श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 598, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- तब अर्थात् उन गौरीनन्दनको फेंक देनेके पश्चात् | करेगा। इस प्रकारसे कहनेके उपरान्त वह भयानक पुरुष वह दैत्य हर्षित हो उठा कि मेरा शत्रु तो विनष्ट हो गया | अन्तर्धान हो गया ॥ ३१-३३ ॥ है। तभी उस कुण्डसे विशाल और भयानक एक पुरुष | तब अत्यन्त क्रोधके कारण उस दैत्यने सेवकोंसे प्रकट हुआ, जो अपनी जटाओंसे आच्छादित होनेके | कहा कि [अरे!] उसे पकड़ लो, पकड़ लो, जिसने ऐसे कारण ऐसा जान पड़ता था कि मानो लताओंसे आवृत | कठोर वाक्य कहे हैं ॥ ३४ ॥ कोई वटवृक्ष हो ॥ २७-२८ ॥ | [इसके उपरान्त] जब वह दैत्य उस पुरुषको कहीं दाढ़ोंके कारण उसका मुख अत्यन्त भयानक प्रतीत | भी न देख सका तो अपने स्थानपर लौट आया और मनमें हो रहा था और नागिनके जैसी उसकी जिह्वा थी। उसके | सोचने लगा कि जब उसे देखूँगा, तब जीत लूँगा। उस हाथ-पैर बड़े ही लम्बे थे तथा [वेगपूर्वक] श्वास | (बालक)-का यह जो इतना चरित्र था, उसे पार्वतीजी लेनेके कारण उस पुरुषके नेत्र चलायमान थे ॥ २९ ॥ | जान नहीं सकीं; क्योंकि उसकी मोहकारिणी मायाके वैसे आकार-प्रकारवाले पुरुषको देखकर क्रोधसे | कारण वे अत्यधिक मोहित हो चुकी थीं ॥ ३५-३६ ॥ विह्वल नेत्रोंवाला वह सिन्दूर दैत्य कहने लगा कि यह | तदुपरान्त पार्वतीजीने भगवान् शिवसे विनयपूर्वक मेरी किस गिनतीमें है ! ॥ ३० ॥ | कहा कि हे जगदीश्वर ! इस स्थानपर दैत्यकृत उपद्रव आरम्भ क्रोधपूर्वक ऐसा कहकर हाथमें खड्ग ले वह दैत्य | हो गये हैं, अतएव अब मैं कैलास जाना चाहती हूँ, यदि उस पुरुषको मारने चला और जबतक वह खड्ग-प्रहार | आपकी इच्छा हो तो मुझे वहीं ले चलिये ॥ ३७१/२ ॥ करता, तबतक वह पुरुष [वहाँसे अदृश्य होकर] | उनकी ऐसी बात सुनकर शंकरजीको भी प्रसन्नता आकाशमें दीख पड़ा तथा उस दैत्यसे बोला कि अरे | हुई और वे नन्दीपर तत्काल आरूढ़ होकर, सात करोड़ दैत्य ! तूने तो मुझे व्यर्थ ही भूतळपर फेंका है। रे मूढ़ ! | गणोंसे घिरे हुए, उसी क्षण पार्वतीसहित कैलास जा तुझे मारनेवाला तो कहीं और ही वृद्धिको प्राप्त कर रहा | पहुँचे। अपने भवनमें प्रविष्ट होकर पार्वतीजीको [उस है। सत्पुरुषोंकी रक्षामें तत्पर वह अवश्य ही तेरा वध | समय] अति प्रसन्नता हुई ॥ ३८-३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'कैलासाभिगमनका वर्णन' नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३२ ॥ एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय राजा वरेण्यके द्वारा गजमुखाकृति शिशुका भयभीत होकर वनमें परित्याग और पाराशरमुनिके द्वारा शिशु गजाननका पालन व्यासजी बोले- हे विधे! राजा वरेण्यके भवनमें | रानी पुष्पिकाने पुत्रको देखा। वह अलंकारोंसे समन्वित, [उनकी भार्या] पुष्पिकाके समीप [नन्दीके द्वारा] | चार भुजाओंसे युक्त तथा हाथीके जैसे मुखवाला था। पहुँचाये गये उन बालरूप गणपतिने कौन-सी लीला की, | उसका वर्ण अरुण था। कस्तूरी-तिलक और मोतियोंकी इसे मुझको सविस्तार बतलाइये ॥ १ ॥ | मालाओंसे वह शोभायमान था। उसने उत्तम अंगराग ब्रह्माजी बोले- हे वत्स! तुमने उचित प्रश्न | और पीताम्बर धारण किया था। नानाविध आभूषणोंसे किया है, जो हृदयको आनन्दित करनेवाला है। मैं वह | युक्त वह बालक तेजोमय शरीरवाला था ॥ ३-४१/२ ॥ समस्त पापनाशक वृत्तान्त विहित रीतिसे तुम्हें | वह पुष्पिका उस समय वैसे रूपवाले बालकको बतलाऊँगा ॥ २ ॥ | देखकर विस्मित तथा दुखी हो गयी और उसे भय लगने उस रात्रिके अर्थात् प्रसवकी रात्रि बीतनेके उपरान्त | लगा। तब शोकाकुल वह रानी हाथोंसे वक्षःस्थलपर