श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 588, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५८६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
निन्दा करने लगा। उसने कहा—इस तपस्वीके साथ मैं क्या युद्ध करूँ। मैं इसकी सुन्दर भार्याको लेकर यथारुचि यथास्थानको चला जाता हूँ। ऐसा मनमें निश्चयकर वह गौरी पार्वतीके समीपमें आया ॥ २६-२७॥ उस समय गिरिजा उसी प्रकार कम्पित हो उठीं, जैसे कल्पान्त प्रलयमें संसार काँप उठता है। उन्होंने अपने नेत्रोंको बन्द कर लिया। भयसे विह्वल होकर वे क्षणभरमें ही मूर्च्छित हो गयीं ॥ २८ ॥ कुत्सित विचारवाले दैत्य सिन्दूरने पार्वतीके केशपाशको पकड़ा और वह उड़कर वेगसे चल पड़ा। तब पार्वती अत्यन्त शोक करने लगीं। वह दैत्य उन्हें उसी प्रकार ले जा रहा था, जैसे कि दशानन रावणके द्वारा जगज्जननी सीताका हरण हुआ था ॥ २९१/२॥ गिरिजा बोलीं—हे देव! आप तो सम्पूर्ण अर्थोंके ज्ञाता हैं, फिर मेरे प्रति आप क्यों ऐसी उदासीनता दिखा रहे हैं? आपके अंकमें बैठी आपकी अर्धांगिनीका हरण हो चुका है, फिर भी आप ध्यानमें कैसे मग्न हैं? मैंने आपकी अल्प भी सेवा नहीं की है, इसी कारण आप ऐसी निष्ठुरता दिखा रहे हैं ॥ ३०-३१॥ इस समय कौन ऐसा मित्र है, जो मुझे इस दैत्यके चंगुलसे छुड़ायेगा, कौन मेरा प्राणरक्षक होगा और कौन ऐसा बलशाली होगा, जो पुनः मुझे शंकरका दर्शन करायेगा ? ॥ ३२ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर उन देवी पार्वतीको शोकसे व्यथित देखकर गण उनसे कहने लगे। इस समय तीनों लोकोंका विनाश करनेवाले इस सिन्दूरके साथ युद्ध करनेकी हमारी शक्ति नहीं है ॥ ३३ ॥ भगवान् शिव ध्यानमें निमग्न हैं, दैववश इस दैत्यको अनुकूल अवसर प्राप्त हो गया है। फलतः यह दैत्य सृष्टि, स्थिति तथा अन्त करनेवाली हमारी माता पार्वतीको हर ले गया है। ये देवी सभी देवताओंको मोहित करनेवाली हैं, सभीके सब प्रकारके दुःखोंका हरण करनेवाली हैं, सौन्दर्यकी लहरी हैं और सब प्रकारसे शुभ करनेवाली तथा सभी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ हैं, इन्हें यह दैत्य हर ले गया है ॥ ३४-३५॥
श्रेष्ठ रत्नरूपा उन देवी पार्वतीको वह दैत्य कैसे ले गया और कैसे वे पुनः वापस आयेंगी? इस समय जबकि अपने नेत्रकी अग्निसे सभीका विनाश करनेवाले भगवान् शंकर ध्यानमें स्थित हैं ॥ ३६ ॥ गणोंके द्वारा इस प्रकारसे शोक करनेपर, हाहाकार करके रोनेपर भगवान् महेश्वर क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने शीघ्र ध्यान भंग किया ॥ ३७ ॥ वे अपनी क्रोधाग्निसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा दसों दिशाओंको जलाने लगे। तब उन्होंने उन गणोंसे पूछा कि कौन-सा संकट आ उपस्थित हुआ है? ॥ ३८ ॥ जिसने तुम्हें कष्ट पहुँचाया है, उसे मैं भस्म कर डालूँगा। भगवान् शंकरके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उस समय वे गण बोले— ॥ ३९॥ हे देव! आप जब ध्यानमें स्थित थे, उसी समय एक महान् दैत्य यहाँ आ उपस्थित हुआ, वह मन्दराचल- पर्वतके समान आकृतिवाला था और साक्षात् कालके समान ही उसका स्वरूप था ॥ ४० ॥ उसकी श्वासरूपी वायुके प्रवाहसे अचल होनेपर भी पर्वत चलित हो गये। हे शंकर! उसको देखनेमात्रसे ही देवता सम्मोहित हो गये। तब उस महाबलीने गिरिजा पार्वतीके बाल पकड़कर उन्हें उठा लिया और वह शीघ्र ही आकाशमार्गसे हमारी माताको हर ले गया ॥ ४१-४२॥ उसके द्वारा ले जायी जाती हुई माता पार्वती 'दौड़ो-जल्दी दौड़ो' इस प्रकारसे कह रही थीं, फिर वे मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ीं और हम सभी भी मूर्च्छित हो गये ॥ ४३ ॥ वैसी स्थितिवाली शिवाको वह दुष्ट मनोवृत्तिवाला दैत्य लेकर चला गया। उन गणोंके वचनोंको सुनकर भगवान् शिव अत्यन्त क्रोधसे प्रज्वलित हो उठे ॥ ४४ ॥ वे लोकोंको भस्म करते हुए-से अपने वाहन वृषपर आरूढ़ हो गये और उन्होंने अपनी दसों भुजाओंमें त्रिशूल आदि आयुधोंको धारण कर लिया ॥ ४५ ॥ वे दिशाओं तथा विदिशाओंको निनादित करते हुए आकाशमार्गसे होते हुए तत्क्षण ही वहाँ पहुँच गये, जहाँ वह सिन्दूर नामक दैत्य स्थित था ॥ ४६ ॥