श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 581, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१२६ ] * विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान * ५७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान, मयूरेशपुरीका वर्णन, भाद्रपदमासके गणेशव्रतकी विधि तथा उसकी महिमा, मयूरेशका द्वापरयुगमें सिन्दूरवधके लिये पुनः अवतरित होनेका आश्वासन देकर अन्तर्धान होना, ब्रह्माजीका एक सुन्दर प्रासादको निर्मितकर उसमें गजाननप्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना, मयूरेशचरित्रश्रवणकी महिमा ब्रह्माजी बोले—सिद्धि तथा बुद्धिके साथ विवाह | सुननेमात्रसे तत्काल ही चक्रपाणिकी आँखोंमें आँसू आ गये। सम्पन्न हो जानेके अनन्तर देव मयूरेशने अपने वाहन | सभी नगरनिवासी उन मयूरेशको प्रणाम करके शोकाकुल मोरपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही अपनी नगरीके लिये | होते हुए उच्चस्वरमें यह बात कहने लगे। आप जहाँ जा प्रस्थान किया॥ १॥ | रहे हैं, हम सभीको भी वहीं ले चलें। आपका हम लोगोंको उसी समय सभी देवता भी अपने-अपने वाहनोंपर | इस प्रकार यहाँ छोड़ना ठीक नहीं है ॥ ९-१० ॥ विराजमान होकर उन मयूरेशके आगे-आगे चलने लगे | यदि आप पहले यहाँ न आये होते, तो हम लोगोंको और मुनिगण उनके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ २॥ | दुःख नहीं होता। ऐसा कहकर उन मयूरेशको प्रणाम चक्रपाणिके साथ नगरके सभी निवासी, स्त्रियाँ | करके और उनसे आज्ञा लेकर वे सभी चले गये ॥ ११ ॥ तथा बालक बड़े ही आनन्दके साथ सहसा बाहर | राजा चक्रपाणिने भी उन्हें प्रणामकर अपने नगरको निकलकर उनके पीछे चलने लगे। उस समय सभी | प्रस्थान किया। उन मयूरेशके बहुतसे अद्भुत गुणोंका प्रकारके वाद्य बज रहे थे, अप्सराओंके समूह-के-समूह | वर्णन करते हुए वे सभी नगरनिवासी क्षणभरमें ही अपनी नृत्य कर रहे थे। उन सभीसे घिरे हुए मयूरेश जैसे ही | नगरीमें पहुँच गये और चक्रपाणिसे आज्ञा प्राप्तकर युद्धभूमिमें पहुँचे, त्यों-ही स्कन्द आदि वीर उन विभु | अपने-अपने घरोंको चले गये। चक्रपाणि भी अपने घर मयूरेशसे प्रार्थना करते हुए कहने लगे ॥ ३–४१/२ ॥ | चले गये ॥ १२-१३ ॥ वीर बोले—युद्धभूमिमें जिन सेनानियोंको दैत्योंकी | राजा चक्रपाणिने अपने नगरमें सूर्य, गणेश, विष्णु, सेनाने मार डाला था, वे सभी आपके दृष्टिपातरूप | शिव तथा दुर्गा—इन पंचदेवोंके लिये पाँच मन्दिर अमृतसे सिंचित होकर उठ खड़े हुए हैं। मयूरेशके द्वारा | बनवाये और उनमें एक-एक मूर्तिकी स्थापनापूर्वक उनको जीवित किया गया देखकर सभी देवता तथा | प्रतिष्ठा करवायी ॥ १४ ॥ नगरनिवासीजन अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये और 'साधु- | राजा चक्रपाणि भक्तिभावपूर्वक उन पंचदेवोंकी साधु' इस प्रकारसे कहने लगे ॥ ५–६१/२ ॥ | नित्य पूजा किया करते थे। इधर मयूरेश भी क्षणभरमें योजनमात्र मार्ग तय करनेपर देवेश्वर मयूरेश मार्गमें | अपनी मयूरेशपुरीमें पहुँच गये ॥ १५ ॥ ठहर गये और चक्रपाणिके सिरपर अपना मंगलमय हाथ | उस नगरीको देखकर सभी गण बड़े ही आश्चर्यमें रखकर तथा शत्रुपक्षके वीरोंको भय पहुँचानेवाले अपने | पड़ गये। उस पुरीके स्तम्भ रत्नोंसे बने हुए थे और दसों हाथोंसे राजाका आलिंगनकर उनसे बोले ॥ ७-८॥ | उसकी दीवारें सोनेसे निर्मित थीं ॥ १६ ॥ देव बोले—मेरे कथनानुसार तुम शीघ्र ही सभी | उन रत्नमय तथा स्वर्णिम दीवारोंमें अपना प्रतिबिम्ब नागरिकोंके साथ अपने गण्डकीपुरकी ओर प्रस्थान | अकेला नहीं दिखता था, अपितु असंख्य जनोंसे समन्वित करो ॥ ८१/२ ॥ | दिखता था। उस रमणीय सभामण्डपमें ब्रह्मा आदि ब्रह्माजी बोले—मयूरेशके इस प्रकारके वचन | देवोंको बैठाकर मयूरेशने सभाके मध्यमें प्रवेश किया