भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 580, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 580

५७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सुशोभित उन मयूरेशको आद्य ओंकारके रूपमें देखा ॥ ३२॥ | ही उसका वरण करो। तब सिद्धि-बुद्धिने सभी देवताओंको तदनन्तर ज्ञान प्राप्त हुए उन देवताओंने अपने भ्रम | छोड़कर मयूरेशके गलेमें माला पहना दी और वे दोनों तथा अभिमानका परित्यागकर 'जय' शब्दके द्वारा उन | बड़ी प्रसन्न हो गयीं। यह देखकर सभी देवता खिन्न सर्वान्तर्यामी प्रभुका पूजन किया ॥ ३३ ॥ | मनवाले हो गये और वे दीर्घ श्वास छोड़ने लगे। देवताओंके द्वारा मयूरेशका पूजन कर लेनेके अनन्तर | घुटनोंतक लम्बी उन मालाओंसे मयूरेशकी बड़ी शोभा दैत्य सिन्धुके पिता चक्रपाणिने बड़ी ही प्रसन्नताके साथ | हुई। तदनन्तर ब्रह्माजीने यथोचित विधि-विधानके अनुसार उन गुणेश्वर मयूरेशका पूजन किया। उन्होंने पंचामृत तथा | उन दोनों सिद्धि-बुद्धिका विवाह मयूरेशके साथ कर शुद्धजलसे उन मयूरेशको स्नान कराकर दिव्य वस्त्रों तथा | दिया ॥ ४१-४४ ॥ आभूषणोंसे उन्हें अलंकृत किया। तदनन्तर पुष्प, धूप, | तदुपरान्त उस सभाके मध्यमें स्थित होकर ब्रह्माजी दीप, विविध नैवेद्य निवेदित किये। इसके पश्चात् फल, | बोले- मेरे हृदयमें जो था, उसे मैंने आज प्राप्त कर लिया ताम्बूल तथा अनेक प्रकारकी दक्षिणाएँ उन्हें समर्पित कीं | है। ऐसा कहकर यथोचित रीतिसे ब्रह्माजीने उन दोनों और फिर नीराजन करनेके अनन्तर मन्त्रपुष्पांजलि और | कन्याओंको देवेश्वर मयूरेशको सौंप दिया ॥ ४५ ॥ प्रणाम निवेदित करके उनका स्तवन किया। इसी प्रकारसे | ब्रह्माजीने यह भी कहा कि आजतक मैंने इन दोनों राजा चक्रपाणिने बड़ी ही भक्ति-श्रद्धाके साथ सभी | कन्याओंका बड़े ही यत्नपूर्वक पालन-पोषण किया है, देवताओंकी भी पूजा की ॥ ३४-३६ ॥ | इस समय अब मैं इन दोनोंको तुम्हें समर्पित कर रहा हूँ, इसके पश्चात् नृपश्रेष्ठ चक्रपाणिने उन देवताओंसे | तुम बड़े ही यत्नसे इनकी रक्षा करना ॥ ४६ ॥ कहा- आज मैं आप लोगोंका पूजन करनेसे धन्य हो | इसके पश्चात् इन्द्र आदि देवताओंने मयूरेशसे गया हूँ, क्योंकि इस प्रकारसे सभी देवताओंका एक | निवेदन करते हुए कहा- हे देवेश ! आपकी कृपासे हम स्थानपर उपस्थित होना कहीं भी नहीं देखा गया है। | सभी देवता दैत्य सिन्धुके कारागारसे मुक्त हुए हैं। तदनन्तर वहाँपर विद्यमान अत्यन्त प्रसन्न हुए देवर्षि | आपकी ही कृपासे उस दैत्यराज सिन्धुने मोक्ष भी प्राप्त नारदजीने चतुर्मुख ब्रह्माजीसे कहा- ॥ ३७ १/२ ॥ | किया है, इस समय अब हम गौतम आदि मुनियोंके साथ हे कमलयोनि ब्रह्माजी ! आपकी आज्ञासे सिद्धि | अपने-अपने स्थानको जायँगे। आप हमें जानेकी अनुमति तथा बुद्धिके विवाहके सम्बन्धमें भगवान् शिव तथा | प्रदान करें ॥ ४७-४८ ॥ देवी पार्वतीको सभी बातें बताकर यह मैंने पहले ही | ब्रह्माजी बोले- तब देव मयूरेशने जानेकी इच्छा निश्चय कर लिया था कि सभी प्रकारके शुभ लक्षणोंसे | रखनेवाले उन देवों तथा मुनियोंको प्रसन्नतापूर्वक जानेकी सम्पन्न इन दोनों कन्याओंको आप मयूरेशको ही | आज्ञा प्रदान की। इसके पश्चात् शिवके समीपमें स्थित प्रदान करेंगे ॥ ३८-३९ ॥ | माता पार्वती ने अपनी सिद्धि तथा बुद्धि नामक दोनों तदनन्तर आसक्तिवश वे सभी देवता देव ब्रह्माजीसे | पुत्रवधुओंको तथा मयूरेशको बड़े ही आदरके साथ आदरपूर्वक यह माँग करने लगे कि 'ये कन्याएँ | अपनी गोदमें बैठाकर बड़े ही हर्षका अनुभव किया। मुझे प्रदान कीजिये।' तब ब्रह्माजीने उन दोनों- | उन्होंने [ब्राह्मणोंको] वस्त्र तथा आभूषण आदि अनेक सिद्धि एवं बुद्धिके हाथोंमें माला देकर इस प्रकार | दानोंको प्रदान किया ॥ ४९-५० ॥ कहा - ॥ ४० १/२ ॥ | जो मनुष्य भगवान् गणेशके द्वारा प्राप्त की गयी ब्रह्माजी बोले- हे देवियो ! यहाँ उपस्थित तैंतीस | सिन्धुदैत्यपर विजय तथा भगवान् गणेशके शुभ-विवाहके करोड़ देवताओंमें से कोई एक, जो तुम्हारे हृदयको भाता | इस आख्यानका श्रवण करता है, वह व्यक्ति अपने सभी हो, उसके गलेमें माला पहनाकर तुम दोनों मेरे समक्ष | अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मयूरेशके विवाहका वर्णन' नामक एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२५ ॥