श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 595, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१३१ ] * शंकरजीकी आज्ञासे नन्दीका शिशुको वरेण्यपत्नीके पास ले जाना * ५९३ पतिव्रता, पतिके वचनोंका अनुसरण करनेवाली और प्राणोंके समान पतिसे प्रीति रखनेवाली है॥ ३९॥ उन दोनोंने बारह वर्षोंतक दारुण तपस्या की थी, तब मैंने उनको वरदान दिया था कि अवश्य ही मैं तुम्हारे पुत्रके रूपमें अवतीर्ण होऊँगा ॥ ४० ॥ उस पुष्पिकाने आज ही प्रसव किया है और उसके शिशुका राक्षस (राक्षसी)-ने अपहरण कर लिया है। [अब वह पुत्रवियोगके कारण] प्राण त्याग देगी, इसलिये मुझको वहाँ ले चलो। भगवान् शिवने जब बालगणपतिकी ऐसी बात सुनी तो हर्षित हो उठे और उन्होंने भक्तिभावसे नानाविध वाङ्मयपुष्पों अर्थात् स्तोत्रोंके द्वारा उन बालगणेशका पूजन किया ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'गजाननके आविर्भावका वर्णन' नामक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३० ॥ एक सौ इकतीसवाँ अध्याय भगवान् शंकरकी आज्ञासे नन्दीका शिशु गजाननको वरेण्यपत्नीके पास ले जाना ब्रह्माजी बोले-तदुपरान्त भगवान् शिव विचार करने लगे कि इस बालकको किस प्रकार वहाँ ले जाया जाय ? उन (-के मनोभाव) - को जानकर नन्दीने शिवजीसे कहा- हे स्वामी ! आपके अनुग्रहसे मैं समुद्रोंको अवश्य ही सुखा सकता हूँ तथा पर्वतोंको भी चूर्ण कर सकता हूँ। इसलिये आपके मनमें जो कर्तव्य विद्यमान है, उसको सम्पन्न करनेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले- नन्दीके कथनसे सन्तुष्ट हुए भगवान् शंकर उनसे कहने लगे। शिवजी बोले- हे नन्दिकेश्वर ! मेरे मनोभावको प्रकाशित करते हुए तुमने उत्तमोत्तम बात कही है। सैकड़ों बार मैंने तुम्हारे सामर्थ्यका परिचय पाया है। अब इस समय जो कर्तव्य उपस्थित हुआ है, उसे मैं बता रहा हूँ, तुम उसको पूर्ण करो ॥ ३-४ ॥ महानगरी माहिष्मतीमें वरेण्य नामसे विख्यात महाबली नरेश हैं, जो विविध धर्मों (जातिधर्म-कुलधर्मादि) -के अनुष्ठानमें निरत रहते हैं। उनकी महाभागा धर्मपत्नीका नाम पुष्पिका है। उसने अभी-अभी प्रसव किया और [प्रसवश्रमके कारण] वह सोयी हुई है। [रानीको सोयी जानकर] किसी राक्षसीने उसके पाससे शिशुका अपहरण कर लिया है, इसलिये जबतक कि वह कल्याणी सोयी है, उसी बीचमें इस बालकको तुम रानीके समीप शीघ्र ही पहुँचा दो ॥ ५-७॥ ब्रह्माजी बोले- भगवान् शंकरके द्वारा दी गयी इस आज्ञाको सुनकर नन्दीने तत्काल पार्वतीपुत्रको उठाया और त्वरापूर्वक आकाशमार्गसे जाकर उस बालकको शीघ्र ही रानीके समीप पहुँचा दिया। रानी सो रही थी, इसलिये इस घटनाको वह जान न सकी। तदुपरान्त वे नन्दिकेश तत्काल ही [आकाशमें] उड़े और महेश्वरके समीप जा पहुँचे तथा मार्गमें जो कुछ उन्होंने किया था, वह सब वृत्तान्त बताने लगे ॥ ८-९ १/२ ॥ [ नन्दिकेश्वर बोले- ] हे देव ! हे विभो ! [ जब मैं जा रहा था कि] सहसा आकाशमें भयंकर रूपवाली एक राक्षसी मुझे रोककर खड़ी हो गयी। वह बालकके मांसका भक्षण कर रही थी। तब मैंने आपके अनुग्रहसे उस राक्षसीको अपनी पूँछमें लपेट लिया और [चारों ओर] उसे घुमाकर एक विशाल पर्वतशिखरपर फेंक दिया। हे प्रभो ! आपके नामका उच्चारण करके [जब मैंने उसे क्रोधपूर्वक फेंका तो] उसके सैकड़ों खण्ड हो गये ॥ १०-१२ ॥ इसके पश्चात् मैंने दुरात्मा गन्धर्वोका विशाल समूह देखा, तो सोचने लगा कि किस प्रकार इनसे युद्ध किया जाय और शिशु (गौरीपुत्र)-को बचाया जाय। हे शंकर ! तब इस प्रकार चिन्ताकुल होकर मैंने मन-ही-मन आपका स्मरण किया। तदुपरान्त अपनी पूँछ, सींग, क्रोधपूरित निःश्वास, लातोंके प्रहार और हुंकारोंसे उन सभी