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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 578, कुल 656 में से

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पृष्ठ 578

५७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

हे मुनि व्यासजी ! चक्रपाणिके भवनमें पहुँचकर देवेश्वर मयूरेश वहाँ मध्यमें स्थित एक शुभ सिंहासनपर आसीन हो गये और उनके चारों ओर देवता, मुनि और सात करोड़की संख्यावाले सभी गण स्थित हो गये। तदनन्तर वन्दीजनोंने स्तुतिगान किया और वैसे ही सफलमनोरथ देवताओं तथा राजाओंने भी स्तवन किया ॥ ११-१२ ॥ उस समय अप्सराओंके समूह नृत्य करने लगे। नारद आदि ऋषिगण गान करने लगे। तदनन्तर राजा चक्रपाणिने विधि-विधानके साथ सबका पूजन किया और पूजनके अनन्तर वे सभाके मध्यमें स्थित होकर कहने लगे— आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरे कर्म सफल हो गये, जो कि इन्द्र आदि लोकपाल मेरी सभामें उपस्थित हुए हैं। अपने सौ जन्मोंके अर्जित पुण्यफलोंके द्वारा आज मुझे मयूरेशके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है ॥ १३–१४ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- मयूरेशकी सबसे पहले हुई पूजाको देखकर इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे, वे जगदीश्वरकी मायासे मोहित होकर एकाएक बोल उठे ॥ १५ १/२ ॥ इन्द्र बोले- हे चक्रपाणि ! जगत्का निर्माण करनेवाले चतुर्मुख ब्रह्मा तथा लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके यहाँ उपस्थित होनेपर भी तुम बड़े मूर्ख ही हो, जो कि तुमने एक बालकका सर्वप्रथम पूजन किया है। हम सभीको अपमानित करके मोहवश तुमने एक बालकका पूजन किया है ॥ १६-१७ ॥ तुमने सभी लोकोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, संहार करनेवाले भगवान् शिव, सृष्टि-पालन तथा अन्त करनेवाली तीनों लोकोंकी माता जगदम्बा तथा तीनों लोकोंके स्वामी एवं वैदिक कर्मोंका प्रवर्तन करनेवाले भगवान् सूर्यको छोड़कर एक बालकका पूजन किया है, यह तुमने ठीक नहीं किया ॥ १८-१९ ॥ ब्रह्माजी बोले- देवराज इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर राजा चक्रपाणि बोले- इस बालकमें रुद्र, सूर्य, कुबेर, इन्द्र, मरुद्गण तथा अग्नि आदि देवोंसे अधिक पराक्रम देखा गया है, जो कि इन्होंने दैत्यराज सिन्धुका वध कर दिया और इन गुणेश्वर मयूरेशने ही दैत्य सिन्धुके कारागारसे सभी देवताओंको मुक्त कराया है ॥ २०-२१ ॥ पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये ये भगवान् शिवके घरमें अवतीर्ण हुए हैं। ये परमात्मा हैं, अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न हैं और अनेकों दैत्योंका वध करनेवाले हैं ॥ २२ ॥ ब्रह्माजी बोले- राजा चक्रपाणि जब इस प्रकारसे बोल रहे थे कि उसी समय देवोंको एक महान् ध्वनि सुनायी पड़ी। उस ध्वनिसे ब्रह्माण्डमें विस्फोट होनेकी आशंकासे कुछ देवता मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ २३ ॥ सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी। उस समय कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था। करोड़ों सूर्योंके प्रकाशसे सहसा जगत् आच्छादित हो गया ॥ २४ ॥ तदनन्तर उन देवताओंने वहाँपर एक अत्यन्त सुन्दर देवको देखा। वह नाना प्रकारके अलंकारोंको धारण किये हुए था, उसकी दस भुजाएँ थीं और उसका मुख हाथीके समान था ॥ २५ ॥ इस प्रकारके स्वरूपको देखकर वे सभी देवता उस समय आश्चर्यचकित हो उठे। उसी क्षण उन्होंने पुनः उस देवको पाँचस्वरूपधारी ईश्वरके रूपमें देखा ॥ २६ ॥ वह मध्यमें पद्मासनमें स्थित वक्रतुण्डके रूपमें, आग्नेयकोणमें शिवरूपमें, नैर्ऋत्यकोणमें सूर्यरूपमें, वायव्यकोणमें पार्वतीके रूपमें और ईशानकोणमें विष्णुरूपमें दिखायी पड़ा। यह देखकर वे सभी देवता अत्यन्त भ्रममें पड़ गये। तभी उन्हें आकाशवाणी सुनायी दी, जो उन सभीके भ्रमका निवारण करनेवाली थी ॥ २७-२८ ॥ उस आकाशवाणीने कहा- ये देव सभी लोगोंके लिये आराधनीय हैं। एक होनेपर भी ये पाँच रूपोंमें प्रकट हुए हैं। ये देव आदि और अन्तसे रहित हैं। सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त रहनेवाले हैं और ये गजानन नामवाले हैं ॥ २९ ॥ ये देव देवताओं, मनुष्यों, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंके द्वारा सदैव ही पूजनीय हैं और सभी विघ्नोंका विनाश करनेवाले हैं। इनका पूजन हो जानेसे पंचदेवों-गणेश, विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्यका पूजन हो जाता है। इन देवके विषयमें कोई शंका नहीं करनी चाहिये, ऐसा करनेपर वह नरकप्राप्तिका कारण बनेगी ॥ ३०-३१ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारकी आकाशवाणीको सुननेके अनन्तर इन्द्र आदि उन प्रधान देवताओंने सूँड़से

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