श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 609, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१३८ ] * सूत-शौनक-संवादमें गणेशगीताका उपक्रम * ६०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मैं स्वरूपतः आकाररहित, साक्षी, अन्तरात्मस्वरूप हूँ, | गजाननने कृपापूर्वक उनको अपने आसनपर बैठा लिया अतः मेरा शरीरधारण किस प्रकार सम्भव है? मुझे | और [राजाके] मस्तकपर अपना हाथ रखा ॥ ५६ ॥ सिन्दूरका वध, सत्पुरुषोंका रक्षण तथा भूभारका हरण | गजाननने राजाके समस्त संशयोंको विनष्टकर उन्हें करना था, इसी कारणसे मैंने शरीर धारण किया था। मैंने | अपना विश्वरूप दिखलाया और गणेशगीताका उपदेश [आपको दिये गये अपने] वचनको सत्य सिद्ध किया | किया। 'भगवान् गणपति'के उपदेशके प्रभावसे राजाने और [सिन्दूर आदि दैत्योंको मारकर] त्रिलोकीको | गणेशगीताके वास्तविक तात्पर्यको अधिगत किया और सन्तुष्ट भी कर दिया। अब मैं स्वधामगमन करूँगा, तुम्हें | मन्त्रियोंके ऊपर राज्यशासनका भार रखकर तपस्याके मनमें शोक नहीं करना चाहिये ॥ ५१-५२ १/२ ॥ | लिये वन चले आये ॥ ५७-५८ ॥ वरेण्य बोले—हे दुःखहन्! संसारमें बहुत-से | परम वैराग्यसे संयुक्त महाभाग वरेण्य अन्य विषयोंसे दुःख दीखते हैं, जो सहन करनेयोग्य नहीं हैं। अतएव | चित्तको हटाकर निरन्तर गणेशगीताका ही पारायण तथा इस समय आप कृपापूर्वक मुझे मोक्षमार्गका उपदेश | उन गजाननका ध्यान करते रहते थे। जिस प्रकार जलमें कीजिये। हे द्विरदानन! आपका साक्षात्कार हो जानेके | डाला गया जल जल ही हो जाता है, वैसे ही गजाननका बाद बन्धन कैसे हो सकता है? आप मुझको उस | ध्यान करते-करते वे भी तद्रूप अर्थात् गणपतिस्वरूप बन योगका उपदेश कीजिये, जिसके माध्यमसे मैं काम, | गये थे ॥ ५९-६० ॥ क्रोध, मरण-भय आदिसे परे हो सकूँ और मोक्षकी | मुनि बोले—हे देवेश! हे चतुरानन! समस्त प्राप्ति कर सकूँ ॥ ५३-५५ ॥ | अज्ञानका ध्वंस करनेवाली उस गणेशगीताका उपदेश ब्रह्माजी बोले—राजाकी ऐसी बात सुनकर भगवान् | परम कृपापूर्वक मुझे भी कीजिये ॥ ६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'वरेण्योपदेश' नामक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३७ ॥ एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय सूत-शौनक-संवादमें गणेशगीताका उपक्रम ब्रह्माजी बोले—इसी प्रकार पूर्वकालमें महात्मा | हे सर्वविद्याओंके पण्डित! हे सम्पूर्ण शास्त्रके तत्त्वको शौनकके पूछनेपर सूतजीने [तत्कालीन] व्यासजीके | जाननेवाले! आप मुझसे योगमार्गका वर्णन कीजिये ॥ ५ ॥ मुखसे श्रवण की हुई गीताका वर्णन किया था ॥ १ ॥ | श्रीगजानन बोले—हे राजन्! मेरी कृपासे तुम्हारी सूतजी बोले—हे भगवन्! आपने अष्टादश पुराणोंके | बुद्धि निर्मल और स्थिर हो गयी है, सुनो, मैं योगामृतसे साररूप अमृतका मुझे पान कराया, परंतु अब उससे भी | परिपूर्ण गीता तुमसे कहता हूँ। 'योग' इस शब्दका ही अधिक रसीले उत्तम अमृतका पान करनेकी मेरी इच्छा | अर्थ योग नहीं, लक्ष्मीकी प्राप्ति होनेका नाम योग नहीं, है। जिस अमृतको पाकर मनुष्य ब्रह्मरूप हो जाते हैं, हे | विषय-सुखकी प्राप्ति होनेका नाम योग नहीं और महाभाग! उस योगामृतका कृपाकर आप मुझसे वर्णन | इन्द्रियसम्पन्न होनेका नाम भी योग नहीं है ॥ ६-७ ॥ कीजिये ॥ २-३ ॥ | हे राजन्! माता-पिताके समागमका नाम योग नहीं व्यासजी बोले—हे सूतजी! योगमार्गको प्रकाशित | है। आठ प्रकारकी सिद्धि और बन्धुपुत्रादिकी प्राप्तिका करनेवाली गीताका अब तुमसे वर्णन करता हूँ, जिसको | नाम भी योग नहीं है। अत्यन्त रूपवती स्त्रीकी प्राप्तिका राजा वरेण्यके पूछनेपर [सम्पूर्ण विघ्नोंके नाशक] | नाम योग नहीं है, राज्यकी प्राप्ति अथवा हाथी-घोड़ेकी गणेशजीने कहा था ॥ ४ ॥ | प्राप्तिका नाम भी योग नहीं है ॥ ८-९ ॥ राजा वरेण्य बोले—हे विघ्नेश्वर! हे महाभुज! | इन्द्रपदकी प्राप्तिका नाम योग नहीं है, योगद्वारा