भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 582, कुल 656 में से

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पृष्ठ 582

५८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- और सभी ओर दृष्टि दौड़ायी। उन्होंने उस सभाके पूर्वभागमें रतिके साथ कामदेवको तथा मार्जारी नामवाली लोकमें प्रसिद्ध देवीको देखा, जो सुख प्रदान करनेवाली हैं। सभाकी दक्षिण दिशामें उन्होंने भगवान् शिव और पार्वतीको देखा ॥ १७-१९॥ उनके आगे देवी विरजाको देखा, जो भक्तोंकी सकल कामनाओंको पूर्ण करनेवाली हैं। पश्चिम दिशामें धरणीदेवीसे समन्वित भगवान् वाराहको और सब प्रकारके विघ्नोंका नाश करनेवाली आश्रया नामवाली मंगलकारिणी देवीको देखा ॥ २० १/२ ॥ उत्तर दिशामें श्रीहरिका और प्रसिद्ध मुक्तादेवीका दर्शन किया, वे देवी सब प्रकारकी मुक्तिको प्रदान करनेवाली हैं। तैंतीस करोड़ देवता भी उन मयूरेशका दर्शन करनेकी इच्छासे वहाँ आकर स्थित हो गये ॥ २१-२२ ॥ [इसी प्रसंगमें ब्रह्माजी भाद्रपद चतुर्थी-व्रतानुष्ठानका निरूपण करते हुए कहते हैं—हे व्यासजी !] भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिको स्नान करनेके अनन्तर सर्वप्रथम गजाननकी पूजा करे, तदनन्तर पूर्व दिशामें जाकर वहाँ मार्जारी देवीका पूजन करे ॥ २३ ॥ पूजनके अनन्तर ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके दान प्रदान करे और गजाननका स्मरण तथा ध्यान करके मौन व्रतसे रहे। इस प्रकारसे धीरे-धीरे चले कि चलते समय पैरोंसे होनेवाली आवाज न सुनायी दे ॥ २४ ॥ कृमि, कीट तथा पतंग आदिकी हिंसा न करे, प्रयत्नपूर्वक पवित्रता एवं संयमसे रहे। तदनन्तर पुनः स्नान करके देवाधिदेव गजाननकी (सायंकालीन) पूजा करे। इसी प्रकार दूसरे दिन तथा तीसरे दिन भी पहले दिनकी भाँति क्रमशः पूजन आदि करे, दूसरे दिन दक्षिणद्वारपर देवी विरजाकी पूजा मार्जारीदेवीके समान ही करे ॥ २५-२६ ॥ तीसरे दिन पश्चिमद्वारपर आश्रया नामवाली देवीको नमस्कार करके पूर्ववत् उनका पूजन करे, चतुर्थी तिथिको व्यक्तिको चाहिये कि वह उत्तरद्वारपर पूर्वोक्त विधिके अनुसार देवी मुक्ताका पूजन करे और फिर मयूरेशका पूजन करे। महोत्सव मनाये तथा रात्रिमें जागरण करे ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकारसे जो उपवासपूर्वक चारों द्वारोंमें स्थित देवियोंका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह भगवान् मयूरेशके कृपाप्रसादसे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। यदि समर्थ हो तो चतुर्थी तिथिको ही चारों द्वारोंपर पूर्वकी भाँति मार्जारी आदि देवियों और मयूरेशका पूजन करे। इन देवियोंके पूजनके आदि और अन्तमें जो स्नान करके देवेश्वर मयूरेशका दर्शन करता है, तो उसका फल देव गजानन प्रसन्न होकर तुरन्त ही प्रदान करते हैं ॥ २९-३० १/२ ॥ अतः भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे प्रारम्भ करके ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए चतुर्थी तिथिके दिन उषाकालमें स्नान करके तथा विधिपूर्वक सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्म सम्पन्न करनेके अनन्तर विधि-विधानसे मयूरेश्वरका पूजन करे ॥ ३१-३२ ॥ पूजनके अनन्तर इक्कीस बार प्रदक्षिणा और नमस्कार करे। तदनन्तर शीघ्रतासे पूर्वद्वारमें जाकर मार्जारीको नमस्कार करे। फिर दक्षिणदिशामें विरजा, पश्चिमद्वारमें आश्रया, उत्तरद्वारमें जाकर श्रेष्ठ मुक्तादेवीको प्रणाम करे। इसके पश्चात् किंचित् दिन शेष रहनेपर मयूरेश्वरकी पूजाका आरम्भ करे। पूजक व्यक्ति अत्यन्त ध्यानपूर्वक सोलह उपचारोंद्वारा मयूरेश्वरका पूजन करे और रात्रिमें गीत तथा वाद्योंकी ध्वनिके साथ जागरण करे ॥ ३३-३५ ॥ प्रातःकाल होनेपर निर्मल जलमें स्नान करनेके अनन्तर पुनः देवेश्वर मयूरेशका पूजन करे। तदनन्तर यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी व्रतकी पारणा करे ॥ ३६ ॥ उन ब्राह्मणोंको सुवर्ण, वस्त्र, धान्य तथा गो आदि प्रदान करे। इस प्रकारसे जो व्यक्ति व्रत करता है, वह जो कुछ असाध्य है, उसे भी सिद्ध कर लेता है। वह पुत्र-पौत्रोंकी सम्पदासे सम्पन्न होता है और विविध सुखोंका उपभोग करनेके अनन्तर अन्तमें स्वर्गलोक प्राप्त करता है। वहाँ इन्द्र, यम, कुबेर आदि लोकपाल उस मनुष्यकी पूजा करते हैं ॥ ३७-३८॥ आठों प्रकारकी नायिकाएँ उस व्रती व्यक्तिके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं। अन्धेको दृष्टि प्राप्त हो