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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 604, कुल 656 में से

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पृष्ठ 604

६०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 क्रौंच बोला—हे मुने! मैंने जान-बूझकर आपकी पत्नी मनोमयीसे दुर्व्यवहार नहीं किया। इसे सुन्दर रूपवाली देखकर संयोगवश मेरी आसक्ति हो गयी। जिस समय आपने मुझे देखा, उस समयतक मैंने केवल इसका हाथ ही पकड़ा था और आपके तेजसे भयभीत होकर मैंने [उसी क्षण] इस निष्पाप महिलाको छोड़ भी दिया था। हे कृपानिधे! हे शरणागतवत्सल! इसलिये आप मेरा अपराध क्षमा भी कर सकते हैं। मैं आपकी शरणमें आया हूँ, मुझे अनुगृहीत कीजिये, मुझपर कृपा कीजिये। मैंने तीनों लोकोंमें पतिव्रतोचित गुणोंमें इसकी समानता करनेवाली स्त्री नहीं देखी॥ २९-३२॥ मुनिने कहा—अरे दुष्ट ! सुमेरुपर्वत भले ही सागरमें तैरने लगे, सूर्य पश्चिमसे उदय होने लगे और अग्नि भले ही शीतल प्रतीत होने लगे, किन्तु मेरी वाणी व्यर्थ नहीं हो सकती। इसपर भी मैं जो कह रहा हूँ, उसे अब आदरपूर्वक सुनो। जब द्वापरयुगमें [गणपति-] देव पराशरमुनिके भवनमें प्रकट होंगे और 'गजानन' इस नामसे विख्यात होंगे, तब तुम उनके वाहन बनोगे तथा ब्रह्मादि देवताओंके द्वारा आदरसहित तुम्हारा सम्मान किया जायगा। भगवान् गजाननके द्वारा पकड़ लिये जानेपर शीघ्र ही तुम स्वर्गलोकको [पुनः] प्राप्त कर लोगे ॥ ३३-३५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारकी उनकी बातें सुनकर वह गन्धर्व [गणपतिका वाहन बननेके कारण] सुख तथा [मूषकयोनिमें जानेके कारण] दुःखका अनुभव करता हुआ विशाल मूषक बनकर भूतलपर गिर पड़ा ॥ ३६१/२ ॥ महर्षि सौभरिके आशीर्वादके प्रभावसे अपार बल- विक्रमवाला और विशाल पर्वतके सदृश वह मूषक द्वापरयुगके प्रारम्भ होनेपर पराशरजीके आश्रममें अवस्थित भगवान् गजाननके समीप जा पहुँचा और वहाँ वह महाबली मूषक गजाननदेवका वाहन बन गया। हे अनघ! जिस प्रकार मूषक गजाननका वाहन बना, वह सब वृत्तान्त तुम्हारे पूछनेपर मैंने बतला दिया है ॥ ३७-३९ ॥ मुनिने कहा—हे ब्रह्मन् ! हे विभो ! उन भगवान् गणेशने सिन्दूर दैत्यका वध किस प्रकार किया था? हे चतुरानन ! उसे मुझको विस्तारसे बतलाइये। आपकी बातें सुनकर मुझको उसी प्रकार तृप्ति नहीं हो रही है, जैसे अमृतका पान करते रहनेपर भी तृप्ति नहीं होती। हे देवेश ! आप सब कुछ जाननेवाले हैं, और मैं भक्तिभावसे श्रवण कर रहा हूँ, इसलिये आप मुझे [यह रहस्य] बतलाइये॥ ४०-४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'क्रौञ्चशापवर्णन' नामक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३५ ॥ एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय गजाननका सिन्दूरके साथ युद्धार्थ प्रस्थान, सिन्दूरके दूतोंसे गजाननका संवाद एवं सिन्दूरका युद्धहेतु आगमन ब्रह्माजी बोले—एक दिनकी बात है, जनताके दुःखोंका अनुभव करते हुए गजाननदेवने महाभाग मुनिश्रेष्ठ पराशरजीसे कहा— ॥ १ ॥ गजानन बोले— [हे तात!] सम्पूर्ण जगत्को दुष्ट सिन्दूरने पीड़ित कर दिया है, जिसके कारण स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कार तथा वेदघोषसे जगत् शून्य हो गया है। ऋषिगण तथा देवगण अपने-अपने स्थानोंसे च्युत हो गये हैं। [अतः इस] गजाननस्वरूपके द्वारा मैं दुष्टवध, सत्पुरुषरक्षण, भूभारहरण, समस्त देवताओंका उनके पदोंमें पुनर्नियोजन तथा विश्वका आनन्द-सम्पादन करूँगा॥ २-४॥ हे तात! मेरे मस्तकपर आप अपना अभयप्रद तथा मंगलमय हाथ रखिये, आपके कृपाप्रसादसे मैं [निश्चय ही] उस दुष्ट मनवाले सिन्दूरका वध कर सकूँगा ॥ ५ ॥ मुनिने कहा—हे बाल! यह तो आश्चर्यकी बात है, जो कि तुम बचपनेके कारण कह रहे हो। जैसे कोई बालक कौतूहलवश [अपने माता-पिता आदिसे] चन्द्रमा पानेका हठ करता है, वैसे ही जो कार्य समस्त