भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 593, कुल 656 में से

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पृष्ठ 593

क्री०ख०-अ०१३० ] * पार्वतीजीके गर्भसे गजाननका आविर्भाव * ५९१

एक सौ तीसवाँ अध्याय पार्वतीजीके गर्भसे गजाननका आविर्भाव तथा उनके विलक्षण स्वरूपको देखकर विस्मित पार्वतीको शिवजीके द्वारा प्रबोधित किया जाना

ब्रह्माजी बोले—तदुपरान्त नौवाँ मास पूर्ण होते ही पार्वतीजीने एक बालकका प्रसव किया। उस शिशुके सुन्दर नेत्र कमलकी शोभाको जीतनेवाले थे और उसका मुख चन्द्रमाके सदृश आह्लादक था॥ १ ॥ [जन्मके समय ही उस बालकने] मुकुट तथा केयूर धारण कर रखा था, उसकी देहकान्ति करोड़ों सूर्योंके सदृश थी, प्रवाल (मूँगा या किसलय)-के सदृश [अरुण] शोभामय उसके अधर थे। बालकके चार भुजाएँ शोभित थीं, जिनमें उसने परशु, कमल, माला और मोदक धारण कर रखा था। वह [कण्ठमें] मोतियोंका हार और [हाथोंमें] सुन्दर कंकण धारण करके शोभा पा रहा था। उसके कमलकी-सी कान्तिवाले चरणतल ध्वज, अंकुश, कमल आदि चिह्नोंसे युक्त थे। उस सुन्दर शिशुके सुन्दर गुल्फ-युगल (दोनों टखने) किंकिणीजालसे सुशोभित थे। वह अत्यन्त सौन्दर्यसम्पन्न था। बालकका चन्द्रमासे युक्त ललाट कोटि-कोटि चन्द्रमण्डलोंकी-सी शोभावाला और अग्निके सदृश तेजोदीप्त था। शिशुके ऐसे [विस्मयावह] स्वरूपको देखकर [सहसा] पार्वतीजी काँपने लगीं [किन्तु अगले ही क्षण अपने पुत्रके रूपमें देवाधिदेव विनायकको आया देख] आनन्दमग्न हो गयीं ॥ २-५॥ [वात्सल्य और विस्मय—दोनों ही भावोंसे समन्वित पार्वतीजी कहने लगीं—अरे!] नेत्रोंको ढँक लेनेवाला यह कैसा महातेज उदित हुआ है? हे देव! [मुझपर] कृपा करो और बताओ कि तुम कौन हो? [हे प्रभो! मैं चाहती हूँ कि तुम शिशुरूप होकर मेरे] चित्तको आनन्दित करो। ऐसा कहकर पूर्वकालके वचनोंका स्मरण करती हुई पार्वतीजीने उनको प्रणाम किया। तब वे तेजोमूर्ति गणपति कहने लगे कि हे मातः! उद्विग्न मत होइये। मैं अनेकानेक ब्रह्माण्डोंकी रचना करनेवाला गुणेश हूँ। मेरे असंख्य अवतार हुए हैं, जिन्हें देवगण भी नहीं जानते ॥ ६-८॥ हे शिवको आनन्दित करनेवाली! मैं ही [ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नामक] तीन रूपोंको धारणकर इस विश्वप्रपंचका सृजन, पालन तथा संहार करता हूँ॥ ९॥ मैंने ही पूर्वकालमें त्रेतायुगमें तुम्हारे भवनमें लीलावश अवतीर्ण होकर सिन्धु नामक असुरका संहार और नानाविध चरित्र किये थे। उस समय मेरा नाम मयूरेश था, वर्ण श्वेत था और मैंने छः भुजाएँ धारण की हुई थीं। उसी कालमें मैंने तुम्हें वचन दिया था कि द्वापरयुगमें मैं पुनः तुम्हारी सन्तान बनकर सेवा करूँगा। हे पवित्र मुसकानवाली देवि! उस समस्त वृत्तान्तका स्मरण करो कि [कैसे उस समय] ब्राह्मणके रूपमें आकर मैंने सिन्दूरासुरसे तुमको छुड़ाया था ॥ १०–१२ ॥ हे पार्वती! तब भी मैंने यह बात कही थी कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूँगा। वह जो मेरा वचन था, उसे मैंने सत्य कर दिया है। हे मातः! मैं अब महाबली सिन्दूरासुरका संहार करके भूमिभारका हरण करूँगा तथा आपकी सेवा करूँगा। [और इसके बाद]-भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला मैं 'गजानन' इस नामसे विख्यात होऊँगा ॥ १३-१४१/२॥ ब्रह्माजी बोले-[गजाननकी] इन बातोंको सुनकर देवी गौरीको समस्त प्राचीन वृत्तान्तका स्मरण हो आया और वे उन देवेश, विश्वेश, विघ्नविनाशक भगवान् गजाननकी स्तुति करने लगीं ॥ १५१/२॥ गौरीजीने कहा—जो चिदानन्दघन, निर्विकल्प ब्रह्मस्वरूप हैं, जो निराकार होनेपर भी गुणोंके भेदसे [ब्रह्मादिरूपोंमें] साकार हो जाते हैं। जो अणुसे भी अणुतर अर्थात् अतिसूक्ष्म तथा स्थूलसे भी अधिक स्थूल एवं व्यापक हैं, उन भक्तवत्सलको नमस्कार है ॥ १६-१७ ॥ जो अव्यक्त होकर भी [स्वेच्छावश] रजोगुण, तमोगुण तथा सत्त्वगुणका आश्रय लेकर