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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 590, कुल 656 में से

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पृष्ठ 590

५८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- किया है, भगवान् महेश्वरने ही दैत्यपर विजय प्राप्त की है और आपको दैत्यके बन्धनसे भी भगवान् शिवने ही छुड़ाया है। ऐसा कह करके वे विनायक द्विजस्वरूपको छोड़कर अपने पूर्वरूपमें हो गये ॥ ६६-६७१/२॥ उनका शरीर दस भुजाओंसे सुशोभित होकर अत्यन्त सुन्दर लग रहा था, उनके कान कुण्डलोंसे मण्डित थे। उनके मस्तकपर कस्तूरीका तिलक लगा हुआ था। वे रत्नों तथा मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित थे। नाना प्रकारके अलंकारोंसे वे मनोहर लग रहे थे। उन्होंने कण्ठमें शेषनागको धारण कर रखा था, जिसकी मणिकी प्रभासे वे सुशोभित हो रहे थे ॥ ६८-६९ ॥ तब इस प्रकारके स्वरूपवाले परमात्माको देखकर पार्वतीजी अत्यन्त प्रसन्न हो उठीं। उन्होंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया तो उन मयूरेशने उन्हें उठाकर उनसे कहा- ॥ ७० ॥ विनायक बोले- त्रेतायुगमें मैंने आपसे कहा था कि मैं आपको पुनः दर्शन दूँगा और द्वापरयुगमें आपके घरमें गजानन नामसे अवतार धारण करूँगा तथा अपने ओजसे दैत्य सिन्दूरका वध करूँगा ॥ ७११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-मुनिका रूप धारण किये हुए वे देव मयूरेश इस प्रकार देवी पार्वतीसे कहकर अन्तर्धान हो गये। तब वे देवी पार्वती सोचमें पड़ गयीं और अंत्यन्त मूर्च्छित हो गयीं। तब भगवान् विश्वनाथ उनसे बोले- हे प्रिये ! अपने मनको स्वस्थ करो ॥ ७२-७३ ॥ तुम अपने हृदयमें उन अविकारी विनायकका दर्शन करो, उनका कहा हुआ मिथ्या नहीं होता है, उन्होंने जैसा कहा है, वे वैसा ही करेंगे ॥ ७४ ॥ इस प्रकार कहकर भगवान् महादेव देवी पार्वतीके साथ वृषपर आरूढ़ हुए और अत्यन्त प्रसन्नताके साथ पर्वतराज कैलासपर चले आये ॥ ७५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'पार्वतीकी बन्धनसे मुक्तिका वर्णन' नामक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२८ ॥ एक सौ उनतीसवाँ अध्याय सिन्दूरके अत्याचारसे पीड़ित देवताओं तथा ऋषियोंद्वारा विनायककी स्तुति, दुःखप्रशमनस्तोत्र और उसका माहात्म्य, विनायकद्वारा सिन्दूरके वधका आश्वासन दिया जाना, माता पार्वतीके गर्भमें तेजःपुंजका प्रकट होना, उस तेजसे सन्तप्त पार्वतीका भगवान् शिव तथा गणोंके साथ पर्यली नामक वनमें जाना और वहाँ सखियोंके साथ निवास करना ब्रह्माजी बोले- सिन्दूर नामक वह दैत्य कैलाससे मृत्युलोकमें आया और बड़े ही गर्वसे उसने गर्जना की। उस भीषण ध्वनिसे सभी पर्वत कम्पित हो उठे और वृक्ष भूमिपर गिर पड़े ॥ १ ॥ पक्षी, सिंह और अन्य हिंसक जीव-जन्तु वनमें भ्रमण करने लगे। तदनन्तर उस महादैत्य सिन्दूरने सभी राजाओं और सभी वीरोंको जीत लिया ॥ २ ॥ ब्रह्मा आदि देवता भी जिसके द्वारा जीत लिये गये थे, भला उसके साथ सामान्य राजागण कैसे युद्ध करते ! कुछ राजाओंको काटकर उसने दो टुकड़ोंमें विभक्त कर दिया और कुछ आकाशमें चक्कर काटने लगे ॥ ३ ॥ कुछ राजा जो उसके सामने युद्ध कर रहे थे, वे वीरगति प्राप्तकर स्वर्ग चले गये। कुछ राजा उसकी शरणमें आ गये और उन्होंने उसकी सेवा करना स्वीकार कर लिया ॥ ४ ॥ कुछ राजा अपने अधिकारसे वंचित हो गये तो उन्होंने उसका सेवक होना स्वीकार नहीं किया और वे अभिमानपूर्वक वन चले गये। इस प्रकार सभी राजाओंको जीत लेनेके पश्चात् उस दैत्य सिन्दूरने मुनियोंपर आक्रमण करनेका विचार किया। उस दुष्ट बुद्धिवाले दैत्य सिन्दूरने एकाएक मुनियोंको बन्धनमें डाल दिया। उस समय कुछ मुनिजन अपना शरीर छोड़कर स्वर्ग चले गये ॥ ५-६ ॥ कुछ मुनिगण मेरुकी कन्दरामें चिन्तारहित होकर रहने लगे। कुछ मुनियोंको उसने मार डाला और Kalyana Visheshank 2021_Section_20_1_Back