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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 599, कुल 656 में से

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पृष्ठ 599

क्री०ख०-अ०१३३] * राजा वरेण्यके द्वारा गजमुखाकृति शिशुका परित्याग * ५९७ आघात करती हुई बाहरकी ओर भाग चली। रानीके क्रन्दनको सुनकर दासियाँ वहाँ आयीं और उन्होंने भी उस अद्भुत आकार-प्रकारवाले बालकको देखा ॥ ५-७॥ इस वृत्तान्तका पता लगनेपर राजा वरेण्य भी अपने गणों (मन्त्री, पुरोहित आदि)-के साथ प्रसूतिकागृहमें आ पहुँचे। जब उन राजा आदिने वैसे अद्भुत बालकको देखा तो वे भी भयके कारण विचलित हो गये। वहाँ कुछ लोग अधीर होकर भाग खड़े हुए और कुछ मूर्च्छित हो गये तथा कुछ लोग राजासे कहने लगे कि इस प्रकारका बालक तो आजतक न जनमा है, न आगे ही जन्म लेगा। मनुष्योंके बीचमें न कभी कोई ऐसा बालक कहींपर देखा अथवा सुना ही गया है। इसे आपको अपने घरमें नहीं रखना चाहिये, यह तो वंशका नाश ही कर देगा ॥ ८-१०॥ सभी लोगोंकी ऐसी बातें सुनकर वे नरेश भयाकुल हो उठे और उन्होंने दूतों (सेवकों)-से कहा कि 'इस बालकको घने जंगलमें ले जाकर छोड़ दो' ॥ ११ ॥ तब वे सेवक बालकको लेकर ऐसे घने जंगलके बीचमें जा पहुँचे, जहाँ वायुका भी प्रवेश नहीं था। वहाँ उन्हें एक सरोवर दिखायी पड़ा, जिसके तटपर सेवकोंने बालकको फेंक दिया और उसे पत्तोंके द्वारा ढँककर तत्काल राजा वरेण्यके पास लौट आये ॥ १२-१३॥ वहाँ सभाके मध्यमें स्थित राजाको देखकर उन सेवकोंने प्रणाम किया, तदुपरान्त राजासे कहने लगे कि हे राजेन्द्र! हम लोग आपके आदेशानुसार सिंह- व्याघ्रादिसे भरे हुए वनमें उस बालकको छोड़कर लौट आये हैं। अबतक तो सम्भवतः वन्य पशुओंने उसका भक्षण भी कर लिया होगा ॥ १४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यासजी!] जबतक उस बालकका भक्षण करनेके लिये शृगाल [आदि वन्य जीव] आते, तबतक उसे करुणानिधि महर्षि पराशरने देख लिया। चार भुजाओंसे युक्त, हाथीके-से मुखवाले, दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित, नानाविध आभूषणोंसे समन्वित, चिन्तामणिसे अलंकृत, सर्पसे आवेष्टित उत्तम नाभिदेशवाले अर्थात् सर्पकी करधनी धारण किये हुए तथा करोड़ों सूर्यके सदृश देहकान्तिवाले उस शिशुको देखकर वे मोहित हो गये। वे मुनिवर समस्त ज्ञान-विज्ञानके आश्रय थे, तथापि उस बालककी मायाके कारण वे चिन्तित हो उठे और सोचने लगे कि 'क्या यह विघ्न मेरे विनाशके लिये इन्द्रने स्वार्थवश निर्मित किया है; क्योंकि उन्हें मेरी तपस्याका विनाश ही अभीष्ट है। सर्वदा पापसे डरनेवाले मैंने तो अल्पमात्र भी दुष्कृत्य नहीं किया। हे चन्द्रचूड ! हे दीनरक्षक ! इस महान् भयसे मेरी रक्षा कीजिये' ॥ १५-१९१/२ ॥ मुनिको इस प्रकार शोकाकुल देखकर भगवान् गजाननको बड़ी दया आयी और उन्होंने उनके मोहजालको नष्ट कर दिया, तब वे मुनिवर भक्तोंके रक्षणार्थ इस प्रकारका वेष बनाकर अपने समक्ष विद्यमान साक्षात् परब्रह्म परमात्मा उन गजाननको देख सके ॥ २०-२११/२ ॥ पराशरजी बोले- आज मेरा जन्म लेना सार्थक हो गया, मेरे माता-पिता तथा मेरी महान् तपश्चर्या भी धन्य हो गयी। आज मैंने आवागमनके चक्रसे अपनेको मुक्त कर लिया तथा अभीष्ट फल पा लिया। न जाने किस भाग्यहीनने इन बालरूप गजाननको वनके मध्यमें लाकर छोड़ दिया ॥ २२-२३ ॥ ब्रह्माजी बोले- ऐसा कहकर वे मुनि उस बालकको अपने आश्रममें ले गये। वहाँपर वात्सल्यमयी मुनिपत्नीने वैसे (विलक्षण रूपवाले) बालकको देखा और यह जानकर कि इसे मेरे पतिदेव लेकर आये हैं, वह स्नेहशीला [स्त्री] प्रसन्नतासे भर गयी ॥ २४१/२ ॥ तदुपरान्त उसने बालकको हृदयसे लगा लिया और प्राणेश्वर पतिदेवसे कहने लगी- हे स्वामिन् ! सुदीर्घकालसे की जानेवाली आपकी उत्कट तपश्चर्या आज सफल हो गयी। जिसके स्वरूपको ब्रह्मा, शिव, लक्ष्मीपति विष्णु तथा मुनिजन भी जान नहीं सके, उन (गजाननदेव)-का आज हम लोग प्रत्यक्ष अवलोकन कर रहे हैं ॥ २५-२६१/२ ॥ हे स्वामिन् ! जो प्रभु समस्त जगत्प्रपंचके स्रष्टा, रक्षक तथा संहारक हैं तथा नानाविध अवतार ग्रहण