श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 584, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गजानन स्थित हों। ये मयूरेश विघ्नोंका निवारण करनेवाले | प्राप्ति होती है और यह आख्यान मनुष्योंके सभी हैं और भक्तोंकी मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। | प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाला है ॥ ६४-६५ ॥ इस प्रकार कहकर तथा उन गजाननका पूजन करके वे | इस मयूरेश-चरितका श्रवण पुत्र देनेवाला, धन सभी मुनिगण अपने-अपने आश्रमोंकी ओर चले | प्रदान करनेवाला, विद्या प्रदान करनेवाला तथा समस्त गये ॥ ६१-६२ ॥ | दुःखोंका निवारण करनेवाला है। यह शारीरिक तथा तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता भी अपने-अपने स्थानोंपर | मानसिक सभी बाधाओंको दूर करनेवाला और कुष्ठ चले गये। भगवान् शंकर अपने परिवारके साथ आनन्दित | आदि दुष्ट रोगोंका विनाश करनेवाला है ॥ ६६ ॥ होते हुए कैलासको चले गये। तब स्वधा, स्वाहा और | यह मयूरेशका आख्यान पढ़ने तथा सुननेवाले वषट्कार होने लगा, जिससे इन्द्र आदि देवता बड़े प्रसन्न | पुरुषोंके लिये अत्यन्त मंगलकारी है और भुक्ति तथा हो गये ॥ ६३ १/२ ॥ | मुक्ति प्रदान करनेवाला है। यह मनुष्योंको विजयश्रीका ब्रह्माजी बोले- हे मुनि व्यासजी! त्रेतायुगमें | अधिष्ठान है। क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों-सभीको लक्ष्मी मयूरेश्वरने जो कुछ भी किया था, वह सम्पूर्ण चरित्र | प्रदान करनेवाला और पुष्टिको बढ़ानेवाला है ॥ ६७ १/२ ॥ आपको बता दिया है। देव मयूरेशके चरितका श्रवण | [ब्रह्माजी बोले-] हे मुनि व्यासजी! जो-जो सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। मयूरेशकी कथाके | आपने पूछा, वह सब मैंने बता दिया। अब आप मेरे सुननेसे कृतार्थता प्राप्त होती है, यश तथा आयुष्यकी | मुखसे पुनः गजाननके चरित्रका श्रवण करेंगे ॥ ६८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'द्वारमहिमाका वर्णन' नामक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२६ ॥
एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय गजानन-अवतारके प्रसंगमें ब्रह्माजीकी जँभाईसे सिन्दूरकी उत्पत्ति, ब्रह्माजीद्वारा उसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, वरदानोंकी परीक्षाके लिये सिन्दूरका ब्रह्माजीको ही लक्ष्य बनाना और ब्रह्माजीका भयभीत होकर वैकुण्ठ जाना
व्यासजी बोले- हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! हे देवेश ! | प्राप्त करते हैं। हे मुने! मैं विनायकचरितकी उस कथाको आपने गुणेशके शुभ चरितका विस्तारसे वर्णन किया। फिर | आपसे कहूँगा, जो चरित देव विनायकने द्वापरयुगमें किया भी हे देव ! उसके सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं हुई है। मनुष्य | था, उसे आप इस समय सुनें ॥ ४-५ १/२ ॥ अमृतके पानसे तो तृप्त हो सकता है, किंतु कथाके श्रवणसे | जिस प्रकारसे वे देव गजानन रक्तवर्णवाले, चार तृप्त नहीं हो सकता। मैंने त्रेतायुगमें हुए गुणेशके अवतारकी | भुजाओंवाले, गजके मुखवाले एवं मूषकके वाहनवाले सम्पूर्ण कथा सुन ली है ॥ १-२ ॥ | हुए, वह सब मैं आपसे कहता हूँ ॥ ६ १/२ ॥ तदनन्तर द्वापरयुगमें गजानन नामसे उन्होंने कहाँ | किसी समयकी बात है, भगवान् शंकर संयोगवश अवतार लिया और हे महाप्रभु ! मूषक उनका वाहन | ब्रह्मलोकमें पहुँचे। तब उन्होंने शयन कर रहे ब्रह्माजीको किस प्रकार हुआ ? हे कमलासन ब्रह्माजी ! आप मेरे इस | जगाया। उस समय वे क्रुद्ध होकर उठे और उन्होंने दीर्घ संशयको दूर करनेकी कृपा करें ॥ ३ १/२ ॥ | जँभाई ली ॥ ७-८ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे वत्स ! हे मुने ! मेरे मनमें जो | उस जँभाईसे एक महाभयानक पुरुष उत्पन्न हुआ। बात थी, उसे पूछकर आपने बहुत अच्छा किया है, | उत्पन्न होते ही उस पुरुषने सभीको भयभीत कर क्योंकि श्रोता, वक्ता तथा पूछनेवाला - ये तीनों ही सिद्धिको | देनेवाला तीव्र ध्वनियुक्त शब्द किया, उस ध्वनिसे समुद्र,