श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 585, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१२७ ] * गजानन-अवतारके प्रसंगमें ब्रह्माजीकी जँभाईसे सिन्दूरकी उत्पत्ति * ५८३
द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी। दिशाओंके रक्षक, सभी दिक्पाल आश्चर्यचकित हो उठे। क्षुब्ध होकर शेषनाग विष उगलने लगे ॥ ९-१० ॥ सभी पर्वत चूर-चूर होकर गिर पड़े और समस्त प्राणी व्याकुल हो उठे। तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले मनुष्योंके लिये कल्पान्तमें होनेवाले प्रलय-जैसी स्थिति हो गयी। वह अपने मस्तकसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको विदीर्ण करता हुआ-सा खड़ा हो गया। उसके शरीरसे निकलनेवाली सुन्दर गन्ध तीनों लोकोंमें फैल गयी ॥ ११-१२ ॥ उस पुरुषके जपाकुसुमके समान कान्तियुक्त देहकी प्रभासे सभी दिशाएँ अरुणिम वर्णकी हो उठीं। क्या ब्रह्माजीद्वारा यह कोई दूसरा कामदेव उत्पन्न हो गया है, यह विचारकर कामदेव उस पुरुषके सौन्दर्यको देखकर तत्क्षण ही लज्जित हो उठा। अपने सामने स्थित उस पुरुषको देखकर कमलयोनि ब्रह्मा विस्मित हो गये और उससे बोले—तुम किसके पुत्र हो? कहाँसे उत्पन्न हुए हो? तुम्हारी क्या करनेकी इच्छा है? वह सब मुझे बताओ ॥ १३-१४१/२ ॥ पुरुष बोला—हे सुरेश्वर! आप अनेकों ब्रह्माण्डोंकी रचना करनेवाले होनेपर भी तथा सब कुछ जाननेवाले होनेपर भी भ्रममें पड़े हुएकी भाँति मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? आपकी जँभाईसे ही उत्पन्न मुझे आप क्यों नहीं जान पा रहे हैं? ॥ १५-१६ ॥ आप अपने पुत्र मुझपर कृपा करें और अपनी बुद्धिके अनुसार मेरा नाम रखें। हे नाथ! मुझे रहनेके लिये स्थान प्रदान करें, साथ ही मेरा भोजन क्या होगा तथा मुझे कौन-सा कार्य करना है, यह सब मुझे बतायें। उस पुरुषके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर चतुरानन ब्रह्माजी बोले—चूँकि तुम्हारा शरीर रक्तवर्णका है, इसलिये तुम 'सिन्दूर' नामसे प्रसिद्ध होओगे ॥ १७-१८ ॥ तुम्हारी सामर्थ्य महान् होगी और तुम तीनों लोकोंको वशमें करनेमें सक्षम होओगे। तुम क्रोधके आवेशमें जिसका भी आलिंगन करोगे, वह सौ टुकड़ोंमें विभक्त हो जायगा ॥ १९ ॥ तुम्हें पाँच भूतों—पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाशसे भी कभी कोई भय नहीं होगा। देवता, दानवों, यक्षों तथा मनुष्योंसे तुम्हें भय नहीं होगा। इन्द्र आदि लोकपालों तथा साक्षात् कालसे भी कोई तुम्हें भय नहीं होगा। नागों, राक्षसोंसे भी कोई भय नहीं होगा, तुम्हें न तो दिनमें भय रहेगा और न रात्रिमें कोई भय रहेगा ॥ २०-२१ ॥ हे सिन्दूर ! तुम्हें न तो सजीव प्राणियोंसे भय होगा और न निर्जीव प्राणियोंसे। तीनों लोकोंमें जहाँ भी तुम्हारा रहनेको मन करे, वहाँ रहो ॥ २२ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजीके मुखसे उत्पन्न वह सिन्दूर अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया। तब वह अपनी आवाजके द्वारा चराचरसहित तीनों लोकोंको कँपाते हुए दहाड़ा ॥ २३ ॥ उस तीव्र ध्वनिसे समुद्र क्षुब्ध हो उठे, सभी लोकपाल भाग उठे। तदनन्तर उस सिन्दूरने पितामह ब्रह्माजीको प्रणाम करके कहा ॥ २४ ॥ सिन्दूर बोला—हे अखिल ब्रह्माण्डके स्वामी ब्रह्माजी ! आपके वचनरूपी अमृतसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हो गया हूँ। आप ही सत्त्व-रज तथा तम—इन तीनों गुणोंके द्वारा इस विश्वकी रचना करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं और अन्तमें उसका लय भी कर देते हैं ॥ २५ ॥ आपके सो जानेपर यह समस्त संसार भी सो जाता है और सर्वत्र अन्धकार व्याप्त हो जाता है। हे विभो ! मेरा यह महान् अहोभाग्य है कि बिना तपस्या किये, बिना दानोंको दिये और बिना व्रत, उपवास किये आप मुझपर पुत्रका स्नेह प्रकट करके प्रसन्न हैं, अन्यथा आप प्रसन्न नहीं होते। हे प्रभो ! करोड़ों कल्पोंतक तपस्याके परिणामस्वरूप ही आप प्रसन्न होते हैं ॥ २६-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार कहनेके अनन्तर उन्हें प्रणामकर और उनकी प्रदक्षिणा करके वह सिन्दूर अपने मनको अनुकूल लगनेवाले स्थानकी ओर चल पड़ा। मार्गमें वह यह तर्क-वितर्क करने लगा कि न तो मैंने कोई तपस्या की है, न ध्यान किया है, न किसी मन्त्रका जप किया है और न ही शास्त्रोंका स्वाध्याय किया है, तो फिर क्यों उन ब्रह्माजीने मुझे इतने वर प्रदान किये हैं, क्या उनके दिये वरदान सत्य हैं अथवा मिथ्या हैं? वहाँ पिता ब्रह्माके पास जाकर ही इन वरदानोंकी परीक्षा