भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 597, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 597

क्री०ख०-अ० १३२ ] * सिन्दूरका गजाननको ले जाकर नर्मदामें फेंकना * ५९५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ]

यदि [ऐसी बात कहनेवाला] आँखोंके सामने आ जाय तो मैं उसे पूरा-का-पूरा चबा डालूँ। मैं तो स्वयं ही सबका काल हूँ, पश्चिम दिशामें हुए सूर्योदयके समान मेरी कैसे मृत्यु हो सकती है? ॥ ७॥ ऐसा कहकर वह उठ खड़ा हुआ और दिशा- विदिशाओंको [अपनी गर्जनासे] ध्वनित करता हुआ सहसा उड़ने लगा और भगवान् शंकरके निवासस्थान कैलासपर्वतकी ओर चल पड़ा ॥ ८ ॥ उस समय वह अपने शरीर (के उड़नेसे उत्पन्न हुई)-वायुसे पर्वतोंको चूर्ण करता और वृक्षोंको उखाड़ता हुआ जा रहा था। उसके कारण [भूतलके आधार देवता] कूर्म तथा शेषनाग चलायमान हो गये और पृथिवी काँपने लगी। [कैलास पहुँचकर जब] उसने वहाँ शिवको नहीं देखा तो पुन: पृथ्वीलोकमें आ गया और शिवको खोजता हुआ वेगपूर्वक समस्त भूतलपर भटकने लगा। क्रोधमें भरा हुआ [वह भटकते-भटकते] 'पर्यली' नामक विशाल जंगलमें आ पहुँचा और तब वहाँ उसने दूरसे ही पार्वतीजीके साथ स्थित भगवान् शंकरको देखा ॥ ९-११॥ उसने वहाँ आवासमण्डप, सरोवर, उनमें खिले कमल और शिवगणोंको देखा। इसके बाद वह सहसा पार्वतीजीके लिये बनाये गये सूतिकागृहकी ओर चल पड़ा। जब वहाँ उसने बालकको नहीं देखा तो जलती हुई अग्निके समान कुपित हो उठा। इसके बाद वह सोचने लगा कि आकाशवाणी असत्य नहीं हो सकती। [आकाशवाणीने कहा है कि] इसका पुत्र मुझे मारेगा, किंतु हो सकता है कि अभी वह उत्पन्न ही न हुआ हो। अतः इस समय मैं इसी (पार्वती)-को मार डालता हूँ, जिससे [शत्रुका] मूल ही नष्ट हो जायगा ॥ १२-१४॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारका मनमें सोच-विचार करके उसने [पार्वतीको] मारनेके लिये शस्त्र उठाया और जबतक कि वह उमाकी हत्या कर पाता, तबतक उस दुष्टको अपने समक्ष एक शिशु दिखायी पड़ा ॥ १५ ॥ चार भुजाओंसे युक्त वह मनोहर शिशु मुकुट तथा बाजूबन्दसे विभूषित था। उस बालकने परशु, कमल

[दायाँ स्तम्भ]

तथा मालाको धारण कर रखा था। उसके कटिदेशमें शेषनाग [लिपटे थे] और कण्ठमें हार तथा चरणोंमें नूपुर [शोभायमान] थे। यह आश्चर्यजनक दृश्य देखकर और पार्वतीजीको सोयी हुई जानकर वह तत्काल ही पार्वतीके वधसे विरत हो गया ॥ १६-१७॥ उसने बालकको हाथमें उठा लिया और उसे महासागरमें फेंकनेकी कामना करने लगा। इस प्रकारका निश्चित संकल्प करके वह आगे चल पड़ा। तभी वह बालक अपने आपको बढ़ाने लगा और मानो दूसरे हिमालयकी भाँति [भारवाला] हो गया। तब क्षणभरमें ही उसके अतिशय भारसे व्याकुल सिन्दूर काँप उठा ॥ १८-१९॥ उसकी साँसें बढ़ने लगीं तथा वह अपनी शक्तिसे [तनिक भी] आगे चल पानेमें सक्षम नहीं रहा, तब व्याकुल होकर दैत्यने उस बालकको छोड़ दिया ॥ २० ॥ जब तीव्र रव करता हुआ वह बालक भूतलपर गिरा तो पर्वत हिलने लगे और उस घोषके कारण पृथिवी काँप उठी। नाना प्रकारसे चीत्कार करते हुए पक्षीगण आकाशमें घूमने लगे, सातों महासागर क्षुब्ध हो गये तथा ब्रह्माण्ड भी मानो विदीर्ण-सा होने लगा ॥ २१-२२॥ वह बालक मुनिजनोंके समीप, नर्मदाके जलमें जा गिरा, तब वहाँ एक श्रेष्ठ तीर्थ प्रकट हुआ, जिसे गणेशकुण्ड कहा जाता है ॥ २३ ॥ इस तीर्थका स्मरण करते ही जीवनभरमें किया गया पाप क्षणमात्रमें नष्ट हो जाता है तथा इसका दर्शन करनेसे दस जन्मोंका और स्नान करनेसे सौ जन्मोंका पाप नष्ट होता है। अनुष्ठानपरायण होकर अर्थात् क्षेत्रसंन्यास लेकर इस तीर्थका जो लोग सेवन करते हैं, यह उन्हें मोक्ष प्रदान करता है॥ २४ १/२॥ [उस तीर्थमें गिरे हुए] बालक गणपतिके देहसे जो रुधिर निकला, उसके कारण वहाँकी शिलाएँ रक्तवर्ण हो गयीं और वे ही पापनाशक शिलाएँ 'नार्मद गणेश' के नामसे प्रसिद्ध हुईं। वे शिलाएँ दर्शन-पूजन आदिके द्वारा आराधित होनेपर भक्तोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करती हैं। इन नार्मद गणपतिशिलाओंकी समग्र महिमाका वर्णन हो पाना सम्भव नहीं है ॥ २५-२६ १/२ ॥

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क) · पृष्ठ 597, कुल 656 में से · BharatKosha