भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 574, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 574

५७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

गये। मयूरेशको प्रणाम करनेके अनन्तर जब वे सभी | विजय प्राप्त होती है। वह अत्यन्त दुर्लभ ऐश्वर्यको प्राप्त देवता जाने लगे तो देव मयूरेश उनसे बोले—जो इस | करता है, पुत्रवान् होता है, धन-सम्पत्ति प्राप्त करता है स्तोत्रका पाठ करता है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त | और सबको अपने वशमें कर लेता है॥ ५५-५६॥ कर लेता है॥ ५२-५४॥ ब्रह्माजी बोले—मयूरेशके द्वारा ऐसा कहे जानेपर इस स्तोत्रका एक हजार बार पाठ करनेसे कारागृहमें | देवगणोंने उनके कथनका 'साधु-साधु' ऐसा कहकर बन्द बन्दीजनको वहाँसे मुक्ति प्राप्त होती है। इस | समर्थन किया और मयूरेशसे जानेकी आज्ञा प्राप्त करके स्तोत्रका दस हजार बार पाठ करनेसे मनुष्य जो असाध्य | वे देवता चले गये और देव मयूरेशने भी अपने गणोंके भी है, उसे तत्क्षण ही सिद्ध कर लेता है। उसे सर्वत्र | सहित अपने धामको प्रस्थान किया॥ ५७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुके वधका वर्णन' नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२३॥

एक सौ चौबीसवाँ अध्याय सिन्धु-वधके अनन्तर माता-पिता तथा पत्नीका करुण विलाप, पत्नी दुर्गाका सती होना, पिता चक्रपाणिके द्वारा मयूरेशकी स्तुति और उनसे गण्डकीनगरमें चलनेके लिये प्रार्थना करना, शिव-पार्वती तथा गणों एवं मुनियोंसहित मयूरेशका गण्डकीनगरके लिये प्रस्थान

ब्रह्माजी बोले—युद्धभूमिमें दैत्यराज सिन्धुके गिर | हमलोग रो रहे हैं। देवताओंको मरा हुआ देखकर जानेपर जो बचे हुए योद्धा थे, वे वापस गण्डकीनगरमें | पार्वतीका पुत्र वह मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्धस्थलमें चले आये और यहाँ उन्होंने देखा कि दैत्य सिन्धुकी | आया, उसने अपने अस्त्रोंके द्वारा दैत्यराज सिन्धुके माता उग्रा, पत्नी दुर्गा तथा उसके पिता चक्रपाणि | अस्त्रोंको रोककर तीक्ष्ण परशुको छोड़ा॥ ६-७॥ अत्यन्त चिन्तामग्न तथा बहुत व्याकुल होकर पड़े हुए | उस परशुके आघातसे सिन्धु मृत्युको प्राप्त होकर थे, उस समय उन लोगोंको अनेक प्रकारके अपशकुन | भूमिपर गिर पड़े। वहाँ उन दैत्य सिन्धुके सभी सैनिक भी दिखायी देने लगे॥ १-२॥ | तथा नगरनिवासीजन भी मूर्च्छित हो गये॥ ८॥ उन्होंने देखा कि कोई व्यक्ति अशुभकी सूचना देता | दूतोंके मुखसे इस प्रकारकी बात सुनकर वे सभी हुआ उत्तरकी ओर सिर करके सोया हुआ है। कोई अपने | रोने लगे। दैत्य सिन्धुकी पत्नी दुर्गा अत्यन्त विलाप करने दोनों घुटनोंके बीच सिर रखकर बैठा था और बिना कुछ | लगी और जोर-जोरसे सिर पीटने लगी॥ ९॥ बोले चुपचाप हिलता हुआ-सा प्रतीत हो रहा था॥ ३॥ | उसके केश बिखर गये, वह अपने मुखको बार- कोई स्त्री खिन्न-सी होकर अपनी ठुड्डीमें हथेलीको | बार पीटने लगी, उसके आभूषण गिर गये थे। उस समय टिकाकर बैठी हुई है, उसी समय यमदूतोंके समान कुछ | सिन्धुदैत्यकी माता उग्रा, पिता चक्रपाणि तथा समस्त दूत वहाँ आये, उन दूतोंका मुख अत्यन्त मुरझाया हुआ | पुरवासी रो-रोकर अपने हाथसे मुख पीटने लगे। वे था, उनकी स्थिति दयनीय थी, वे कुछ बोल नहीं रहे | अपना सिर जमीनपर पटक-पटककर जोर-जोरसे चिल्लाते थे, मौन थे। उनसे पूछे जानेपर उनमेंसे कुछ दूसरे दूतोंने | हुए भूमिपर लोटने लगे॥ १०-११॥ युद्धमें जो हुआ, वह समाचार बताते हुए कहा॥ ४-५॥ | कोई-कोई दुखी होकर धूलको अपने मुखपर तथा दूत बोले—असंख्य महान् वीरोंका वध करनेके | सिरपर उछालने लगा, कोई अपनी हथेलीके पृष्ठभागोंको अनन्तर दैत्यराज सिन्धु हम बालकोंको असहाय छोड़कर | दाँतसे काटने लगा और उनसे जमीन पीटने लगा। स्त्रियाँ स्वर्गको प्राप्त हो गये हैं, इसी कारण उनके विरहमें | अपनी अँगुलियोंको तोड़-मरोड़कर गिरिजाके पुत्र उस