भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 575, कुल 656 में से

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पृष्ठ 575

क्री०ख०-अ०१२४ ] * सिन्धु-वधके अनन्तर माता-पिता तथा पत्नीका करुण विलाप * ५७३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मयूरेशको शाप देने लगीं ॥ १२ ॥ उग्रा बोली—[हे वत्स !] मैंने विविध प्रकारके प्रयत्नों, कठोर तपस्या, भगवान् सूर्यकी प्रसन्नता, उन्हें नमन करने, उनकी स्तुति करने, विविध प्रकारके उपवासों तथा सभी प्रकारके दानोंको देनेके अनन्तर बहुत समयके बाद किसी प्रकार तुम्हें प्राप्त किया है, अरे शूर ! अरे मानी ! इस समय तुम्हें कौन ले गया है ? ॥ १३ ॥ तुम्हारे तीनों लोकोंके नायक होनेसे मैं भी तीनों लोकोंमें प्रशंसनीय थी, लेकिन अब इस समय लोग मुझे 'तुम भाग्यहीन हो' इस प्रकार कहकर उलाहना देंगे ॥ १४ ॥ पूर्वकालमें तुमने यमराजको जीत लिया था, फिर आज कैसे उनसे मिलना हो गया है ? हे पुत्र ! आज पुनः तुमने उसको कैसे नहीं जीत लिया ? ॥ १५ ॥ हे पुत्र ! तुम्हारे स्वर्गलोक चले जानेपर पार्वतीके पुत्र उस मयूरेशकी इच्छा पूर्ण हो गयी है। मुझसे बिना पूछे ही तुम सुख देनेवाले उस स्वर्गलोकको क्यों चले गये हो ? हे पुत्र ! मुझे दुखी देखकर तुम किस प्रकार सन्तोष प्राप्त कर सकोगे ? हे पुत्र ! जब तुम गर्जना करते थे तो भयभीत होकर मेघ गरजना छोड़ देते थे, किंतु हे पुत्र ! वही आज तुम रणांगणमें कैसे शान्त होकर गिरे पड़े हो ? ॥ १६-१७१/२ ॥ दुर्गा बोली—वेदोंके विधानके अनुसार विधाताने हम दम्पतीका शरीर दो होनेपर भी एक तो बनाया है, किंतु उस मूढ़बुद्धि ब्रह्माने प्राणोंकी एकता क्यों नहीं बनायी ? सौभाग्यके अभिमानसे गर्वित होकर मैं अपने सामने शची तथा सावित्रीको भी कुछ नहीं गिनती थी, फिर वही आज मैं विधवा कैसे हो गयी हूँ ? [हे स्वामिन् !] आप जब अपने हाथसे मेरे अंगोंमें कस्तूरी तथा चन्दनका लेप लगाते थे, तभी मेरे अंग शीतल होते थे, किंतु इस समय शोकाग्निके द्वारा वे सभी अंग दग्ध हो रहे हैं, उन्हें आप शीतलता प्रदान करें ॥ १८-२१ ॥ पहले तो आप मेरे बिना अणुमात्र विषका भी सेवन नहीं करते थे, फिर आप आज मेरे बिना स्वर्गके उस सुखका कैसे भोग कर रहे हैं ? ॥ २२ ॥ जो सज्जन होते हैं, सबके साथ समान व्यवहार करनेवाले होते हैं, वे बिना अपराधके अपने सेवककी उपेक्षा नहीं करते हैं, फिर आप क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ? देवताओंका भी अन्त करनेवाले हे स्वामिन् ! आपने पूर्वकालमें बिना गुणोंकी अपेक्षा रखते हुए मुझसे विविध प्रकारका निश्छल प्रेम किया है, फिर इस समय उस अवर्णनीय प्रेमका परित्यागकर आप क्यों चले गये हैं ? ॥ २३-२४ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर तपोवृद्ध तथा ज्ञानवृद्ध-जन यह कठोर वचन कहकर उनको समझाने लगे कि धर्मशास्त्रको जाननेवाले विद्वान् मृत्युके अनन्तर रोनेकी प्रशंसा इसलिये नहीं करते हैं कि मित्र तथा सम्बन्धीजनोंके जो आँसू निकलते हैं, वे निश्चित ही प्रेतके मुखमें पड़ते हैं, अतः उस मृत व्यक्तिका हित करनेवाले दयावान्‌को चाहिये कि उस प्रेतके लिये जो हितकारी कर्म है, उसे सम्पन्न करे* ॥ २५-२६ ॥ विचार करनेपर यह सुनिश्चित होता है कि उन कृपालु, निर्गुण, चिदानन्दघन, ब्रह्मस्वरूप मयूरेशने दैत्य सिन्धुको भी मोक्ष ही प्रदान किया है। संसारका कल्याण करनेवाले उन मयूरेशने जीवोंपर दया करनेके लिये ही शरीर धारण किया है और उन्होंने युद्धमें सम्मुख उस सिन्धुका वध करके उसे मोक्ष प्रदान किया है ॥ २७-२८ ॥ आत्मा अनादि है, निर्गुण है और नित्य है, इसलिये उसकी न तो मृत्यु होती है और न कभी उसका जन्म ही होता है, ऐसा वेदमें निश्चित किया गया है ॥ २९ ॥ व्यक्ति अपने स्वार्थवश ही मृत व्यक्तिके लिये रोता है, वह उसका हित नहीं चाहता। असंख्य प्राणियोंके भारको वहन करनेवाली पृथिवी, कूर्म, वराह तथा पृथ्वीको

  • ब्रह्मोवाच तपोवृद्धा ज्ञानवृद्धाः प्राब्रुवन्निष्ठुरं वचः । न रोदनं प्रशंसन्ति धर्मशास्त्रविदो जनाः ॥ यदश्रु सुहृदामास्ये प्रेतस्य तत्पतेद् ध्रुवम् । तस्मात्तस्य हितं यत्स्यात्तत्कर्तव्यं दयावता ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १२४ । २५-२६)