श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 592, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- देवता अत्यन्त आनन्दित हो उठे। वे कहने लगे—प्रभुके | कारण समस्त दिशाओं तथा विदिशाओंको द्योतित कर स्वरूपका जैसा हमने ध्यान किया था, वे ही अखिल | रही थीं। उनके जाते समय सभी प्रकारके वाद्य बज रहे विश्वके स्वामी ये [उसी रूपमें] हमारे सामने प्रकट हो | थे। भगवान् शिव पार्वतीके साथ विविध गणोंसे समन्वित गये हैं, ये हमारे दुःखको अवश्य ही दूर करेंगे, इसमें कोई | होकर भूलोकको गये और उन्होंने बहुत-से वनोंमें भ्रमण विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २६१/२ ॥ | किया। इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने पर्यली तदनन्तर चिन्तामें पड़े हुए उन देवोंसे भगवान् विनायक | नामक एक विशाल वन देखा ॥ ३६-३७॥ बोले—हे देवो ! आप लोग बिलकुल भी चिन्ता न करें, मैं | पार्वतीके मनको सुन्दर लगनेवाले उस पर्यली नामक उस दैत्य सिन्दूरको मार डालूँगा। आपने जो मेरी स्तुति की | वनमें उन्होंने विश्राम किया। वह वन विविध प्रकारके है, वह स्तुति दुःखका शमन करनेके कारण दुःखप्रशमन- | पुष्पोंसे समन्वित तथा नाना प्रकारके फलोंसे युक्त वृक्षों- स्तोत्रके नामसे प्रसिद्ध हो जायगी ॥ २७-२८ ॥ | वाला था। वह वन अनेक सरोवरों तथा वापियोंसे युक्त इस स्तोत्रके पाठ करनेसे मेरे अनुग्रहके कारण आप | था। वहाँ वृक्षोंकी घनी छाया व्याप्त थी। वह वन अत्यन्त लोगोंका कष्ट दूर हो जायगा। जो एक समय अथवा | रमणीय था। वहाँपर उष्णता (सूर्यकी प्रतप्त किरणों) - का प्रातः-सायं—दो समय अथवा प्रातः-मध्याह्न एवं सन्ध्या— | प्रवेश नहीं हो पाता था। वह वन कैलासशिखरके समान तीनों कालोंमें इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसे कभी भी तीनों | शीतलता प्रदान करनेवाला था ॥ ३८-३९ ॥ प्रकारका अर्थात् आधिदैविक, आध्यात्मिक और | वह पर्यली नामक वन नन्दनवन तथा चैत्ररथ वनसे आधिभौतिक—दुःख अणुमात्र भी नहीं होगा ॥ २९१/२ ॥ | भी अधिक शोभासे सम्पन्न था। उस वनको देखकर हे देवो ! अब मैं भगवान् शिवके घरमें अवतार लेकर | गिरिजा कहने लगीं— हे शिव ! मुझे मेरी इच्छाके गजानन नामसे प्रसिद्ध होऊँगा, और सभी प्रकारके अर्थोंकी | अनुकूल वन प्राप्त हो गया है। हे विभो! हम यहाँपर सिद्धि देनेवाला बनूँगा। मैं सिन्दूर आदि बड़े-बड़े दैत्योंका | चिरकालतक क्रीड़ा करेंगे। गणोंका भी उस समय उस वध करूँगा और विविध प्रकारकी लीलाओंको दिखाते | वनसे प्रेम हो गया था ॥ ४०-४१ ॥ हुए माता पार्वतीकी सेवा करूँगा ॥ ३०-३११/२ ॥ | तदनन्तर गणोंने देवी पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये ब्रह्माजी बोले—देवताओंसे इस प्रकार कहकर | वहाँ एक मण्डपका निर्माण कर दिया। वह मण्डप देव विनायक अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर कुछ काल | विविध वेदियों तथा गृहोंसे युक्त था और गृहस्थ- व्यतीत होनेके अनन्तर भगवान् शिवके अनुग्रहसे हिमवान्की | सम्बन्धी विविध सामग्रियोंसे सम्पन्न था ॥ ४२ ॥ पुत्री देवी पार्वतीने गर्भ धारण किया। वह गर्भ दिन- | भगवान् शिवने देवी पार्वतीसे कहा कि तुम गणोंके प्रतिदिन उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा | साथ यहाँ निवास करो। तुम्हें जो-जो भी अभीष्ट होगा, कला-प्रतिकला बढ़ता रहता है ॥ ३२-३३ ॥ | ये वे सभी वस्तुएँ मेरे अनुग्रहसे तुम्हें प्रदान करेंगे ॥ ४३ ॥ तदनन्तर उस गर्भके तेजसे सन्तप्त हुई पार्वतीको | तब भगवान् शिव वहाँसे शीघ्र ही चल पड़े और गर्भकालीन इच्छा जाग्रत् हुई। तब वे भगवान् शंकरसे | हिमालयपर आकर ध्यानमें निमग्न हो गये। वे पार्वती बोलीं- हे शंकर ! मैं अपने गर्भके तेजसे अत्यन्त सन्तप्त | अपनी सखियोंके साथ उस पर्यली नामक वनमें यथेच्छ हो गयी हूँ, अतः जहाँ पर्याप्त ठण्डक हो, ऐसे स्थानपर | विहार करने लगीं। उन पार्वतीको चारों ओरसे घेरकर मुझे ले चलिये। तदनन्तर भगवान् शंकर वृषपर आरूढ़ | करोड़ों गण उनकी रक्षा किया करते थे। वे सभी गण हुए और उन्हें भी वृषभकी पीठपर बैठाया ॥ ३४-३५ ॥ | माता पार्वतीकी आज्ञाके अधीन थे और कन्द-मूल तथा देवी पार्वती महान् तेजके पुंजसे समन्वित होनेके | फलका भक्षण करनेवाले थे ॥ ४४-४५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'गौरीके दोहदका वर्णन' नामक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२९ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_20_2_Back