भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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पृष्ठ 583

क्री०ख०-अ०१२६]
* विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान *
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जाती है, मूक व्यक्ति अवश्य ही वाणी प्राप्त कर लेता है। जो भार्याकी अभिलाषा करता है, वह भार्या प्राप्त कर लेता है और जो विद्यार्थी है, वह उत्तम बुद्धिको प्राप्त कर लेता है। चारों द्वारोंमें उपवास करनेपर भी यही फल कहा गया है॥ ३९-४०१/२॥ [इस प्रकार चतुर्थी-व्रतानुष्ठानका निरूपण करके ब्रह्माजी पुनः पूर्ववर्ती प्रसंगका वर्णन करते हैं—] तदनन्तर किसी दिनकी बात है, देवेश्वर मयूरेश विष्णु, ब्रह्मा तथा शिव आदि सभी देवताओंसे अत्यन्त स्निग्ध वाणीमें कहने लगे ॥ ४११/२ ॥ मयूरेश बोले— हे देवो ! जिस कार्यको सम्पन्न करनेके लिये मैं अवतरित हुआ था, वह कार्य मैंने पूर्ण कर लिया है। मैंने बहुत-से दैत्योंका वध किया और पृथ्वीके भारको हलका कर दिया। दैत्य सिन्धुके कारागृहसे सभी देवताओंको मुक्त किया है॥ ४२-४३॥ अब स्वाहाकार, स्वधाकार तथा वषट्कार आदि अर्थात् देवपूजन, यज्ञ तथा पितृकर्म-श्राद्धादि पहलेकी भाँति होने लगेंगे। हे देवो ! आप सबसे आज्ञा लेकर अब मैं अपने धामको जाना चाहता हूँ॥ ४४॥ मयूरेशके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सभी देवता शोकमें पड़ गये। आँसू बहाते हुए तथा एक- दूसरेका मुख देखते हुए वे कहने लगे॥ ४५॥ हे मयूरेश ! हम लोगोंको छोड़ करके आप कहाँ जाना चाहते हैं? आप स्नेहका परित्यागकर इस प्रकारसे अत्यन्त निष्ठुर कैसे हो गये हैं? तदनन्तर देवी पार्वती भी यह सब सुनकर एकाएक शोकसे व्याकुल हो उठीं। मूर्च्छित होकर वे भूमिपर गिर पड़ीं। एक मुहूर्तके बाद चेतना लौटनेपर वे कहने लगीं—॥ ४६-४७॥ हे दीनानाथ ! हे दयासागर ! हे जगन्नाथ ! हे सिन्धुदैत्यका विमर्दन करनेवाले ! मुझ अपनी माताका परित्यागकर तुम कहाँ जाओगे ? हे सुरेश्वर ! आपके चले जानेपर मेरे प्राण भी नहीं रहेंगे ॥ ४८१/२ ॥ देव बोले— हे शुभे ! द्वापरयुग आनेपर मैं पुनः आपकी पुत्रताको प्राप्त होऊँगा। मेरा वचन मिथ्या नहीं होगा। आप कुछ भी चिन्ता न करें। आपके वियोगसे


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मुझे भी अतुलनीय दुःख हो रहा है॥ ४९-५०॥ हे माता ! सुहृज्जनोंका एक स्थानपर रहना सर्वदाके लिये सम्भव नहीं होता है। आगे अत्यन्त भयंकर सिन्दूर नामक एक दैत्य उत्पन्न होगा। वह सभी देवताओंके लिये अवध्य होगा, तब मैं आपके पुत्रके रूपमें उत्पन्न होऊँगा। हे शिवप्रिये ! मैं स्मरणमात्र करनेसे ही आपके समक्ष उपस्थित हो जाऊँगा॥ ५१-५२॥ तदनन्तर कार्तिकेय बोले—आप जहाँ जा रहे हैं, मुझे भी वहाँ ले चलें। बालक, असहाय तथा दीनकी उपेक्षा करना ठीक नहीं है॥ ५३॥ देव बोले— हे बन्धु ! आप चिन्ता न करें, मैं यहाँ पुनः आऊँगा। मुझ अन्तर्यामीका आपसे कभी भी वियोग नहीं होगा। तदनन्तर मयूरेश्वरने अपने भाई कार्तिकेयको अपना वाहन मयूर प्रदान किया और उसी समय उनका मयूरध्वज यह नाम रखा ॥ ५४-५५ ॥ तदनन्तर बन्धु गुणेश्वरकी आज्ञासे कार्तिकेय उस मयूरके ऊपर [जैसे ही] आरूढ़ हुए, उसी क्षण वे देव मयूरेश्वर अन्तर्धान हो गये ॥ ५६ ॥ उन मयूरेश्वरके अन्तर्धान हो जानेपर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशने सर्वदा ही उन्हें अपने हृदयदेशमें प्रतिष्ठित देखा। तदनन्तर ब्रह्माजीने एक अत्यन्त मनोहर प्रासाद बनवाया और बालुकासे गजाननकी मूर्ति बनाकर उस मन्दिरमें विधिवत् स्थापित की। सभी लोगोंने विविध उपचारोंके द्वारा यथाविधि उन गजाननका पूजन किया। वसिष्ठ आदि मुनिगणोंने ब्रह्मकमण्डलु नामक नदीमें स्नान किया और सन्ध्यावन्दनादि सम्पूर्ण कर्म सम्पन्न करनेके अनन्तर वे गजाननकी उस अत्यन्त सुन्दर मूर्तिके समीप गये॥ ५७–५९॥ कुछ मुनियोंने व्रत करके गजाननके धामको प्राप्त करनेके लिये मन्दिरके चारों ओर चार द्वार बनाये। कुछ स्नान करनेके अनन्तर उन गजाननको प्रणाम करके दौड़ते हुए उनकी परिक्रमा करने लगे॥ ६० ॥ उस समय सभी देवता तथा मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर परस्पर कहने लगे कि इस प्रकारका पुण्यक्षेत्र अन्य कहीं देखा नहीं गया है, जहाँ कि साक्षात् देव