श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 607, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१३७] * गजाननका सिन्दूरको मारकर उसके रक्तको अपने शरीरमें लगाना * ६०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 यदि पराक्रमी व्यक्ति लघु [आकारवाला] हो, तो भी उसे लघु मानना अनुचित है, वह लघु प्रभाववाला नहीं होता, जैसे अग्निकी चिनगारी अणुवत् हो करके भी विशाल नगरको सम्पूर्णतः जला सकती है ॥ ८ ॥ अगर तुम्हें जीनेकी अभिलाषा है, तो मुझे प्रणाम करो और अपने घर चले जाओ; [क्योंकि] मानी पुरुष कभी भी प्रणत शरणागतका वध नहीं करते ॥ ९ ॥ यदि तुम ऐसा नहीं करोगे, तो तुमको मेरे शस्त्रप्रहारसे [मरकर] स्वर्गलोक जाना पड़ेगा। तुम्हारे मरनेपर यह जो तुमसे पीड़ित जगत् है, वह सुखी हो जायगा ॥ १० ॥ दैत्यराज ! ब्रह्माजीसे प्राप्त वरदानके कारण अहंकार मत करो; क्योंकि [विपरीत समयके आनेपर] सब कुछ विपरीत हो जाता है और यह विपरीतता पहले भी देखी गयी है। कालके प्रभाववश विभु नृसिंहने खम्भेसे अवतीर्ण होकर हिरण्यकशिपुका संहार किया था और रामका आश्रय लेकर सुग्रीवने अपने भाई बालिका वध किया था ॥ ११-१२ ॥ यह तो कालका ही प्रभाव है कि इस समय तुम्हारी बुद्धि भी विपरीत हो चली है। यद्यपि तुम अतिस्थूल अर्थात् बल-बुद्धि आदिसे प्रबल हो तथापि मुझे अतिलघु अर्थात् नितान्त तुच्छ प्रतीत हो रहे हो। अब धैर्य धारणकर और लज्जा [-का त्याग] करके मेरे साथ तुम युद्ध करो ॥ १३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार कहकर गजाननने तत्काल ही विराट्रूप धारण कर लिया। तब उनका मस्तक ब्रह्माण्डसे ऊपर चला गया, चरणयुगल सातों पातालोंको भेदकर नीचे चले गये और कान दिशाओंके पारतक जा पहुँचे। जब दैत्यने बालक गजाननको देखा तो वे उसको विश्वरूप दीख पड़े ॥ १४-१५१/२ ॥ हजारों मस्तकों और नेत्रोंसे युक्त, पृथिवीतलसे स्वर्गपर्यन्त व्याप्त हजारों चरणोंवाले, शीघ्र ही दसों दिशाओंको व्याप्त करके स्थित, दिव्य वस्त्र, गन्ध और अलंकारोंसे विभूषित असंख्य सूर्योंके सदृश दीप्तिवाले तथा असंख्य रूपोंसे युक्त उन विभु गजाननके विराट् रूपको देखकर दैत्यका हृदय काँप उठा ॥ १६-१८ ॥ तदुपरान्त धैर्य धारणकर दैत्य सिन्दूर गजाननदेवके समीप पुनः जा पहुँचा और दिशाओं-विदिशाओं तथा आकाशको निनादित करता हुआ गरजने लगा। उसने एकाएक खड्ग उठाकर गजाननदेवको मारना चाहा और क्रोधमें भरकर उनकी ओर वैसे ही दौड़ा, जैसे पतिंगा अग्निकी ओर भागता है ॥ १९-२० ॥ [तब गजाननदेवने कहा—] 'यह मूढ़ मेरे दुर्लभ स्वरूपको नहीं जान पा रहा है, अतः मैं ही अब इसको मोक्ष प्रदान करता हूँ' ऐसा कहकर गजाननदेवने सिन्दूरका गला पकड़ लिया और उस बलिष्ठ दैत्यको अपने हाथोंसे मसल डाला। तत्पश्चात् उसके अरुण रुधिरका अपने शरीरमें लेपन कर लिया। उसी समयसे भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले भगवान् गजानन 'सिन्दूरवदन, सिन्दूरप्रिय' इत्यादि नामोंसे भूतलपर प्रसिद्ध हुए ॥ २१-२३ ॥ सिन्दूरका वध हो जानेपर देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक [गजाननपर] पुष्पोंकी वर्षा की और विजयवाद्य बजाये तथा अप्सराओंने नृत्य किया ॥ २४ ॥ इसके पश्चात् वहाँपर हाथोंमें उपहार लेकर और आपकी जय हो, आपको नमस्कार है—इत्यादि विजय- प्रणामादिसूचक शब्दोंके उच्चारणसे दसों दिशाओंको भरते हुए वसिष्ठ आदि मुनिगण तथा इन्द्रको आगे करके ब्रह्मा आदि सभी देवगण उपस्थित हुए ॥ २५१/२ ॥ तदुपरान्त वहाँपर प्रसन्नतापूर्वक सभी राजागण आये और उन्होंने सभी अलंकारोंसे विभूषित, चार भुजाओंवाले, दिव्य गन्धवस्त्रादिसे सुशोभित, ऐश्वर्यसम्पन्न उन मूषकवाहन गजाननकी षोडशोपचार विधिसे अर्चना की ॥ २६-२७१/२ ॥ इन्द्रादि देवताओंने गजाननसे प्रार्थना की कि [हे देव !] हम लोग आपका स्तवन करनेमें सक्षम नहीं हैं; क्योंकि आपका निरूपण अथवा स्तवन करनेमें तो चारों वेद, ब्रह्मादि देवश्रेष्ठ तथा श्रेष्ठ मुनिजन भी कुण्ठित (असमर्थ) हो जाते हैं ॥ २८१/२ ॥ [हे प्रभो !] आप ही कर्ता हैं और कारण, कार्य, रक्षक, पोषक तथा संहारक भी आप ही हैं। आप ही लोकको कभी मोहमुग्ध करते हैं और कभी उसे