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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 577, कुल 656 में से

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पृष्ठ 577

क्री०ख०-अ०१२५ ] * कारागारसे मुक्त हुए देवताओंका मयूरेशकी महिमाका गान करना * ५७५ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार राजाके द्वारा स्तुत किये गये, सभी शास्त्रोंके तत्त्वार्थको जाननेवाले एवं कृपासिन्धु देव मयूरेश अत्यन्त प्रसन्नताके साथ बोले ॥ ५० ॥ देव बोले—हे चक्रपाणे! आपका पुत्र मृत्युको प्राप्त हो गया है, आप मुझसे वर माँग लें ॥ ५० १/२ ॥ राजा बोले—हे देवेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो आप हमलोगोंके घरमें पधारिये और इस गण्डकीनगरीको पवित्र कीजिये ॥ ५१ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—राजाका इस प्रकारका वचन सुनकर मयूरेशने मोरपर आरूढ़ होकर चक्रपाणिके नगर गण्डकीको प्रस्थान किया। उनके पीछे-पीछे भगवान् शंकर तथा माता पार्वती भी गये। उन सभीके आगे-आगे वे सभी गण तथा मुनिगण प्रसन्नमन होकर चल रहे थे। समस्त वाद्योंकी ध्वनिके साथ वे सभी उस गण्डकीनगरकी ओर गये, जो विविध प्रकारकी ध्वजाओं और पताकाओंसे सुसज्जित था और जहाँके मार्ग जल आदिके छिड़कावसे स्वच्छ किये गये थे ॥ ५२-५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मयूरेशका गण्डकीनगरीके लिये प्रस्थानका वर्णन' नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२४ ॥ एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय कारागारसे मुक्त हुए देवताओंका मयूरेशकी महिमाका गान करना, चक्रपाणिद्वारा मयूरेशकी प्रथम पूजा करनेसे इन्द्रका रुष्ट होना, महान् ध्वनिके साथ मयूरेशका प्रकट होना और पुनः पंचदेवोंके रूपमें अवतरित होना, ब्रह्माजीद्वारा सिद्धि-बुद्धि नामक कन्याओंका मयूरेशके साथ विवाह करना ब्रह्माजी बोले—अपने नगरमें सबसे आगे पहुँचकर चक्रपाणिने अत्यन्त मूल्यवान् चादरों तथा वस्त्रोंके द्वारा और पताकाओं, ध्वजों एवं चामरोंके द्वारा अपनी राजसभाको सुसज्जित करवाया। उस सभामें भूमिमें स्थित स्तम्भोंमें नाना प्रकारके रत्नोंकी आभा प्रकाशमान हो रही थी, जिसमें गये मनुष्योंके प्रतिबिम्ब अनन्त प्रकारके दिखायी दे रहे थे ॥ १-२ ॥ देवेश्वर मयूरेशने विविध प्रकारके ध्वजोंसे सुशोभित उस गण्डकीपुरीको देखा। उस पुरीके ऊँचे-ऊँचे भवनोंके शिखरोंपर चढ़ी हुई स्त्रियाँ उन मयूरेशको देख रही थीं ॥ ३॥ बन्धनमें डाले गये वे देवता चक्रपाणिद्वारा मुक्त होनेपर मयूरेशके समक्ष आये। उनमें विष्णु, इन्द्र, अग्नि, कुबेर, मरुद्गण, सूर्य तथा इन्द्राणी आदि सभी थे। वे विविध वाद्योंकी ध्वनि करते हुए शीघ्र ही वहाँ आये। वे सभी देवता अपने-अपने वाहनोंसे उतरे और उन सभीने मयूरेश्वरको प्रणाम किया ॥ ४-५ ॥ देवताओंने तथा पुरवासियोंने बड़े ही आदरके साथ मयूरेशका आलिंगन किया। मयूरेशका दर्शनकर भगवान् विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। विष्णु आदि सभी देवताओंने दैत्यराज सिन्धुका वध कर दिये जानेके कारण मयूरेशकी अत्यन्त प्रशंसा की ॥ ६ १/२ ॥ देवता बोले—जिसने स्वर्ग आदि सभी लोकोंको भी भयभीतकर अपने अधीन बना डाला था, ऐसे दैत्य सिन्धुका क्षणभरमें आपने वध कर डाला और शीघ्र ही देवताओंको अपना-अपना पद प्रदान कर दिया, ऐसा दूसरा कोई देवता न देखा गया है और न कभी सुना ही गया है ॥ ७ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—वहाँ जो-जो भी वैष्णव, शैव, शाक्त तथा सूर्योपासक सौर थे, उन्होंने मयूरेशका अपने- अपने इष्टदेवके रूपमें अर्थात् विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्यके रूपमें दर्शनकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उनका पूजन किया। मयूरेशकी जय हो, यह ध्वनि सुनकर सभीको बड़ा ही आश्चर्य हुआ ॥ ८-९ ॥ उस समय बालकों, युवावस्थाको प्राप्त मुग्धा युवतियों, प्रौढा स्त्रियों, वृद्धजनों तथा युवावस्थावाले पुरुषोंने देव मयूरेशका मानसिक पूजन किया ॥ १० ॥