भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 589, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 589

क्री०ख०-अ०१२८ ] * ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना * ५८७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

भगवान् शिवने उसकी पीठपर प्रहार किया, तब वह दैत्य उनके सामने खड़ा हो गया। भगवान् शिवने उससे कहा—अरे महादुष्ट ! तुम मेरी भार्याको छोड़ दो। प्रसन्न होकर तुम कहाँ जा रहे हो ? ॥ ४७ ॥ शिवद्वारा इस प्रकारसे कहा गया वह दैत्य क्रोधके वशीभूत हो गया और तीनों लोकोंको जलाता हुआ-सा और बाहुओंसे प्रहार करता हुआ-सा वह शिवके समीप आ पहुँचा ॥ ४८ ॥ अभिमानके मदसे मोहित वह महादैत्य बोला— समस्त लोकोंका स्वामी मैं तुम-जैसे मच्छरके वाक्योंसे भयभीत होनेवाला नहीं हूँ। जिसकी श्वासवायुके निकलनेसे सुमेरुपर्वत भी तत्क्षण काँप उठता है, इस प्रकारकी शक्ति-सामर्थ्यवाले मेरे सामने तुम्हारी क्या गणना ! तुम मुझे अपना मुख मत दिखलाओ ॥ ४९-५० ॥ यदि तुममें मेरे साथ युद्ध करनेकी सामर्थ्य है, तभी युद्ध करो, यदि ऐसा नहीं तो तुम किसी दूसरी स्त्रीके साथ विवाह कर लो, ऐसा करनेसे तुम सुख प्राप्त करोगे ॥ ५१ ॥ अरे तुच्छ ! मच्छरके समान तुम मेरे साथ क्या युद्ध करोगे ? ऐसा कहकर वह दैत्य सिन्दूर बाहुयुद्ध करनेके लिये भगवान् शंकरके समीप आया ॥ ५२ ॥ उस समय देवी पार्वतीने अपने मनमें मयूरेशका स्मरण किया। तब उन दोनों भगवान् शंकर तथा दैत्य सिन्दूरके मध्य तत्क्षण ही देवेश्वर मयूरेश प्रकट हो गये। वे ब्राह्मणका रूप बनाये हुए थे, उनकी प्रभा करोड़ों सूर्योंके समान थी, उनके सभी अंग अत्यन्त मनोहर थे और वे नाना प्रकारके आभूषणोंसे भलीभाँति अलंकृत थे ॥ ५३-५४ ॥ उन मयूरेशने अपना अस्त्र परशु उन दोनोंके बीचमें करके दैत्यराज सिन्दूरको रोका और फिर वे द्विजश्रेष्ठ अत्यन्त मधुरवाणीमें उस सिन्दूरसे कहने लगे ॥ ५५ ॥ तुम तीनों लोकोंकी माता इन पार्वतीको शीघ्र ही मेरे समीपमें रख दो और फिर शंकरके साथ तबतक युद्ध करो, जबतक कि किसी एककी जय-पराजय नहीं हो जाती, इस युद्धमें जो जीतेगा, वही इन पार्वतीको प्राप्त करेगा। मेरा वचन झूठा नहीं होगा ॥ ५६१/२ ॥

ब्रह्माजी बोले—द्विजरूपधारी मयूरेशकी बात सुनकर सिन्दूर अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो गया और युद्धकी विशेष लालसा रखनेवाले उस दैत्य सिन्दूरने पार्वतीको उनके पास रख दिया। उन द्विजरूपधारी मयूरेश तथा पार्वतीके देखते-देखते वे दोनों—शिव और सिन्दूर युद्ध करने लगे ॥ ५७-५८ ॥ सिन्दूर और शिव—दोनों ही युद्धकी विविध कलाओंमें पारंगत थे, उस समय क्रोधसे उन दोनोंके नेत्र रक्तवर्णके हो गये थे। उन दोनोंका तेज और पराक्रम बराबरका था। उस दैत्य सिन्दूरने ज्योंही अपने बाहुपाशमें शंकरको आबद्ध करना चाहा, उसी समय मयूरेशके परशु नामक अस्त्रने अदृश्य होकर उस दैत्यकी छातीमें बलपूर्वक प्रहार किया ॥ ५९-६० ॥ उस प्रहारसे दैत्य सिन्दूरकी शक्ति जाती रही, तदुपरान्त भगवान् शिवने त्रिशूलसे उसपर आघात किया। तब शक्तिहीन हुए उस सिन्दूरसे द्विजश्रेष्ठ मयूरेशने उसके लिये हितकर बात करते हुए कहा— ॥ ६१ ॥ तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् शिवके साथ तुम्हारा युद्ध करना ठीक नहीं है, अतः पार्वतीकी प्राप्तिकी आशा छोड़कर तुम शीघ्र ही अपने घरको चले जाओ। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो ये शिव तुम्हें इस समय भस्म कर डालेंगे। द्विज मयूरेशके द्वारा इस प्रकार कहा गया वह दैत्य सिन्दूर पार्वतीकी अभिलाषा छोड़कर पृथ्वीलोकको चल पड़ा ॥ ६२-६३ ॥ तदनन्तर भगवान् शिवको विजयकी प्राप्ति होनेपर वे पार्वती उन द्विजरूपधारी मयूरेशसे बोलीं—हे मुनिश्रेष्ठ ! आप कौन हैं, जिनके द्वारा मैं उस दुष्टसे मुक्त करायी गयी हूँ ? आप मुझे अपना यथार्थ स्वरूप दिखायें, यह मुनिका वेश आपका स्वाभाविक वेश नहीं है। आप मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, आपने मुझे जीवन प्रदान किया है, अतः आप मेरे सखारूप हैं। हे द्विजश्रेष्ठ ! प्राणोंका दान करनेपर भी आपके उपकारको चुकाया नहीं जा सकता ॥ ६४-६५१/२ ॥ पार्वतीके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे मुनीश्वर मयूरेश उनसे बोले—हे माता ! मैंने यहाँ कुछ भी नहीं