श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 606, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सत्पुरुषोंकी रक्षाके लिये [अवतीर्ण वह बालक] इस समय आपसे युद्ध करने आया है। वह वैसे तो चार सालकी आयुवाला है, किंतु बड़ी-बड़ी डींगें हाँकता है ॥ २९-३० ॥ आप अपने प्रभावके द्वारा अपने उस छोटे-से शत्रुको अभी मार डालिये। आपके तो केवल निःश्वाससे भी वह दूर चला जायगा। हे स्वामिन्! जिसके दृष्टि- निक्षेपमात्रसे शिव, ब्रह्मा आदि काँप उठते हैं, उन आपके समक्ष वह अल्पबुद्धि बालक किस गिनतीमें हो सकेगा? ॥ ३१-३२ ॥ ब्रह्माजी बोले-दूतोंकी ऐसी बातें सुनकर सिन्दूर चिन्तासे विह्वल हो उठा, उसकी मुखकान्ति मलिन हो गयी और नेत्र क्रोधके कारण अरुण हो गये। वह अपनी आँखोंसे प्रलयकालीन अग्निके समान अग्निज्वालाएँ उगलता हुआ तथा हर्ष और क्रोधके मिश्रित मनोभावोंसे युक्त हो दूतोंसे कहने लगा - ॥ ३३-३४॥ सिन्दूर बोला- हे दूतो ! आप लोगोंकी बातोंसे मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। अरे ! सिंहके साथ युद्ध करनेके लिये मच्छर कैसे आया है? क्या चार सालका बालक मेरे साथ युद्ध करेगा और मैं यह भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि किस कारणसे तुम लोग उससे डर गये हो; क्योंकि यदि मैं क्रोधित हो जाऊँ तो यह संसार नष्ट हो जाय, तब उस बालककी गणना ही क्या है? [ऐसा कहकर सिन्दूर] दिशा-विदिशाओं तथा आकाशमण्डलको निनादित करता हुआ गरजने लगा और युद्धकी इच्छासे अस्त्र-शस्त्रोंको धारणकर निकल पड़ा ॥ ३५-३७१/२॥ तब (युद्धके लिये उसको गमनोद्यत जानकर) अमात्योंनि असुरराज सिन्दूरको प्रणाम करके कहा - हे दैत्यपालक ! सैनिकों और अमात्योंके रहते हुए आप कैसे युद्धके लिये प्रस्थान कर रहे हैं? आपके प्रतापसे तो हम लोग ही उसका वध कर देंगे। जिसके लिये विशाल सेना संरक्षित की जाती है, वह अवसर आ पहुँचा है। हे महाप्रभो ! हम लोग तो आपके लिये प्राणोंको भी त्याग सकते हैं। अब आप हमें आज्ञा दीजिये, हम आपके शत्रु उस बालकका वध करनेके लिये जा रहे हैं ॥ ३८-४०१/२॥ सिन्दूर बोला- मैं [अकेला ही] जा रहा हूँ। [आप लोग और] सभी सैनिक मेरे पराक्रमका अवलोकन करें। ऐसा कहकर बालकका वध करनेके लिये उत्सुक होकर वह तत्काल चल पड़ा और जहाँ बालरूप गजानन स्थित थे, वहाँ क्षणभरमें जा पहुँचा ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'सिन्दूरनिर्गम' नामक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३६ ॥ एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय युद्धभूमिमें गजाननका सिन्दूरको मारकर उसके रक्तका अपने शरीरमें लेपन करना और देवताओं, ऋषियों तथा राजाओंका वहाँ आकर गजाननका पूजन-स्तवनादि करना ब्रह्माजी बोले- बालक गजाननको देखकर अहंकारसे उन्मत्त सिन्दूर कहने लगा- 'अरे मन्द ! तुझ बालकके साथ युद्ध करनेमें मुझे लज्जा आ रही है। बालक ! तुम तत्काल घर चले जाओ और प्रीतिपूर्वक माताका स्तनपान करो। व्यर्थमें ही मेरी बाणवर्षासे इस समय क्यों मरना चाहते हो? अरे ! मुझे देखकर तो ब्रह्मा, शिव आदि देवगण भी भाग खड़े होते हैं। हे किशोर ! अगर तुम मर जाओगे तो स्नेहवश तुम्हारे माता-पिता भी मर जायँगे। मेरे तलघातसे तो यह ब्रह्माण्ड भी सैकड़ों टुकड़े हो जाता है, इसलिये चले जाओ, मुझे अपना मुख मत दिखलाओ ॥ १-४॥ गजाननदेव बोले- अरे दुष्ट! तूने सत्य ही कहा है, परंतु मनमें कुछ विचार नहीं किया। मेरे सामर्थ्य और नानाविध स्वरूपोंको भी तू जान नहीं सका। मेरी क्रुद्ध दृष्टिके पड़ते ही सुरनायक अर्थात् ब्रह्मा, इन्द्रादि देवगण भी पदच्युत हो जाते हैं। [सत्त्वादि] तीनों भावों (गुणों)- को स्वेच्छासे ग्रहणकर मैं ही समस्त स्थावर-जंगमात्मक विश्वकी रचना, [पालन] तथा संहार करता हूँ और प्रत्येक युगमें नानाविध स्वरूपोंको ग्रहण करके दुष्टविनाशके द्वारा अत्यन्त भीषण भूमिभारको नष्ट करता हूँ ॥ ५-७॥