श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 594, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५९२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- रूपोंमें] प्रकट होते हैं। जो मायाके अधिपतियोंकी भी [गणपतिदेव] हैं, इनके चारों युगोंमें पृथक्-पृथक् चार मायाके नियामक हैं, समस्त मायाओंको जाननेवाले एवं स्वरूप हैं। सत्ययुगमें इनकी दश भुजाएँ थीं और ये प्रभावसम्पन्न हैं। जो चारों वेदोंसे अज्ञेय हैं तथा जिन्हें 'विनायक' इस नामसे प्रसिद्ध हुए। त्रेतायुगमें इनका वर्ण मन भी समझ नहीं सकता, ऐसे आप नित्य, सर्वाधार, शुक्ल था, भुजाएँ छः थीं और मयूरराट् अर्थात् मयूरेश परात्पर सर्वान्तर्यामीको नमस्कार है ॥ १८-१९ ॥ नाम हुआ ॥ २८-२९ ॥ हे विभो ! यह मेरा परम सौभाग्य है कि वे [साक्षात् हे प्रिये ! जिन्होंने अपने (हमारे) भवनमें परब्रह्मस्वरूप] आप मेरे पुत्र बनकर अवतीर्ण हुए हैं। हे [पूर्वकालमें] अवतीर्ण होकर सिन्धु दैत्यका संहार विभो ! मैं तो आपके [आगमनकी] प्रतीक्षा ही कर रही करके [विश्वका] रक्षणकार्य सम्पन्न किया था, वे ही थी। आपने आकर प्रत्यक्ष दर्शन दिया है। अब कभी [गणपतिदेव] आज पुनः अरुण वर्ण तथा चार भुजाओंसे आपसे मेरा वियोग न हो सके, वैसा [अनुग्रह] कीजिये। शोभित होकर हम लोगोंके भवनमें अवतीर्ण हुए हैं और जब पार्वतीजी ऐसा कह ही रही थीं, तभी गणपतिदेवने [कालान्तरमें] मूषकारूढ़ होकर सिन्दूर दैत्यका वध दूसरा रूप धारण कर लिया ॥ २०-२१ ॥ करेंगे तथा पृथ्वीके भारका हरण करेंगे ॥ ३०-३१ ॥ उस समय शुण्डादण्डसे युक्त अर्थात् हाथीके इस समय ये देवेश 'गजानन' इस नामसे त्रैलोक्यमें सदृश आकृतिवाले, चतुर्भुज, चन्द्रमासे युक्त शिरोदेशवाले, विख्यात होंगे। हे देवि ! ये ही कलियुगमें सुन्दर नेत्रों तथा नाना भूषणोंसे विभूषित, चिन्तामणि नामक दिव्य मणिसे चार भुजाओंसे समन्वित हो 'धूम्रकेतु' इस सुन्दर नामसे शोभायमान हृदयवाले, दिव्याम्बरविभूषित, दिव्य गन्धसे भूतलपर प्रसिद्ध होंगे। भगवान् शंकरके वचनोंको सुनकर अनुलिप्त देहवाले वे सिद्धि तथा बुद्धिके सहित प्रकट वे बालरूप गणपति स्पष्ट रूपसे कहने लगे ॥ ३२-३३ ॥ होकर भोले-भाले बालककी भाँति रुदन करने लगे। बालरूप गणपति बोले- हे शिव ! आपने मेरे जब तन्वंगी पार्वतीजीने उनके इस रूपको देखा तो वे स्वरूपको भलीभाँति जाना है, आप यथार्थ ही कह अत्यन्त शोकाकुल हो गयीं। [वे विलाप करने लगीं रहे हैं। मैं आपकी सेवा करनेके लिये और देवताओं कि] किसने मेरी निधि अर्थात् सर्वस्वरूप पुत्रका हरण तथा सभी राजाओंको मारनेवाले सिन्दूरासुरका वध कर लिया है। सूँडसे युक्त बालक तो तीनों लोकोंमें करनेके लिये आपके घरमें अवतीर्ण हुआ हूँ। हे कहीं भी नहीं देखा गया है। जब ब्रह्मा आदि [देवगण] शंकर! ब्राह्मणोंको उत्पीड़ित करनेवाले त्रिलोकविजयी तथा [दूसरे भी] लोग इस प्रकारके शिशुको देखेंगे तो उस असुरका संहार करके मैं विश्वको आह्लादित उपहास करेंगे ॥ २२-२४१/२ ॥ करूँगा ॥ ३४-३५१/२ ॥ ऐसे भाँति-भाँतिके शोकपूर्ण विलापको सुनकर भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला मैं [सिन्दूरासुरके भगवान् शंकर अपने गणोंके साथ भवनमें आ पहुँचे और कारण अवरुद्ध हुए] वैदिक यज्ञ-यागादि सत्कर्मोंका उस शिशुको गोदमें लेकर पार्वतीसे कहने लगे- हे प्रिये ! [पुनः] प्रवर्तन करूँगा और वरेण्य [नामक राजा]-को मेरी बात सुनो। शुण्डादण्डसे विभूषित [यह बालक] [मनोवांछित] वर तथा आत्मविज्ञान भी प्रदान करूँगा। आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित साक्षात् गणपतिदेव ही वह वरेण्य मेरा भक्त है और [सर्वदा] मेरा ही ध्यान हैं, जिनके स्वरूपका निरूपण करनेमें चारों वेद, शास्त्र करता रहता है। वह देवता, ब्राह्मण, अतिथि आदिका तथा विशिष्ट मुनिगण भी सक्षम नहीं हैं। हे प्रिये ! पूजन करनेवाला, पंच महायज्ञोंके अनुष्ठानमें निरत, नानाविध कृत्योंवाले विश्वप्रपंचमें इन्होंने ही देवताओंको सत्यभाषी, पवित्र, सदाचारी तथा पुराणोंके श्रवणमें नियुक्त किया है ॥ २५-२७ ॥ तन्मय रहता है ॥ ३६-३८ ॥ ये सबके अन्तर्यामी, अनेकानेक ब्रह्माण्डोंके आविष्कर्ता उसकी भार्याका नाम पुष्पिका है, जो धर्मपरायण,