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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 576, कुल 656 में से

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पृष्ठ 576

५७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

धारण करनेवाले शेषनाग—ये सब प्रेतका भार सहन नहीं कर पाते। वृद्धजनोंद्वारा इस प्रकारसे कहा जानेपर वे लोग तब शोकमुक्त हुए ॥ ३०-३१ ॥ तदनन्तर दैत्य सिन्धुकी माता उग्रा, पिता चक्रपाणि, अपनी सखियोंके साथ भार्या दुर्गा तथा गण्डकीनगरके निवासी जन—ये सभी शोक करते हुए युद्धस्थलमें गये। वहाँ उन्होंने रणभूमिमें पड़े हुए सिन्धुको देखा, जिसे सेवक पंखा झल रहे थे, उसका मुखरूपी कमल फैला हुआ था और उसके नेत्र सफेद हो चुके थे ॥ ३२-३३ ॥ उसके शरीरसे रक्त प्रवाहित हो रहा था और दुर्गन्ध भी आ रही थी। वहाँ मांसभक्षी पक्षी तथा हिंसक पशु भरे हुए थे। उसके माता-पिता, पत्नी तथा वे सभी नगरनिवासी उसे चारों ओरसे घेरकर बैठ गये, वे अत्यन्त दुखी तथा शोकसे व्याकुल थे ॥ ३४ ॥ अपने स्वामी दैत्य सिन्धुका सिर अपनी गोदमें रख करके उसकी भार्या दुर्गा बड़े जोरसे चिल्लाती हुई शोक मनाने लगी। हे नाथ ! पहले मैं अपने दोनों हाथोंसे आपके पैर दबाया करती थी, किंतु यहाँ लोगोंके सामने ऐसा करना सम्भव नहीं है, अतः हे प्राणनायक ! हे वीर ! आप उठें, शत्रुके जिन्दा रहते आप कैसे निद्रामें सो गये हैं ? ॥ ३५-३६ ॥ तदनन्तर अपने पतिके मुखमें अपना मुख रखकर वह विलाप करते हुए हाहाकार करने लगी। तब वृद्धजनों एवं ज्ञानीजनोंने उसे ऐसा करनेसे रोका। तत्पश्चात् दैत्य सिन्धुकी माता उग्रा तथा पिता चक्रपाणि—दोनों उसके मुखको धोने लगे और फिर उससे बोले—अरे वत्स ! उठो, शत्रुगणोंके जीवित रहते, क्यों सो रहे हो ? ॥ ३७-३८ ॥ वज्र धारण करनेवाले देवराज इन्द्रके वज्रसे आहत हुएके समान तुम भूमिपर गिरे पड़े हो। इस समय उस छोटे-से बालक मयूरेशके साथ युद्ध करनेपर तुम कैसे भूमिपर गिर पड़े ? ॥ ३९ ॥ तुमने तो अपनी भौंहोंके इशारेमात्रसे यमराजको भी जीत लिया था, फिर तुम आज कैसे उस यमके वशमें आ गये ? हे विभो ! हमारे हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले कुछ वचनोंको तो तुम बोलो ॥ ४० ॥ हे अनघ ! पूर्वकालमें जिसके शब्दसे तीनों लोक भी काँप उठते थे, फिर आज हे अमन्द पराक्रमवाले वही तुम वह शब्द क्यों नहीं बोल रहे हो ? ॥ ४१ ॥ हम लोगोंने तुम्हारा कोई ऐसा अपराध भी नहीं किया है कि जिस कारण तुम मौन हो गये हो। लगता है कि तुम क्रोधके कारण ही अपनी समस्त सेनाके साथ हमसे कुछ नहीं बोल रहे हो ॥ ४२ ॥ जिसने अपनी कान्तिसे कामदेवको भी जीत लिया था, वही तुम आज किस प्रकार विह्वलताको प्राप्त हो रहे हो ? तदनन्तर विद्वज्जनों तथा वृद्धजनोंने अनेक प्रकारके उदाहरणोंद्वारा रोते हुए उन उग्रा तथा चक्रपाणि आदिको आश्वस्त किया और धीरज बँधाया। साथ ही यह भी कहा कि जो मर गया है, उसके पीछे स्वयं मर जाना ठीक नहीं है, क्या दशरथके पुत्र श्रीराम परलोकमें नहीं गये ? क्या अपने पराक्रमके बलपर शत्रुओंको जीतनेके अनन्तर रघुश्रेष्ठ श्रीराम परलोक नहीं गये। अन्य और भी सैकड़ों राजा उनके लिये युद्धभूमिमें मृत्युको प्राप्त हुए और अब वे अनेक प्रकारकी अपनी कीर्तिको स्थापित करके स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक स्थित हैं ॥ ४३-४५ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर उन सभीने विल्व तथा चन्दनकी लकड़ीसे उसका दाहसंस्कार किया। पतिव्रताके गुणोंसे सम्पन्न उसकी भार्या दुर्गा उसीके साथ सती हो गयी। तदनन्तर दैत्य सिन्धुके पिता चक्रपाणि नगरनिवासियोंके साथ मयूरेशके समीपमें गये, उन्होंने उन्हें नमस्कार किया और फिर हाथ जोड़कर वे धीरे- धीरे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४६-४७ ॥ राजा बोले—हे विभो ! आप निर्गुण हैं, परमात्मा हैं, सम्पूर्ण चर एवं अचर जगत्की गति हैं, आप वेदत्रयीके द्वारा गम्य नहीं हैं, सत्त्वादि तीनों गुणोंके स्वामी हैं, निर्मल स्वरूपवाले हैं और सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं। आपकी मायाके कारण ही मोहित देवता आपको भलीभाँति नहीं जान पाते हैं। हे प्रभो ! आज आपके दर्शनसे मैं धन्य हो गया हूँ और ये सभी गण्डकी- नगरमें निवास करनेवाले भी धन्य हो गये हैं ॥ ४८-४९ ॥