श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 603, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१३५ ] * गजाननके वाहन मूषकके पूर्वजन्मका वर्णन * ६०१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तेजस्वी जान पड़ते थे। उनकी प्रसिद्धि समस्त लोकोंमें व्याप्त थी॥५-६॥ उनकी धर्मपत्नी मनोमयी नामसे विख्यात एवं परम सौभाग्यशालिनी थी। पतिव्रताओंके मध्य विशेष रूपसे चर्चित उस मुनिपत्नीपर महर्षिकी विशेष प्रीति थी। उसकी सुन्दरताने रतिके समग्र रूप-लावण्यको जीत लिया था और शची आदि सभी देवियाँ तो उसकी सुन्दरताके अंशमात्रकी भी बराबरी करनेमें असमर्थ थीं। किसी समयकी बात है, महर्षि सौभरिने यज्ञशालामें सावधान मनसे प्रातःकालीन होमकृत्य सम्पन्न किया और समिधा लानेके लिये वन चले गये। उस समय सदाचारिणी मनोमयी घरमें ही थी और घरके कार्योंको सम्पन्न करनेमें लगी थी॥७-९१/२॥ उसी समय वहाँ क्रौंच नामक दुष्ट गन्धर्व आ पहुँचा। नानाविध शालाओं (यज्ञशाला, पाठशाला, पाकशाला आदि)-से युक्त तथा सघन और शीतल छायावाले उस उत्तम आश्रमको देखकर उसकी सारी थकावट दूर हो गयी॥१०-११॥ [वह कहने लगा कि] जिसका ऐसा सुषमासम्पन्न आश्रम है, वह प्रभावशाली व्यक्ति तो सर्वथा धन्य ही है, उसका जप-तप भी धन्य है। क्षणभरमें सुखी कर देनेवाले इस आश्रममें तो चिरकालपर्यन्त रहनेसे मोक्ष भी मिल सकता है-ऐसा कहता हुआ वह गन्धर्व मुनिके भवनमें प्रविष्ट हुआ॥१२१/२॥ वहाँ उसने मनोमयीके चन्द्रसदृश मनोहर मुखका अवलोकन किया, जिसके दर्शनमात्रसे भगवान् शिव भी मोहाकुल हो जायें; ऐसी [परम सुन्दरी] मनोमयीकी उसपर दृष्टि पड़ते ही वह कामाग्निसे सन्तप्त हो उठा और आसक्तिवश उसने मनोमयीका एकाएक हाथ पकड़ लिया॥१३-१४१/२॥ गन्धर्वके हाथ पकड़ते ही [सतीत्वनाशके भयसे पतिव्रता] मनोमयी काँपने लगी और मूर्च्छित-सी हो गयी। उसका कंठ सूख गया, कान्ति मलिन हो गयी, शरीर स्वेदपूरित हो उठा और आँखोंसे अश्रुवर्षा होने लगी। पतिके स्मरणमें तत्पर [महासती] मनोमयीने [तपोनाशके भयसे] उसको शाप नहीं दिया॥१५-१६॥ उसे अतीव उद्वेग हुआ। वह किंकर्तव्यविमूढ हो सोचने लगी कि मैं इस समय किसकी शरणमें जाऊँ, कौन मुझे इस दुष्टसे छुड़ायेगा? मैंने अपनी स्मृतिमें इस जन्ममें तो कुछ भी अपकर्म नहीं किया है, इसलिये लगता है कि किसी अन्य जन्मके पापके कारण आज यह सुखध्वंसक दुःख उपस्थित हुआ है॥१७-१८॥ उस गन्धर्वकी दूषित भावनाको जानकर वह उसको समझाते हुए कहने लगी कि हे सुव्रत ! मैं तुम्हारी पुत्रीके समान हूँ और तुम मेरे पिताके सदृश हो। तुम तो ज्ञानी हो, अतः पापमें मनको मत लगाओ; क्योंकि पापियोंको करोड़ों वर्षोंतक नरकमें रहना पड़ता है॥१९-२०॥ हे महाभाग ! इसलिये पुत्रीतुल्य मुझ दीन नारीको छोड़ दीजिये, यदि ऐसा नहीं करोगे तो मैं निश्चय ही प्राणोंका त्याग कर दूँगी। तब आपको स्त्रीवधजनित महापापका भागी बनना पड़ेगा। मेरे महाभाग पतिदेव इस समय वनसे लौटने ही वाले हैं, उनकी कोपाग्नि तुमको क्षणभरमें भस्म कर देगी॥२१-२२१/२॥ [यद्यपि] उनकी आज्ञाके बिना मैं कोई साधारण- से-साधारण कार्य भी नहीं करती, तथापि [यदि तुम नहीं मानोगे तो] मैं तुमको और ब्रह्माकी सम्पूर्ण सृष्टिको भी भस्म कर डालूँगी। जब वह इस प्रकार कह रही थी, तभी वहाँ महर्षि सौभरि आ पहुँचे॥२३-२४॥ उस समय मध्याह्नकालीन सूर्यके सदृश तेजोदीप्त महर्षिको वहाँ घरके आँगनमें उपस्थित देखकर उनके तेजसे अभिभूत हुए गन्धर्वने मुनिपत्नीका हाथ छोड़ दिया। वह नीचेकी ओर देखने लगा और काँप उठा। उसकी कान्ति मलिन हो गयी और वह भयभीत हो गया। महर्षि सौभरि एकाएक प्रलयाग्निके समान क्रोधसे जल उठे और उसकी भर्त्सना करने लगे। तदुपरान्त उन्होंने गन्धर्वको बड़ा ही कष्टप्रद शाप दे दिया॥२५-२६१/२॥ मुनिने कहा-अरे मूढ़! छिपकर तूने मेरी पत्नीके साथ दुर्व्यवहार किया है, इसलिये तू सर्वदा छिपकर विचरण करनेवाला मूषक हो जायगा और भूतलको खोदकर चोरकी भाँति अपना पेट भरेगा॥२७-२८॥