भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 613, कुल 656 में से

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क्री०ख०-अ०१३९] * कर्मयोग * ६११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करते हुए वे देवगण और तुम मनुष्यो ! श्रेष्ठ तथा सुस्थिर | होकर कर्म न करूँ तो सभी वर्ण कर्म छोड़कर केवल स्थानको प्राप्त करें ॥ ११ ॥ | मेरा अनुगमन करने लगेंगे ॥ २१-२३ ॥ देवता प्रसन्न होकर मनोवांछित अभीष्टोंको पूर्ण | तब मेरे ऐसा करनेसे सब वर्ण आचारभ्रष्ट होकर करते हैं, उन देवताओंके दिये पदार्थोंसे उनकी आराधना | नष्ट हो जायेंगे। इससे इस संसारका नाश करनेवाला और किये बिना जो मनुष्य भोग भोगता है, वह चोर है ॥ १२ ॥ | वर्णसंकरको उत्पन्न करनेवाला भी मैं ही होऊँगा ॥ २४ ॥ जो देवाराधनरूप यज्ञ करके अवशिष्ट अन्नका | जिस प्रकारसे कामनावाले लोग अज्ञानसे सदा कर्म भोजन करते हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त होते हैं और जो | करते रहते हैं, इसी प्रकार विद्वान्‌को उचित है कि अपने निमित्त ही भोजन बनाते हैं, वे पापी मानो पापका | लोकसंग्रहके निमित्त आसक्तिरहित होकर वह कर्म ही भोजन करते हैं। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, | करता रहे। अज्ञानसे कर्म करनेवालोंकी भेदबुद्धिका अन्न वर्षासे उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञसे उत्पन्न होती | त्याग करे तथा योगयुक्त होकर कर्म करता हुआ वे सब है और विहित कर्मसे यज्ञकी उत्पत्ति होती है ॥ १३-१४ ॥ | कर्म मुझे अर्पण कर दे ॥ २५-२६ ॥ कर्म ब्रह्मासे उत्पन्न होता है और ब्रह्मा मुझसे | [हे राजन् !] अविद्या और गुणोंके वशीभूत हो उत्पन्न होते हैं—इस कारण हे राजन् ! आप इस यज्ञमें | निरन्तर कर्म करनेमें लगा हुआ व्यक्ति अहंकारसे मूढ़ और विश्वमें स्थित मुझे ही जानिये ॥ १५ ॥ | होकर अपनेको कर्ता बताता है। जो कोई आत्मज्ञ जब इस आवागमनरूपी संसारचक्रसे बुद्धिमानोंको पार | सत्त्वादि गुणों तथा उनके कर्मोंके विभागको इस प्रकार जाना उचित है, हे राजन् ! जो अधम प्राणी है, वह इसमें | जानते हैं कि इन्द्रियाँ ही अपने विषयोंमें वर्तमान हैं, तो इन्द्रियोंकी क्रीडासे सुख मानता है ॥ १६ ॥ | वे ऐसा जानकर कर्ममें लिप्त नहीं होते ॥ २७-२८ ॥ जो अन्तरात्मामें प्रीति करनेवाला है, वही आत्माराम | सत्त्व, रज, तम—इन तीन गुणोंसे मोहित हुए प्राणी और सबका प्यारा है, जो प्राणी आत्मतृप्त है, उसे किसी | फलकी इच्छासे कर्म करते हैं, उन आत्मद्रोहियोंको बातकी इच्छा नहीं रहती ॥ १७ ॥ | सर्वज्ञ पुरुष कर्ममार्गसे चलायमान न करे और स्वयं भी इस प्रकारका प्राणी कार्याकार्य करके भी शुभ- | आसक्त न हो। इस प्रकार पण्डितको उचित है कि मुझमें अशुभ फलको नहीं प्राप्त होता तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें | ही नित्य-नैमित्तिक कर्मको अर्पण कर दे तो वह अहंता इसका कभी कुछ भी साध्य नहीं होता ॥ १८ ॥ | और ममता बुद्धिका त्याग करके परमगतिको प्राप्त हो हे राजन् ! इसलिये प्राणियोंको आसक्तिरहित होकर | जाता है ॥ २९-३० ॥ कर्म करना उचित है, जो आसक्त होता है, उसकी दुर्गति | ईर्ष्या न करनेवाले जो भक्तिमान् मनुष्य मेरे कहे होती है और अनासक्त मुझे प्राप्त हो जाता है ॥ १९ ॥ | हुए इस शुभ मार्गका अनुष्ठान करते हैं, वे सब कर्मोंसे [हे राजन् !] प्राचीन कालमें कर्म करके बहुतसे | मुक्त हो जाते हैं। जो अज्ञानसे चित्तके नष्ट होनेके राजर्षि और ब्रह्मर्षि परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। लोकसंग्रहके | कारण इस मार्गका अनुष्ठान नहीं करते हैं, उन ईर्ष्यालु, निमित्त अनासक्त होकर कर्म करना उचित है ॥ २० ॥ | मूर्ख और नष्टबुद्धियोंको मेरा शत्रु जानो ॥ ३१-३२ ॥ जो कर्म महान् पुरुष करते हैं, वही कर्म अन्य सब | जब ज्ञानवान् भी अपने स्वभावके अनुसार ही करते हैं, वे जिसको प्रमाण मानते हैं, दूसरे भी उसीको | चेष्टा करता है और उसी स्वभावका अनुगमन करता है मानते हैं। हे राजन् ! मुझे कोई वस्तु स्वर्गादिमें भी दुर्लभ | तो ऐसेमें किसी भी प्रकारका नियन्त्रण व्यर्थ है ॥ ३३ ॥ नहीं है और मैं कर्म करके किसी अप्राप्त वस्तुको प्राप्त | कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंके विषयोंमें काम और करनेकी भी इच्छा नहीं करता हूँ, फिर भी मैं कर्म करता | क्रोध उत्पन्न होते हैं, इनके वशमें नहीं होना चाहिये, हूँ और हे महामते ! यदि मैं आलसी तथा स्वच्छन्द | कारण कि ये ही प्राणीके शत्रुरूप हैं ॥ ३४ ॥

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