श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 602, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- आँखोंसे देखा है, अतएव मेरा जन्म लेना तो सार्थक हो | तो वह [अत्यन्त पीड़ित हो गया और] उन देवदेवसे गया। मेरे माता-पिता, नेत्रयुगल, विद्या, तपस्या, व्रत | बोला कि प्रभो! मैं तो आपका वाहन हूँ, अतः [मुझपर और जप—ये सभी धन्य [और सफल] हो गये ॥ ३४ ॥ | कृपा करके आप] अल्प भारवाले हो जाइये ॥ ४० ॥ ब्रह्माजी बोले—मूषकके ऐसे स्तुतिवाक्य सुनकर | उसके याचनापूर्ण वचनोंके कारण विभु गजानन गजानन प्रसन्न हो गये और उसका अपने प्रति अविचल | अल्प भारवाले हो गये। इस महान् आश्चर्यको देखकर भक्तिभाव जानकर वे विभु मूषकसे कहने लगे— ॥ ३५ ॥ | महर्षि पराशरने [गजाननको] प्रणाम करके कहा—मैंने हे निष्पाप मूषक ! देवताओं और ब्राह्मणोंसे द्रोह | तीनों लोकोंमें कहीं भी [किसी] बालकमें [ऐसा] पौरुष करनेवाले तुम्हारे ही पुरुषार्थके कारण मैं निर्गुण होकर | नहीं देखा, [जैसा कि तुमने प्रकट किया है।] जिसके भी दुष्टोंका नाश तथा सत्पुरुषोंकी रक्षा करनेके लिये | घोषसे पर्वत विदीर्ण हो गये और लोकपाल [तक] अपने- सगुण बन गया हूँ। तुमने जो मेरी शरण ग्रहण कर ली | अपने स्थानोंसे पतित हो गये, उस मूषकको तुमने बलपूर्वक है, इसलिये मैंने तुम्हें अभय दे दिया, अब तुमको जिस | क्षणमात्रमें अपना वाहन बना लिया ॥ ४१-४२१/२ ॥ वरकी आकांक्षा हो, उसे माँग लो ॥ ३६-३७ ॥ | इसी बीचमें बालककी ममतामयी माता अर्थात् मूषक बोला—हे गजानन ! मुझे आपसे कोई वर | मुनिपत्नी वहाँपर आयीं और उन शिशुरूप गजाननको नहीं चाहिये, यदि आप चाहें तो मुझसे वांछित वर माँग | प्रीतिपूर्वक गोदमें लेकर झरते हुए दूधवाले स्तनोंसे लीजिये ॥ ३७१/२ ॥ | दुग्धपान कराने लगीं। माताने शिशुसे कहा कि मैं तुम्हारा ब्रह्माजी बोले—उस घमण्डी चूहेके ऐसा कहनेपर | न तो वास्तविक स्वरूप जानती हूँ और न तुम्हारे गजानन उससे बोले कि [हे मूषक !] यदि तुम सचमें | पराक्रमका ही मुझे ज्ञान है। हम लोगोंके जन्म- वर देनेकी बात कह रहे हो, तो मेरे वाहन बन जाओ। | जन्मान्तरके पुण्योंके कारण ही तुम हमारे घर आये हो। जब मूषकने कहा कि 'ऐसा ही .हो', तो पिंगलनेत्र | इसके उपरान्त वे गजानन मूषकको बाँधकर साधारण गजानन तत्काल उसे आक्रान्त करके उस मूषकपर | बालककी भाँति क्रीडा करने लगे। [ब्रह्माजीने व्यासजीसे आरूढ़ हो गये ॥ ३८-३९ ॥ | कहा कि ब्रह्मन् !] इस प्रकारसे मैंने गणपति के मूषकवाहन जब गजानन उसे अपने भारसे चूर-चूर करने लगे | होनेकी कथा आपको सुनायी ॥ ४३-४५॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'क्रौंचाक्रमण' नामक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३४ ॥ एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय गजाननके वाहन मूषकके पूर्वजन्मका वर्णन व्यासजीने कहा—हे पद्मज ! उस मूषकने पूर्वमें | एकाग्र चित्तसे सुनो। सुमेरुपर्वतके शिखरपर महर्षि ऐसा क्या पाप और पुण्य किया था, जिसके कारण उसे | सौभरिका विशाल तथा रमणीक आश्रम था। वह वृक्षोंसे मूषकयोनि तथा गजाननदेवके वाहकत्वकी प्राप्ति हुई? | परिपूर्ण और नाना प्रकारके पक्षियोंसे भरा था। उसमें हे ब्रह्मन् ! मेरे इस कौतूहलका आप समग्रतः समाधान | अनेक बावड़ियाँ और सरोवर थे तथा बहुत-से मुनिजन कर सकते हैं, अतः यह बात विस्तारसे बतलाइये कि | वहाँ रहा करते थे ॥ ३-४ ॥ वह पूर्वजन्ममें कौन था ? ॥ १-२ ॥ | वहाँ महर्षि सौभरिके दर्शनार्थ दिनानुदिन वसिष्ठ ब्रह्माजी बोले—हे वत्स ! तुमने उचित प्रश्न | आदि मुनिजन एवं इन्द्रप्रभृति देवगण आया करते थे। किया है। यह तो मेरे मनको भी प्रिय जान पड़ता है। | महर्षि सौभरि परमात्माके अनुचिन्तनमें निरत और विपुल इस प्रसंगमें वह समस्त वृत्तान्त मैं तुम्हें बता रहा हूँ, उसे | तपके कारण बढ़े हुए तेजसे सूर्य तथा अग्निसे अधिक