह टूट पड़े। क्या यह प्रलय हो गया ? इस प्रकारसे वह दैत्यराज सिन्धु सोचने लगा। तब दैत्य सिन्धुने पवनास्त्रका प्रयोग करके उन जलवृष्टि करनेवाले मेघोंको तितर-बितर कर दिया। उस वायुने आकाशमण्डल तथा दसों दिशाओंको कम्पित कर डाला॥ ११-१२॥ तदनन्तर देव मयूरेशने अपने हाथमें धारण किये हुए कमलको पर्वतास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसे उस महान् दैत्यके ऊपर छोड़ दिया॥ १३॥ उस पर्वतास्त्रने वृक्षोंको उखाड़ डाला और दसों दिशाओं तथा आकाशको उद्भासित कर दिया, फिर वह अस्त्र दैत्यसेनाके मध्यमें गया और उसने बहुत-से पर्वतोंको प्रकट कर डाला। उत्पन्न हुए असंख्य बड़े- बड़े पर्वतोंने सारी पृथ्वीको आच्छादित कर डाला। उस समय न कहीं ठहरनेके लिये स्थान रह गया था और न कहीं जानेके लिये ही मार्ग बच गया था॥ १४-१५॥ पवनास्त्रको निष्प्रभाव हुआ देखकर और सभी ओर पर्वतोंको व्याप्त देखकर दैत्य सिन्धुने वज्रास्त्रको प्रेरित किया, जिससे असंख्य वज्र निकल पड़े॥ १६॥ उन असंख्य वज्रोंने पर्वतोंको चूर-चूर कर डाला। यह देखकर देव मयूरेशने अपने आयुध अंकुशको वज्रास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उन वज्रोंपर उसे चला दिया। तब दोनों ओरसे वज्रयुद्ध होने लगा। उन वज्रोंके टकरानेकी ध्वनिसे पृथ्वी कम्पित हो उठी और पाताल, सभी दिशाएँ तथा आकाश भी प्रकम्पित हो उठा॥ १७-१८॥