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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 601, कुल 656 में से

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क्री०ख०-अ०१३४] * पराशराश्रममें मूषकका प्रबल उपद्रव * ५९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वल्कल तथा और भी जो कुछ सामग्री थी, उस मूषकने सबका भक्षण कर लिया ॥ १२-१३ ॥ उसने अपनी पूँछके आघातसे वृक्षोंको भूतलसे उखाड़ फेंका और अपनी 'चूँ-चूँ' इस ध्वनिसे पूरे संसारको प्रतिध्वनित कर दिया। उस मूषकके वैसे कार्यकलापोंको जानकर मुनीश्वर पराशरजी चिन्तित हो गये और सोचने लगे कि दुरात्मा [जनों]-के उपद्रवोंसे युक्त स्थान तो निस्सन्देह त्याग देनेयोग्य ही होता है॥ १४-१५ ॥ इस समय कहाँ जाया जाय, किस स्थानपर रहनेसे सुख होगा और [यदि यहीं रहकर] प्राणोत्सर्ग करूँ तो [वह भी ठीक नहीं है; क्योंकि] शास्त्रचिन्तकोंने प्राण- त्यागको महान् अपराध बतलाया है। इस सुखद आश्रममें न जाने किस कर्मविपाकवश दुःख प्राप्त हो रहा है? इस समय मैं किसका स्मरण करूँ और कौन इस दुःखसे हमें छुड़ायेगा? इस आश्रममें ऐसा कौन है, जो इसका नाश कर सकेगा, इसका वध कर पानेमें कौन समर्थ हो सकेगा ? आज मैं किसकी शरणमें जाऊँ और कौन हमें बचायेगा ? ॥ १६-१८ ॥ ब्रह्माजी बोले-अपने [धर्मतः] पिता पराशरजीकी ऐसी बातें सुनकर अनन्तपराक्रमी बालक गजाननने मधुर वाणीमें कहा कि महान् प्रभावसम्पन्न तथा दुष्टोंका संहार करनेवाले मेरे होते हुए आप तनिक भी चिन्तित न होइये। मैं जब आपका पुत्र बना हूँ तो जो कुछ भी आपको प्रिय होगा, वह अवश्य ही सम्पन्न करूँगा ॥ १९-२० ॥ हे मुने ! मेरे गर्जनसे यह पृथिवी फटने लगती है और मेरे चरणोंके आघातसे पर्वत चूर-चूर हो जाते हैं। 'हे तात ! मेरा कौतुक देखिये, अभी मैं इस मूषकको अपना वाहन बनाता हूँ।' ऐसा कहकर शिशु गजाननने करोड़ों सूर्योंके सदृश प्रकाशमान अपना पाश फेंका ॥ २१-२२ ॥ वह पाश [नीले] आकाशमें जाकर वैसे ही शोभित हो रहा था, जैसे बादलोंके बीचमें बिजली शोभायमान होती है। तब देवताओंने भयके कारण उसी क्षण अपने- अपने निवासस्थान त्याग दिये अर्थात् भागने लगे ॥ २३ ॥ वह [मूर्तिमान्] पाश मुखसे मानो अग्निका वमन करता हुआ और दसों दिशाओंमें भ्रमण करता हुआ पाताल [-तक पहुँच गया और वहाँ]-से मूषकका कंठ बाँधकर उसे बाहर ले आया। मूषक पाशकी शक्तिसे व्यथित होकर गम्भीररूपसे मूर्च्छित हो गया और [कुछ कालके उपरान्त चैतन्यलाभ करके] अतिशय क्रुद्ध हो गया। मूषकका [कंठ बँध जानेके कारण] श्वास अवरुद्ध हो रहा था, इससे वह शोकसे व्याकुल हो उठा ॥ २४-२५ ॥ वह [मन-ही-मन] कहने लगा कि [मैं तो स्वयं सबका अन्त करनेमें समर्थ हूँ, तब मुझ] कालका मरण क्या सम्भव है, [अतः प्रतीत होता है कि यह] प्रारब्धकी ही रचना है। जो कुछ होना होता है, वह होकर रहता है, पुरुषार्थ तो निरर्थक ही है ॥ २६ ॥ जिसने केवल अपनी दाढ़ोंके अग्रभागसे बहुत सारे पर्वतोंको विदीर्ण कर दिया था, वह मैं कभी देवताओं, असुरों, राक्षसों अथवा मनुष्योंको [अपने समक्ष] गिनता ही नहीं था। ऐसे पराक्रमवाले मुझको कौन पाशके द्वारा आक्रान्तकर मरणोन्मुख कर रहा है ! ॥ २७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-वह मूषक जब इस प्रकार बोल रहा था, तभी गजाननने संकल्पबलसे पाशको खींचा तो जैसे गारुड़ी विद्याको जाननेवाला सर्पको तत्काल खींच लेता है, वैसे ही मूषकके सहित वह पाश खिंचा चला आया ॥ २८-२९ ॥ पाशबद्ध कंठवाला वह मूषक गजाननको देखते ही तत्काल उनके वास्तविक स्वरूपको जान गया और उन अनामय, विभु गजाननदेवको नमस्कार करके परम भक्ति- भावसे चिदानन्दघन प्रभुका स्तवन करने लगा ॥ ३०१/२ ॥ मूषक बोला- [हे देव!] आप ही समस्त विश्वके स्वामी, निर्माता, पालक एवं संहारक हैं। आप गुणत्रयसे परे होकर भी गुणत्रयको [सृष्टि आदि प्रयोजनोंसे] अंगीकार करते हैं। आप मायासे अतीत हो करके भी मायाके प्रवर्तक एवं मायावियोंको भी मोहग्रस्त करनेवाले हैं। मुनिजनोंके हृदयकमलमें अधिष्ठित होनेवाले आपको ब्रह्मा आदि भी नहीं जान पाते। आप ही कारण, करण (साधन), कर्ता तथा कारणोंके भी कारण हैं ॥ ३१-३३ ॥ हे विभो ! मेरा परम सौभाग्य है कि जो श्रुतियोंके द्वारा भी अगोचर हैं, उन [आप]-को मैंने आज अपनी