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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 587, कुल 656 में से

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पृष्ठ 587

क्री०ख०-अ०१२८ ] * ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना * ५८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] तब जँभाई लेनेपर मेरे मुखसे एक विशाल पुरुष प्रकट हुआ। उसका मस्तक इतना ऊँचा था कि उस ऊँचे मस्तकके टकरानेसे आकाशसे ग्रह-नक्षत्र नीचे भूमिपर गिरने लगे। उसके शरीरसे निकलनेवाली सुगन्धित वायुसे सभी देवता विस्मित हो उठे ॥ ६-७ ॥ वह इतना सुन्दर था कि उसके लावण्यको देखनेमात्रसे कामदेव लज्जित हो गये। उसके चिल्लानेके शब्दसे तीनों लोक कम्पित हो उठे। हे देव ! वह पुरुष मुझे नमस्कार करके विनीत भावसे मेरे सामने खड़ा हो गया। हे माधव ! तब मैंने उसे अपना पुत्र समझकर पुत्रस्नेहके कारण अनेक वर प्रदान किये ॥ ८-९ ॥ मैंने वर देते हुए उससे कहा कि तुम जिस-जिसका आलिंगन करोगे, वह निश्चित ही मृत्युको प्राप्त हो जायगा, साक्षात् काल भी युद्धमें तुम्हारे सामने खड़ा होनेमें समर्थ नहीं हो सकेगा ॥ १० ॥ हे देव ! तदनन्तर मैंने उसे रहनेके लिये उसकी इच्छाके अनुरूप ही स्थान दिया। तब वह मुझे नमस्कार करके कुछ ही दूर गया था कि कुछ सोच-विचारकर पुनः वापस आया। फिर वह मुझे आलिंगन करनेके लिये मेरे समीप आया। उसके भयसे मैं भाग उठा। मैं अपने हंसपर आरूढ़ हुआ और वेगसे उड़ता हुआ आपके पास आ पहुँचा हूँ ॥ ११-१२ ॥ उसे अपने पीछे-पीछे आता देख-देखकर मेरा शरीर काँपने लगा और मैं हाँफने लगा। हे सर्वसुरेश्वर ! आपके बिना मैं और दूसरे किसकी शरणमें जाऊँ ? तब उन शरणमें आये हुए ब्रह्माजीसे भगवान् महाविष्णु कहने लगे ॥ १३१/२ ॥ श्रीविष्णु बोले— हे देव ! आपने पहले तो जानबूझकर उसे वर प्रदान किये और अब संकट आ गया है तो चिन्ता करनेसे क्या लाभ ! जो होना है, वह तो होकर ही रहेगा ॥ १४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— वह तो तीनों लोकोंको पीड़ित करनेके लिये उद्यत हो गया है ॥ १५ ॥ जब इस प्रकारसे ब्रह्मा तथा भगवान् विष्णु चिन्तासे व्याकुल हो रहे थे कि उसी समय उन दोनोंको

[दायाँ स्तम्भ] अपने सामने वह महादैत्य खड़ा दिखायी दिया ॥ १६ ॥ वह अत्यन्त जोरसे गरजा और अपनी तीव्र गर्जनासे उसने तीनों लोकोंको निनादित कर डाला। उस दुष्ट दैत्यने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा ब्रह्माको भी कम्पित कर डाला। तब ब्रह्माजी तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले भगवान् विष्णुसे 'रक्षा करो', 'रक्षा करो' इस प्रकारसे कहने लगे। तदनन्तर भगवान् विष्णुने अत्यन्त मधुर वाणीमें उससे कहा ॥ १७-१८ ॥ श्रीहरि बोले— ब्रह्माजीके द्वारा वर प्राप्तकर उन्मत्त हुए तुम्हारे साथ मैं युद्ध करनेका साहस नहीं करता। मैं तो सत्त्वगुणका आश्रय लेकर जीवोंके पालनमें ही सदा लगा रहता हूँ। ये ब्रह्माजी ब्राह्मण हैं, अतः इनके साथ भी तुम्हारा युद्ध करना ठीक नहीं है, तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें भगवान् शिव ही समर्थ हैं, उन्होंने कामदेवको भी भस्म कर डाला है। तुम उन्हीं शिवके साथ युद्ध करो, इससे तुम्हारी महान् कीर्ति तीनों लोकोंमें फैल जायगी ॥ १९-२० ॥ ब्रह्माजी बोले— भगवान् विष्णुके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर दैत्य सिन्दूर प्रसन्न हो उठा। तदनन्तर वह सहसा तीनों लोकोंको कँपाता हुआ, पर्वतोंको गिराता हुआ और वृक्षोंको चूर-चूर करता हुआ तत्क्षण ही उड़कर चल पड़ा ॥ २१-२२१/२ ॥ उसके भयसे दिशाओंके सभी हाथी इधर-उधर दिशाओं-विदिशाओंमें चले गये। इस प्रकारसे जाता हुआ वह दैत्य सिन्दूर महान् पर्वत कैलासकी तलहटीमें जा पहुँचा। उस दुष्टने वहाँ पर्वतकी चोटीपर ध्यानमें निमग्न भगवान् शिवको देखा। नन्दी तथा भृंगी आदि गण उनके चारों ओर स्थित थे और माता पार्वती उन प्रभुकी सेवा कर रही थीं ॥ २३-२४ ॥ भगवान् शिवने व्याघ्रचर्म धारण किया हुआ था, उनके मस्तकपर अर्धचन्द्र विभूषणके रूपमें शोभित था। उन्होंने भस्मका अंगराग लगाया था, जिससे उनकी शोभा और भी अधिक हो रही थी, उन्होंने गजचर्मको उत्तरीय वस्त्रके रूपमें धारण किया था ॥ २५ ॥ भगवान् शंकरको देखकर वह दैत्य सहसा उनकी