भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 600, कुल 656 में से

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५९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करनेवाले हैं, जो भूभारका हरण करनेके लिये अवतीर्ण | पालन-पोषण किया जा रहा है, तो वे अतिशय हर्षित हुए हैं, जिनका साक्षात्कार कर पानेमें इन्द्रियोंके सहित | हो गये और उन्होंने खूब बाजे बजवाये तथा प्रत्येक घरमें मन भी कभी समर्थ नहीं होता, वे विश्वभर्ता प्रभु आज | शर्करा (मिठाई) बँटवायी। राजाने ब्राह्मणों तथा बन्धु- बिना प्रयत्नके अनायास ही दृष्टिगोचर हुए हैं, यह | बान्धवोंको [इस अवसरपर] सुवर्ण, रत्नराशि तथा हमलोगोंका महान् सौभाग्य है ॥ २७-२८ १/२ ॥ | वस्त्रादिके द्वारा सन्तुष्ट किया ॥ ३०-३२ ॥ ब्रह्माजी बोले- बालकका स्पर्श होते ही [नारी- | [उन बाल गजाननके आ जानेसे] गायें कामधेनुके सुलभ स्नेहके कारण] मुनिपत्नीके स्तन पुष्ट तथा | सदृश [प्रचुर दुग्ध देनेवाली] हो गयीं, सूखी बावडियाँ दुग्धयुक्त हो गये। बालक जब स्तनपान करने लगा तो | जलपूर्ण हो गयीं और उन पराशरमुनिके आश्रमके सूखे इससे मुनिपत्नी आनन्दविभोर हो उठीं ॥ २९ १/२ ॥ | वृक्ष भी फलोंसे लद गये। जो मनुष्य इस [गजाननलीलारूप तदुपरान्त जब उन राजा वरेण्यको यह सूचना मिली | वृत्तान्त] -का श्रवण करेगा, वह पुत्र तथा धन-वैभवसे कि दिव्य दृष्टिसम्पन्न महर्षि पराशरके द्वारा बालकका | सम्पन्न हो जायगा ॥ ३३-३४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'पराशरदर्शन' नामक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३३ ॥ एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पराशराश्रममें मूषकका प्रबल उपद्रव और गजाननका उसे दमितकर अपना वाहन बनाना ब्रह्माजी बोले- वह बालक अपनी लीलाओंके | प्राचीन कालकी बात है, इन्द्रकी सभामें क्रौंच नामक द्वारा माता-पिताको आनन्दित करता हुआ [महर्षि | श्रेष्ठ गन्धर्वने शीघ्रतावश वामदेवमुनिको चरणोंके अग्रभागसे पराशरके आश्रममें] दिन-अनुदिन वैसे ही बढ़ने लगा, | ठोकर मार दी, इससे [कुपित हुए] मुनिने उसे शाप दे जैसे [शुक्लपक्षमें] चन्द्रमा बढ़ता है ॥ १ ॥ | दिया कि हे गन्धर्व ! तू मूषक बन जायगा ॥ ७ १/२ ॥ व्यासजीने कहा- हे ब्रह्मन् ! हे प्रभो ! आप | क्रौंचने मुनिसे शापमुक्तिके लिये आदरपूर्वक प्रार्थना गुणेशके द्वापरयुगीन चरित्रोंका वर्णन कीजिये, उनके | की, तो वे उससे बोले कि तुम मृत्युलोकमें [जाकर] पूर्वकालिक चरित्रोंको सुनकर मैं तृप्त नहीं हो सका हूँ। | सभीके लिये अत्यन्त दुर्धर्ष मूषक बनोगे तथा तुमको हे चतुरानन ! इन [गौरीनन्दन]-का 'गजानन' यह नाम | नियन्त्रित करके भगवान् गुणेश्वर अपना वाहन बना कैसे हुआ और वाहन मूषक क्यों बना- यह सब मुझे | लेंगे। वे विश्वस्रष्टा गुणेश ही तुम्हारे प्रति सदय होकर विस्तारपूर्वक बतलाइये ॥ २-३ ॥ | मोक्ष प्रदान करेंगे। तब वह गन्धर्व मूषकके-से रूपवाला ब्रह्माजी बोले- इस विषयमें एक पुरातन इतिहास | हो गया और [स्वर्गसे च्युत होकर] महर्षि पराशरके [विद्वज्जन] बतलाते हैं, जिसमें भृगुवंशी कवि अर्थात् | आश्रम-परिसरमें आ गिरा ॥ ८-१० ॥ महर्षि शुक्रके साथ प्रह्लादका संवाद हुआ था ॥ ४ ॥ | वह पर्वतशिखरके सदृश विशाल तथा भयानक प्राचीन कालमें प्रह्लादजीने इसी प्रकार महामुनि शुक्रसे | आकृतिवाला और महान् पराक्रमसे सम्पन्न था। उसके पूछा था, तब उन्हें भगवान् कवि (शुक्राचार्य) -ने जो | रोम, नख तथा दाढ़ें- ये सभी अतीव दीर्घकार थे और बतलाया था, उसे इस समय [मुझसे] श्रवण करो ॥ ५ ॥ | वह प्रबल गर्जना कर रहा था ॥ ११ ॥ शुक्राचार्यने कहा- हे प्रह्लाद ! जिस कारणसे | उसने पराशरजीके आश्रममें घनघोर उपद्रव प्रारम्भ मूषक इन गजाननका वाहन बना, उसे मैं तुम्हें बता रहा | कर दिया। वहाँ जो अनाज रखा था, उसने सबका हूँ, उस [वृत्तान्त]-का तुम श्रवण करो, [क्योंकि] वह | भक्षण कर डाला और मिट्टीके बरतनोंको तोड़-फोड़ सुननेमात्रसे समस्त कामनाओंको सिद्ध करनेवाला है ॥ ६ ॥ | दिया। [आश्रममें रखी हुई] पुस्तकें, कपड़े, उत्तम

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