श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 573, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१२३] * देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम * ५७१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
प्रसन्नताके साथ देव मयूरेशकी स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥ सभी बोले-जो परब्रह्मस्वरूप, चिदानन्दमय, सदानन्दरूप, देवेश्वर, परमेश्वर, गुणोंके सागर, गुणोंके स्वामी तथा गुणोंसे अतीत हैं, उन आदि ईश्वर मयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ३९ ॥ जो एकमात्र विश्ववन्द्य और एकमात्र परम ओंकारस्वरूप हैं, जो गुणोंके परम कारण एवं निर्विकल्प हैं, उन जगत्के पालक, संहारक एवं उद्धारक आदि- मयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं। जो महादेवजीके पुत्र, महान् दैत्योंके नाशक, महापुरुष, सदा विघ्नविनाशक तथा सदैव भक्तोंके पोषक हैं, उन परम ज्ञानके कोष आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४०-४१ ॥ जिनका कोई आदि नहीं है, जो समस्त गुणोंके आदिकारण तथा देवताओंके भी आदि-उद्भावक हैं, पार्वतीदेवीको महान् सन्तोष देनेवाले तथा सबके द्वारा सदा ही वन्दनीय हैं, उन दैत्यनाशक एवं भोग तथा मोक्षके प्रदाता आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४२ ॥ जो परम मायावी (मायाके अधिपति) और मायावियोंके लिये भी अगम्य हैं, महर्षिगण जिनका सदा ध्यान करते हैं, जो अनादि आकाशके तुल्य सर्वव्यापक हैं, जीवमात्रके स्वामी हैं तथा जिनके असंख्य अवतार हैं, उन आत्मतत्त्वविषयक अज्ञानके नाशक आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४३ ॥ जो अनेकानेक क्रियाओंके कारण हैं, जिनका स्वरूप श्रुतियोंके लिये भी अगम्य है, जो वेदबोधित अनेकानेक कर्मोंके आदिबीज हैं, समस्त कार्योंकी सिद्धिके हेतु हैं तथा देवेन्द्र आदि जिनकी सदा सेवा करते हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४४ ॥ जो महाकालस्वरूप हैं, लव-निमेष आदि भी जिनके ही स्वरूप हैं, जो कला और कल्पस्वरूप हैं तथा जिनका स्वरूप सदा ही अगम्य है, जो लोगोंके ज्ञानके हेतु तथा मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं। महेश्वर आदि देवता सदा जिनके चरणोंकी सेवा करते हैं, जो योगियोंके नित्य रक्षक, चित्स्वरूप, निरन्तर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और करुणाके सागर हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४५-४६ ॥ हे सुरश्रेष्ठ ! आप सदा भक्तजनोंके लिये हठात् परमानन्दमय सुख देनेवाले हैं; क्योंकि आप संसारके जीवोंपर शीघ्र परम करुणाका विस्तार करते हैं। हे प्रभो ! काम-क्रोधादि छः प्रकारकी ऊर्मियोंके वेगको शान्त कीजिये; क्योंकि आपके अनन्त सुखदायक भजनकी अपेक्षा मुक्ति भी स्पृहणीय नहीं है। हे गजानन ! क्या हम आपके योग्य कोई उत्तम या सुन्दर स्तवन कर सकते हैं ? आप समस्त गुणोंकी निधि और सम्पूर्ण जगत्के प्रेमपात्र हैं। आपके गुणसमूहोंका वर्णन करनेकी शक्ति हममें नहीं है। आपका जो यह जगत्की सृष्टि-रचनाका क्रम है, वह समुद्रके समान अपार है ॥ ४७-४८ ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर वे सभी बड़े ही आदरपूर्वक उनसे निवेदन करने लगे- हे मयूरेश ! जो आपने कहा था, उस महान् वचनका आपने पालन किया ॥ ४९ ॥ सभी देवसमूहोंके लिये यह महादैत्य सिन्धु अवध्य था, उसे आज आपने मार गिराया है। उसी समय वहाँ पार्वती आयीं और वे बड़ी आनन्दित हुईं, उन्होंने उन मयूरेशका आलिंगन किया। भगवान् शिव भी वहाँ आये और उन्होंने मयूरेशका आलिंगनकर उनसे कहा-हे वत्स ! तुमने बहुत अच्छा कर्म किया है, अब सम्पूर्ण त्रिलोकी हर्षित हो गयी है ॥ ५०-५१ ॥ सभी देवताओंके लिये भी जो असाध्य था, उस दैत्य सिन्धुका तुमने वध किया है, फिर भी तुम्हें कोई श्रम मालूम नहीं हुआ, तुम महापराक्रमशाली हो, सभी लोगोंकी रक्षामें निरत रहते हो, चारों वेद भी तुम्हारे यथार्थ स्वरूपका निरूपण कर पानेमें असमर्थ हैं और तुम सभी विद्याओंके निधान हो। इस प्रकारसे कहनेके अनन्तर वे सभी सम्मानित होकर अपने स्थानोंको चले