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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 608, कुल 656 में से

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पृष्ठ 608

६०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-


ज्ञानोपदेशसे कृतकृत्य भी करते हैं। हे देव! सरिताएँ, सागर, वृक्ष, पर्वत, समस्त पशुगण, वायु, आकाश, पृथ्वी, अग्नि तथा जल आप ही हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, मरुद्गण, मुनिगण, गन्धर्व, चारण, सिद्ध, यक्ष, किन्नर, राक्षस, सर्प, अप्सराएँ—यह समस्त चराचर जगत् आपका ही स्वरूप है॥ २९–३२॥ हे देव! हम लोग धन्य हैं; क्योंकि हमने मोक्षाधिष्ठान आपका प्रत्यक्ष साक्षात्कार किया है। इस सिन्दूरके मारे जानेसे हम सभी देवगण सुखी हो गये हैं और राजागण, मुनिगण एवं समस्त प्रजाजन प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने दायित्वके सम्पादनमें निरत हो गये हैं। अब स्वाहाकार, स्वधाकार तथा वषट्कारसे सम्बद्ध धर्मकृत्य सम्पन्न होंगे॥ ३३-३४॥ आप नानाविध अवतार ग्रहण करके [संसारकी] रक्षा, विशेष रूपसे दुष्टोंका संहार एवं तत्काल ही भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करते हैं॥ ३५॥ ब्रह्माजीने कहा—उन सभी देवताओंने गजाननसे इस प्रकार प्रार्थना करनेके अनन्तर सुन्दर शिखरसे युक्त एक प्रासाद (देवमन्दिर)-का निर्माण कराया और उसमें गजाननदेव (-की मूर्ति)-को स्थापित किया, जिसके दर्शनमात्रसे लोग पापोंसे छूट जाते हैं और जिसके स्मरणके प्रभावसे मनुष्य अपनी सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है॥ ३६-३७॥ [सर्वप्रथम] उस [गजानन-विग्रह]-का पूजन- वन्दन करके देवताओंने परितृप्तिका अनुभव किया। इसके उपरान्त मुनिजनोंने परम आदरके सहित उन गजाननकी अर्चना की। भगवान् गजाननने सिन्दूर दैत्यका वध किया था, इसलिये मुनिजनोंने 'सिन्दूरहा' (सिन्दूरको मारनेवाला)—ऐसा उन गणपतिका नामकरण किया और उन्हें प्रणाम करके परम सन्तुष्टिपूर्वक वे अपने- अपने आश्रमोंको चले गये॥ ३८-३९॥ इसके उपरान्त समस्त श्रेष्ठ नरेशोंने भक्तिभावसे गजाननदेवको प्रणाम किया और उन परमात्माका नानाविध पूजाद्रव्योंके द्वारा अनेक बार अर्चन किया। [उसी समयसे] वह क्षेत्र 'राजसदन'* इस नामसे प्रसिद्ध हो गया। जब महाराज वरेण्यने उन्हें (गजाननको) देखा तो वे जान गये कि यह मेरा ही पुत्र है। [वे कहने लगे—] हे नाथ! आपने लोकके लिये कण्टकस्वरूप इस परम दारुण दैत्य सिन्दूरका शीघ्रतासे वध करके राजाओंको उनके पद [पुनः] प्रदान किये हैं, इसलिये आपका 'दैत्यविमर्दन' नाम प्रसिद्धिको प्राप्त करेगा॥ ४०–४२१/२॥ तदुपरान्त राजा वरेण्यने प्रकट हुए पराक्रमवाले अपने पुत्र गजाननकी स्नेहपूर्वक अर्चना की। वात्सल्यवश उनके नेत्रोंसे अश्रुपात होने लगा। वे कुछ भी बोल पानेमें समर्थ न हो सके। उनका गला भर आया और वे अत्यन्त व्यथित होकर रुदन करने लगे॥ ४३-४४॥ वरेण्यने कहा—जिन आपकी पूजा करनेके लिये ब्रह्मा, इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवता उपस्थित हुए थे, उन आपको मूढ़तावश मुझ पापीने विघ्नोंके भयसे त्याग दिया। अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायक आपको मैं समझ नहीं सका। जिस प्रकार कामधेनु, [दिव्य] निधि तथा कल्पवृक्षको कोई मूढ़ व्यक्ति त्याग दे, वैसे ही आपकी मायासे मोहित होकर मैंने आपको अपने भवनसे बाहर फेंकवा दिया था॥ ४५–४६१/२॥ ब्रह्माजी बोले—राजाकी ऐसी शोकपूर्ण वाणीको सुनकर कृपापरवश हुए परमेश्वर गजाननने अपनी चारों भुजाओंसे आदरपूर्वक उन वरेण्यका आलिंगन किया और परम भक्तिभावसे सम्पन्न राजा वरेण्यसे वे विभु कहने लगे—॥ ४७-४८॥ गजाननदेवने कहा—पूर्वकल्पकी बात है, किसी सघन वनमें आप दोनों (पति-पत्नी)-ने बरगदके सूखे पत्ते खाकर दिव्य सहस्र वर्षपर्यन्त घनघोर तपस्या की थी। तब मैं प्रसन्न हो गया [और आपके समक्ष आकर कहने लगा—वर माँगो। उस समय] आप लोगोंने मोहवश मोक्ष न माँगकर, पुत्रकी याचना की॥ ४९-५०॥ इसीलिये मैं आपके पुत्रके रूपमें अवतीर्ण हुआ।


पाद-टिप्पणी:

  • यह स्थान महाराष्ट्र प्रान्तके जालना जिलेमें स्थित है। भगवान् गणपतिका यह पूर्ण पीठ माना जाता है। इन्हें यहाँ 'वरेण्यपुत्र गणपति' कहा जाता है।