श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 612, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६१० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
जाते हैं, इसी प्रकारकी स्थिर प्रज्ञावाले योगीका मन प्रसन्न रहता है॥ ६१-६२॥ हे राजन्! बिना चित्त प्रसन्न हुए बुद्धिकी प्राप्ति नहीं होती और बुद्धिके बिना श्रद्धा नहीं होती, श्रद्धाके बिना शान्ति नहीं होती और शान्तिके बिना सुख नहीं होता। पवन जिस प्रकार नावको जलमें डुबो देता है, वैसे ही विषयोंमें विचरनेवाले अवशीभूत इन्द्रियरूपी घोड़ोंके पीछे भागनेवाला मन प्रज्ञाको हर लेता है॥ ६३-६४॥ हे राजन्! [अज्ञानसे आच्छादित] सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये जो आत्मज्ञान रात्रिरूप है, उसमें इन्द्रियको वशमें करनेवाले संयमी योगी जागते हैं और जिस विषयबुद्धिमें सम्पूर्ण प्राणी जागते हैं, वह विषयभोग ज्ञानियोंके लिये रात्रिरूप है॥ ६५॥ जिस प्रकारसे [नदियों आदिके] सभी जल समुद्रमें प्रवेश कर जाते हैं और उसकी तृप्ति नहीं होती, इसी प्रकार सभी कामनाओंकी पूर्तिमें तत्पर व्यक्तिको भी शान्ति नहीं होती। इस कारण प्राणीको उचित है कि विषयोंकी ओर दौड़ती हुई इन्द्रियोंको सब प्रकारसे वशमें करे, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है॥ ६६-६७॥ जो ममत्व, अहंकार और सब कामनाओंका त्याग करता है, नित्य ज्ञानमें मग्न रहता है, वह ज्ञानसे मुक्तिको प्राप्त हो जाता है। हे राजन्! जो वृद्धावस्थाको प्राप्त होकर भी दैवगतिसे इस ब्रह्मज्ञानयुक्त बुद्धिको प्राप्त हो जाता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है॥ ६८-६९॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सांख्यसारार्थयोगवर्णन' नामक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १३८॥
एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय कर्मयोग
वरेण्यने कहा—हे भगवन्! आपने ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा दोनोंका वर्णन किया, आप दोनोंमेंसे एक निश्चयकर जो कल्याणदायक हो, उसे कहिये॥ १॥ श्रीगजानन बोले—हे प्रिय! मेरे द्वारा पूर्वकालमें [सांख्ययोग तथा वैधयोग (कर्मयोग) नामवाली] दो स्थितियाँ (साधनक्रम) बतलायी गयीं। इस चराचर जगत्में सांख्ययोगियों अर्थात् आत्मा-अनात्माके विवेकमें समर्थ जनोंके लिये बुद्धियोग और कर्मी (कर्मनिष्ठ गृहस्थ आदि) जनोंके लिये वैधयोग (कर्मयोग) अनुष्ठेय है। वैध (विधिविहित स्वधर्मपालनादिरूप) कर्मोंका अनुष्ठान न करनेसे कोई व्यक्ति निष्क्रिय नहीं होता अर्थात् निष्कर्मताको प्राप्त नहीं हो सकता। हे राजन्! केवल कर्मोंके ही त्याग देनेसे सिद्धि नहीं होती॥ २-३॥ किसी दशामें, क्षणमात्र भी बिना कर्म किये कोई नहीं रह सकता है। प्रकृतिके स्वाभाविक तीनों गुण सबको अवश्य ही कर्म कराते हैं॥ ४॥ जो कर्म करनेवाला, इन्द्रियोंको रोककर मन-ही- मन इन्द्रियोंके विषयोंका स्मरण करता है, उस इन्द्रियलोलुप दुरात्माको तुच्छ आचारवाला कहा जाता है॥ ५॥ हे राजन्! जो मनसे इन्द्रियोंका संयम करके कर्मेन्द्रियोंसे निष्काम कर्मयोगका अनुष्ठान करता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है॥ ६॥ कर्म न करनेसे तो बिना फलकी कामना किये कर्म करना भी श्रेष्ठ है, कारण कि सब कर्मोंका त्याग करनेसे तो शरीरयात्रा भी नहीं हो सकती॥ ७॥ जो प्राणी कर्मोंका फल मुझमें समर्पण नहीं करते, वे बन्धनमें पड़ते हैं, इस कारणसे निष्काम कर्मका अनुष्ठान करते हुए उसका फल निरन्तर मुझे अर्पण करके कर्मबन्धनका नाश करना चाहिये। जो कर्म मेरे निमित्त किये जाते हैं, वे कहीं और कभी बन्धनके कारण नहीं होते, किंतु जो वासनापूर्वक (फलासक्तिपूर्वक) किये गये कर्म हैं, वे ही बलात् प्राणीको बाँधते हैं॥ ८-९॥ पूर्वकालमें मैंने यज्ञकर्मोंके ही साथ-साथ ब्राह्मणादि वर्णोंको रचकर कहा—हे मनुष्यो! तुम यज्ञसे वृद्धिको प्राप्त होओ, यह यज्ञ कल्पवृक्षके समान तुम्हारी इष्टसिद्धिको देनेवाला हो॥ १०॥ तुम देवताओंको अन्नसे तृप्त करो, देवता तुमको (वर्षा आदिसे) प्रसन्न करें, इस प्रकार परस्पर वृद्धि