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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

क्री०ख०-अ०१३९] * कर्मयोग * ६११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करते हुए वे देवगण और तुम मनुष्यो ! श्रेष्ठ तथा सुस्थिर | होकर कर्म न करूँ तो सभी वर्ण कर्म छोड़कर केवल स्थानको प्राप्त करें ॥ ११ ॥ | मेरा अनुगमन करने लगेंगे ॥ २१-२३ ॥ देवता प्रसन्न होकर मनोवांछित अभीष्टोंको पूर्ण | तब मेरे ऐसा करनेसे सब वर्ण आचारभ्रष्ट होकर करते हैं, उन देवताओंके दिये पदार्थोंसे उनकी आराधना | नष्ट हो जायेंगे। इससे इस संसारका नाश करनेवाला और किये बिना जो मनुष्य भोग भोगता है, वह चोर है ॥ १२ ॥ | वर्णसंकरको उत्पन्न करनेवाला भी मैं ही होऊँगा ॥ २४ ॥ जो देवाराधनरूप यज्ञ करके अवशिष्ट अन्नका | जिस प्रकारसे कामनावाले लोग अज्ञानसे सदा कर्म भोजन करते हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त होते हैं और जो | करते रहते हैं, इसी प्रकार विद्वान्‌को उचित है कि अपने निमित्त ही भोजन बनाते हैं, वे पापी मानो पापका | लोकसंग्रहके निमित्त आसक्तिरहित होकर वह कर्म ही भोजन करते हैं। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, | करता रहे। अज्ञानसे कर्म करनेवालोंकी भेदबुद्धिका अन्न वर्षासे उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञसे उत्पन्न होती | त्याग करे तथा योगयुक्त होकर कर्म करता हुआ वे सब है और विहित कर्मसे यज्ञकी उत्पत्ति होती है ॥ १३-१४ ॥ | कर्म मुझे अर्पण कर दे ॥ २५-२६ ॥ कर्म ब्रह्मासे उत्पन्न होता है और ब्रह्मा मुझसे | [हे राजन् !] अविद्या और गुणोंके वशीभूत हो उत्पन्न होते हैं—इस कारण हे राजन् ! आप इस यज्ञमें | निरन्तर कर्म करनेमें लगा हुआ व्यक्ति अहंकारसे मूढ़ और विश्वमें स्थित मुझे ही जानिये ॥ १५ ॥ | होकर अपनेको कर्ता बताता है। जो कोई आत्मज्ञ जब इस आवागमनरूपी संसारचक्रसे बुद्धिमानोंको पार | सत्त्वादि गुणों तथा उनके कर्मोंके विभागको इस प्रकार जाना उचित है, हे राजन् ! जो अधम प्राणी है, वह इसमें | जानते हैं कि इन्द्रियाँ ही अपने विषयोंमें वर्तमान हैं, तो इन्द्रियोंकी क्रीडासे सुख मानता है ॥ १६ ॥ | वे ऐसा जानकर कर्ममें लिप्त नहीं होते ॥ २७-२८ ॥ जो अन्तरात्मामें प्रीति करनेवाला है, वही आत्माराम | सत्त्व, रज, तम—इन तीन गुणोंसे मोहित हुए प्राणी और सबका प्यारा है, जो प्राणी आत्मतृप्त है, उसे किसी | फलकी इच्छासे कर्म करते हैं, उन आत्मद्रोहियोंको बातकी इच्छा नहीं रहती ॥ १७ ॥ | सर्वज्ञ पुरुष कर्ममार्गसे चलायमान न करे और स्वयं भी इस प्रकारका प्राणी कार्याकार्य करके भी शुभ- | आसक्त न हो। इस प्रकार पण्डितको उचित है कि मुझमें अशुभ फलको नहीं प्राप्त होता तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें | ही नित्य-नैमित्तिक कर्मको अर्पण कर दे तो वह अहंता इसका कभी कुछ भी साध्य नहीं होता ॥ १८ ॥ | और ममता बुद्धिका त्याग करके परमगतिको प्राप्त हो हे राजन् ! इसलिये प्राणियोंको आसक्तिरहित होकर | जाता है ॥ २९-३० ॥ कर्म करना उचित है, जो आसक्त होता है, उसकी दुर्गति | ईर्ष्या न करनेवाले जो भक्तिमान् मनुष्य मेरे कहे होती है और अनासक्त मुझे प्राप्त हो जाता है ॥ १९ ॥ | हुए इस शुभ मार्गका अनुष्ठान करते हैं, वे सब कर्मोंसे [हे राजन् !] प्राचीन कालमें कर्म करके बहुतसे | मुक्त हो जाते हैं। जो अज्ञानसे चित्तके नष्ट होनेके राजर्षि और ब्रह्मर्षि परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। लोकसंग्रहके | कारण इस मार्गका अनुष्ठान नहीं करते हैं, उन ईर्ष्यालु, निमित्त अनासक्त होकर कर्म करना उचित है ॥ २० ॥ | मूर्ख और नष्टबुद्धियोंको मेरा शत्रु जानो ॥ ३१-३२ ॥ जो कर्म महान् पुरुष करते हैं, वही कर्म अन्य सब | जब ज्ञानवान् भी अपने स्वभावके अनुसार ही करते हैं, वे जिसको प्रमाण मानते हैं, दूसरे भी उसीको | चेष्टा करता है और उसी स्वभावका अनुगमन करता है मानते हैं। हे राजन् ! मुझे कोई वस्तु स्वर्गादिमें भी दुर्लभ | तो ऐसेमें किसी भी प्रकारका नियन्त्रण व्यर्थ है ॥ ३३ ॥ नहीं है और मैं कर्म करके किसी अप्राप्त वस्तुको प्राप्त | कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंके विषयोंमें काम और करनेकी भी इच्छा नहीं करता हूँ, फिर भी मैं कर्म करता | क्रोध उत्पन्न होते हैं, इनके वशमें नहीं होना चाहिये, हूँ और हे महामते ! यदि मैं आलसी तथा स्वच्छन्द | कारण कि ये ही प्राणीके शत्रुरूप हैं ॥ ३४ ॥

६१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- अपना धर्म यदि गुणरहित हो तो भी अच्छा है और दूसरेका धर्म गुणयुक्त होनेसे भी भला नहीं, अपने धर्ममें मरना भी परलोकमें कल्याणकारी है, परंतु दूसरेका श्रेष्ठ धर्म भी भय प्रदान करता है ॥ ३५ ॥ वरेण्यने कहा—हे गणेशजी! प्राणी जो पाप करता है, वह किसके द्वारा प्रेरित होता है ? इच्छा नहीं होनेपर भी बलात् किससे प्रेरित होता हुआ वह पापाचरण करता है ? ॥ ३६ ॥ श्रीगणेशजी बोले—रजोगुण और तमोगुणसे उत्पन्न हुए ये काम और क्रोध ही दो महापापी हैं। ये लोगोंको अपने वशमें करते हैं, इन्हीं दोनोंको तुम महान् शत्रु जानो। जिस प्रकार माया जगत्‌को ढकती है, जैसे भाप जलको और जैसे वर्षाकालका मेघ सूर्यको ढक लेता है, इसी प्रकार काम और क्रोधने सबको ढक लिया है ॥ ३७-३८ ॥ महाबली, सदैव द्वेष करनेवाले और कभी पूरा न हो सकनेवाले इस इच्छारूप कामने ही बुद्धिमानोंके ज्ञानको भी ढक रखा है ॥ ३९ ॥ यह काम बुद्धि, मन तथा इन्द्रियोंके आश्रित होकर रहता है, उन्हींसे ज्ञानको आच्छादित करके यह ज्ञानियोंको भी मोहित करता है। अतः पहले मनके सहित इन्द्रियोंको वशमें करके ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले इस मनोभव पापी कामको जीतना चाहिये ॥ ४०-४१ ॥ स्थूल देहसे इन्द्रियाँ परे हैं, इन्द्रियोंसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि है और बुद्धिसे परे आत्मा है ॥ ४२ ॥ इस प्रकार बुद्धिसे आत्माको जानकर, बुद्धिसे ही मनको स्थिर करके कामरूपी शत्रुको मारकर परम पदको प्राप्त करना चाहिये ॥ ४३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'कर्मयोग' नामक एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३९ ॥ एक सौ चालीसवाँ अध्याय ज्ञानयोग श्रीगणेशजी बोले—पूर्वकालमें, सृष्टिरचनाके अवसरपर [ब्रह्म-विष्णु-रुद्रात्मक] तीन स्वरूपोंवाले मुझ गणपतिने [ब्रह्मरूपसे] त्रिगुणात्मक जगत्प्रपंचका निर्माण करनेके अनन्तर [जगत्पालक] विष्णुको इस उत्तम योगका उपदेश किया था ॥ १ ॥ विष्णुने यही योग सूर्यसे कहा। सूर्यने अपने पुत्र वैवस्वत मनुसे कहा। इसके उपरान्त परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको महर्षिगण जान पाये ॥ २ ॥ हे राजन्! कलियुगमें यह बहुत काल बीत जानेके बाद विलुप्त हो गया। [उस समय उन कलियुगीन मनुष्योंके द्वारा] इसे श्रद्धा-विश्वासके अयोग्य तथा निन्दनीय समझा गया। अब फिर तुमने मेरे मुखसे इस पुरातन योगको सुना है, यह गुप्त-से-गुप्त, अत्यन्त कल्याणकारक और सम्पूर्ण वेदोंका सार है ॥ ३-४ ॥ राजा वरेण्य बोले—हे गजानन! आप तो इस समय गर्भसे उत्पन्न हुए हैं, फिर आपने विष्णुसे यह उत्तम योग किस प्रकारसे [और कब] वर्णन किया था ? ॥ ५ ॥ गणेशजी बोले—[हे राजन्!] मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत चुके हैं, मैं उन सबको जानता हूँ, परंतु तुम नहीं जानते। हे महाबाहो! मुझसे ही विष्णु आदि देवता उत्पन्न हुए हैं और युग-युगमें प्रलयके समय मुझमें ही लय हो जाते हैं ॥ ६-७ ॥ मैं ही विष्णु तथा ब्रह्मा हूँ, मैं ही महारुद्र हूँ, मैं ही स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण जगत् हूँ ॥ ८ ॥ मैं अजन्मा, अविनाशी तथा सभी जीवोंका आत्मा अनादि ईश्वर हूँ और त्रिगुणात्मक मायामें स्थित होकर मैं ही अनेक अवतार धारण करता हूँ ॥ ९ ॥ जिस समय अधर्मकी वृद्धि और धर्मकी हानि होती है, उस समय साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंको मारनेके लिये मैं अवतार लेता हूँ। मैं अधर्मके समूहको नष्टकर धर्मका संस्थापन करता हूँ और प्रसन्नतापूर्वक अनेक प्रकारकी लीला करता हुआ दुष्टों तथा [धर्महन्ता]

क्री०ख०-अ०१४०] \hspace{60pt} * ज्ञानयोग * \hspace{60pt} ६१३


[बायाँ स्तम्भ]

दैत्योंका वध करता हूँ॥ १०-११ ॥ अनेक रूप धारणकर मैं वर्ण, आश्रम, मुनि और साधुओंका पालन करता हूँ, इस प्रकारसे जो युग-युगमें मेरी दिव्य विभूतिको, मेरे उस समयके कर्म, वीर्य और रूपको जानता है तथा अहंकार और ममताबुद्धिका त्याग कर देता है, वह मुक्त हो जाता है ॥ १२-१३ ॥ इच्छारहित, निर्भय, क्रोधहीन, मुझमें ही आश्रित, मेरी ही उपासना करनेवाले अनेक जन विज्ञान और तपस्यासे शुद्ध होकर मुझको प्राप्त हो गये हैं ॥ १४ ॥ श्रेष्ठजन जिस-जिस भावसे मेरा सेवन करते हैं, मैं अविनाश्र्वर परमात्मा उनको वैसा फल निश्चय ही देता हूँ। हे राजन्! जिस प्रकारसे दूसरे लोग भी मेरे अनुयायी हो जायँ, इसी प्रकारका व्यवहार वे (मेरे भक्तजन) अपने तथा दूसरे मनुष्योंमें करते हैं ॥ १५-१६ ॥ इस संसारमें जो लोग कर्मोंके फल प्राप्त होनेकी इच्छासे देवोपासना करते हैं, उन-उन कर्मोंके अनुसार उनको शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है। हे पापरहित! मृत्युलोकमें मैंने चारों वर्णोंको सत्त्व, रज, तम—इन गुणोंसे और कर्मोंके अंशसे उत्पन्न किया है ॥ १७-१८ ॥ यद्यपि मैं इनका कर्त्ता हूँ, परंतु पण्डितजन मुझे अकर्ता जानते हैं। वे मुझे अनादि, ईश्वर, नित्य और कर्मोंके गुणोंसे अलिप्त मानते हैं। जो मुझे इच्छारहित जानता है, उसको कर्मबन्धन नहीं होता। ऐसा जानकर पूर्वमें पुरातन महर्षिजन कर्म करते थे ॥ १९-२० ॥ वासना, जो कि संसारका मूल और दृढ़ कारण है, और वही अज्ञानका बन्धन है, इसे जानकर प्राणी सभी बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥ क्या कर्म और क्या अकर्म है, यह मैं अब तुमसे कहता हूँ। इसके जाननेमें बुद्धिमान् ऋषिगण भी मोहको प्राप्त होकर मौन रह गये हैं ॥ २२ ॥ हे प्रिय! कर्म, अकर्म और विकर्मका तत्त्व मुक्तिकी इच्छा करनेवालोंको जानना आवश्यक है, वे तीनों ही कर्म हैं। इनकी गति जानना महाकठिन है ॥ २३ ॥ क्रियामें अक्रियाका ज्ञान और अक्रियामें क्रियाकी बुद्धि जिसकी होती है, वही इस लोकमें सभी कर्मोंका


[दायाँ स्तम्भ]

करनेवाला होकर भी मुक्त हो जाता है ॥ २४ ॥ तत्त्वज्ञानरूप अग्निमें जो अपनी क्रियाशक्तिको दग्ध कर चुका है तथा कर्मांकुरभूत संकल्पका त्याग करके कर्मानुष्ठानमें प्रवृत्त होता है, ऐसे व्यक्तिको ही पण्डितजन 'बुध' कहते हैं ॥ २५ ॥ जो फलकी इच्छाको छोड़कर साधनहीन होकर भी सदा तृप्त रहते हैं। यदि वे कर्म करनेमें लगे हों तो भी वे कुछ नहीं करते हैं ॥ २६ ॥ जो इच्छारहित, आत्मजित् एवं सम्पूर्ण परिग्रहका परित्याग किये हैं, ऐसे प्राणी यदि घरमें रहकर कर्म भी करें तो उन्हें कुछ पातक नहीं लगता। जो द्वन्द्व और ईर्ष्यासे हीन होकर सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टि रखते हुए जो कुछ प्राप्ति हो, उसीमें सन्तुष्ट रहते हैं, ऐसे प्राणी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते ॥ २७-२८ ॥ सम्पूर्ण विषयोंसे मुक्त और ज्ञान-विज्ञानयुक्त प्राणीके सारे कर्म यज्ञ ही हैं। ऐसे व्यक्तिकी सारी क्रियाएँ विलीन हो जाती हैं। अग्नि, होमका द्रव्य, हवन करनेवाला और जो आहुति मुझे अर्पण की जाती है, वह सब मैं ही हूँ। ऐसा समझकर वह ब्रह्मको ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह ब्रह्ममें ही स्थित है ॥ २९-३० ॥ कोई योगी देवयजनको यज्ञ कहते हैं, दूसरे ब्रह्मरूप अग्निमें यज्ञ करनेको यज्ञ मानते हैं ॥ ३१ ॥ हे राजन्! कोई योगी संयमरूप अग्निमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंका हवन करते हैं, कोई इन्द्रियरूपी अग्निमें शब्दादि विषयोंकी आहुति देते हैं ॥ ३२ ॥ कोई दूसरे ज्ञानमें जलती हुई वैराग्यरूपी अग्निमें सम्पूर्ण इन्द्रिय, कर्म और प्राणोंका हवन करते हैं ॥ ३३ ॥ कोई द्रव्ययज्ञका अनुष्ठानकर, कोई तपस्यासे, कोई स्वाध्यायसे, कोई महात्मा तीव्र व्रतसे और कोई ज्ञानसे मेरा यजन करते हैं। जो पूरकसे प्राणवायुमें अपानको और रेचकसे प्राणका अपानमें हवन करते हैं और कुम्भकके अनुष्ठानसे प्राणापानकी गतिको रोक लेते हैं, वे प्राणायाममें परायण होते हैं ॥ ३४-३५ ॥ दूसरे नियताहार होकर पाँचों प्राणोंमें पाँचों प्राणोंकी आहुति देते हैं, इस प्रकारसे अनेकविध यज्ञोंमें निरत

६१४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 योगी यज्ञद्वारा पापोंका नाश करते हैं। अन्य दूसरे नित्य मिलनेपर साधक सभी प्राणियोंको अपनेमें ही देखता है। ही यज्ञसे बचे अमृत पदार्थका भोजनकर नित्य ब्रह्मको इस ज्ञानयोगसे अतिपापी प्राणी भी मुक्त हो जाता है। प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवालोंको तो यह लोक भी जिस प्रकारसे प्रचण्ड जलती अग्नि सबको क्षणभरमें भस्म नहीं मिलता, परलोक कहाँ मिलेगा ? ॥ ३६-३७ ॥ कर देती है, इसी प्रकार ज्ञानाग्निमें पाप-पुण्य दोनों हे राजन् ! वेदोंमें कायिक (वाचिक, मानसिक) प्रकारके कर्म सद्यः नष्ट हो जाते हैं ॥ ४३-४५ ॥ आदि तीन प्रकारके यज्ञोंका प्रतिपादन किया गया है, उन्हें हे राजन् ! ज्ञानके समान और कोई वस्तु पवित्र पूर्णतया जानकर तुम सारे बन्धनोंसे मुक्त हो जाओगे। हे नहीं है, योगसिद्ध महात्मा उस ज्ञानको योगाभ्यासके राजन् ! सब यज्ञोंमें ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। मोक्षसाधक प्रभावसे यथासमय स्वयं ही प्राप्त करते हैं ॥ ४६ ॥ ज्ञानयज्ञमें समस्त कर्म विलीन हो जाते हैं ॥ ३८-३९ ॥ इन्द्रियोंको वशमें करनेवाला भक्तिमान्, तत्पर पुरुष हे पुरुषश्रेष्ठ ! उस ज्ञानयज्ञको सत्पुरुषोंकी सेवा, ही ज्ञानको प्राप्त कर सकता है और ज्ञान प्राप्त होनेसे प्रणति और प्रश्नसे प्राप्त करो। तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीजन थोड़े समयमें ही वह मुक्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ ४७ ॥ तुम्हें उसका उपदेश करेंगे। जो मनुष्य अनेक प्रकारकी जो भक्तिहीन, श्रद्धारहित और सर्वत्र संदिग्धचित्त संगति करता है, पर किसी साधुकी एक बार भी संगति नहीं है, उसे कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती, न ज्ञान होता है करता, वह संसारमें बन्धनको प्राप्त होता है ॥ ४०-४१ ॥ तथा उसका इहलोक और परलोक नष्ट हो जाता है। सत्संगसे सभीको गुणोंकी प्राप्ति और आपदाओंका हे राजन् ! जो आत्मज्ञानमें रत हैं, जिन्होंने ज्ञानसे सभी नाश होता है तथा लोक और परलोकमें अपना कल्याण सन्देह दूर कर लिये हैं तथा योगमें स्थित होनेसे जिनके प्राप्त होता है ॥ ४२ ॥ कर्म क्षीण हो गये हैं, वे बन्धनमें नहीं पड़ते ॥ ४८-४९ ॥ हे राजन् ! अन्य सब तो सुलभ है, परंतु सत्संग बड़ा अतएव ज्ञानरूपी खड्गसे मनके अज्ञानजन्य दुर्लभ है। जिसके जाननेसे फिर संसारके बन्धनमें नहीं संशयको बलपूर्वक काटकर मनुष्यको योगका आश्रय आना होता, उसे जानना आवश्यक है। सत्संगसे ज्ञान लेना उचित है ॥ ५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'ज्ञानयोग' नामक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४० ॥ एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय संन्यासयोग वरेण्य बोले- हे भगवन् ! आप कर्मसंन्यास (अर्थात् है ॥ ३ ॥ निष्कामभावसे कर्म करते-करते विशुद्धचित्त होनेपर कर्मसंन्यास और कर्मयोगको मूढ़ और अज्ञानी ही कर्मत्याग करने)-को ज्ञानका कारण कहकर फिर पृथक्-पृथक् कहते हैं, परंतु पण्डितगण उन्हें एक ही कर्मयोगको ज्ञानका कारण कहते हैं, इन दोनोंमें जो मानते हैं ॥ ४ ॥ हितकारी हो, उसे मुझसे कहिये ॥ १ ॥ जो फल कर्मसंन्याससे मिलता है, वही फल श्रीगणेशजी बोले- [अधिकारियोंके भेदसे] कर्मयोगसे प्राप्त होता है, कर्मसंन्यास और कर्मयोगको कर्मयोग और कर्मसंन्यास दोनों ही मुक्तिके साधन हैं, उन जो एक जानता है, वही यथार्थ ज्ञाता है ॥ ५ ॥ दोनोंमें कर्मसंन्याससे कर्मयोगमें विशेषता है ॥ २ ॥ पण्डितजन केवल कर्मके संन्यासको ही संन्यास जो सर्वदा द्वन्द्व और दुःखको सह लेता है, किसीसे नहीं कहते, यदि योगी अनिच्छासे अर्थात् अनासक्त द्वेष नहीं करता और किसी बातकी इच्छा नहीं करता, होकर कर्म करे, तो वह ब्रह्म ही हो जाता है ॥ ६ ॥ ऐसा प्राणी अनायास ही कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता शुद्धचित्त, मनको वशमें करनेवाले, जितेन्द्रिय,

क्री०ख०-अ०१४१ ] * संन्यासयोग * ६१५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 [बायाँ स्तम्भ] योगमें तत्पर और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित आत्माको देखनेवाले योगिजन कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होते। तत्त्वको जाननेवाला योगयुक्त आत्मवान् पुरुष 'मैं कर्ता हूँ', ऐसा नहीं मानता, अपितु मनसहित एकादश इन्द्रियाँ कर्म करती हैं, ऐसा मानता है ॥ ७-८ ॥ जो कर्म करनेवाला सारे कर्म ब्रह्ममें अर्पण कर देता है, वह उसी प्रकार पाप-पुण्यसे लिप्त नहीं होता, जैसे जलमें पड़ा हुआ सूर्यका बिम्ब उस जलसे लिप्त नहीं होता। योगके जाननेवाले चित्तशुद्धिके निमित्त आशा (फलाशा)-का त्यागकर शरीर, वचन, बुद्धि, इन्द्रिय और मनसे कर्म करते हैं। योगहीन मनुष्य कर्मोंको फलकी इच्छासे करता है, वह कर्मबीजोंसे बँध जाता है और इसीसे दुःखको प्राप्त होता है ॥ ९-११ ॥ योगीको उचित है कि मनसे सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर [प्रारब्धवश] प्राप्त हुए उत्तम नगरादि अथवा गुहा-गर्त आदिमें सुखपूर्वक निवास करे। वह [सकाम भावसे] न कुछ करे, न कराये और ऐसा जाने कि न कोई क्रिया करता हूँ, न कोई कर्तृत्वपना मुझमें है, न मैं कोई निर्माण करता हूँ, न मेरा क्रियाके बीजसे सम्बन्ध है, यह सब कुछ शक्ति अर्थात् प्रकृतिसे स्वयं होता रहता है। हे राजन् ! मैं विभु आत्मा किसीके पुण्य और पापोंको स्पर्श नहीं करता हूँ। मोहसे मलिन बुद्धिवाले अज्ञानी ही मोहको प्राप्त होते हैं ॥ १२-१४ ॥ जिन्होंने विवेकके द्वारा स्वयं ही अपना अज्ञान नष्ट किया है, उनका परम ज्ञान सूर्यके समान प्रकाशित होता है। जिनकी निष्ठा और बुद्धि मुझमें ही है, जिनका चित्त मुझमें अत्यन्त आसक्त है और जो सदा मेरे परायण हैं, वे श्रेष्ठ ज्ञानद्वारा पापका नाश करके मुक्त हो जाते हैं ॥ १५-१६ ॥ महात्मा पण्डितजन ज्ञानविज्ञानयुक्त ब्राह्मण, गौ, हाथी आदि प्राणी, चाण्डाल और श्वान-इन सबमें समान दृष्टि रखते हैं। जिनका मन समतामें स्थित है, वे जीवन्मुक्तजन संसार और स्वर्गको जीत चुके हैं, कारण कि ब्रह्म निर्दोष और समतायुक्त है, इस कारण वे ब्रह्ममें स्थित रहते हैं ॥ १७-१८ ॥ [दायाँ स्तम्भ] जो महात्मा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें हर्ष-शोक नहीं करते, वे समत्वबुद्धिसे युक्त ज्ञानीजन ब्रह्ममें स्थित तथा ब्रह्मको जाननेवाले हैं ॥ १९ ॥ वरेण्य बोले-भगवन् ! तीनों लोकों तथा देवता और गन्धर्व आदि योनियोंमें यथार्थ सुख क्या है? हे विद्याविशारद ! कृपा करके आप मुझसे यह वर्णन कीजिये ॥ २० ॥ श्रीगणेशजी बोले-जो अपनी आत्मामें ही रमण करते हैं और कहीं आसक्त नहीं होते, वे ही आनन्द भोगते हैं। उसीका नाम अविनाशी सुख है, विषयादिकोंमें (वास्तविक) सुख नहीं है। विषयोंसे उत्पन्न हुए सुख तो दुःखके ही कारण हैं और उत्पत्ति तथा नाशवाले हैं। तत्त्ववित् उनमें आसक्त नहीं होते ॥ २१-२२ ॥ काम, क्रोध आदिका कारण उपस्थित रहनेपर भी जो उनके आवेगको रोक लेता है तथा शरीरके प्रति अनासक्त होकर उन कामादिको जीतनेका प्रयत्न करता है, वह बहुत कालतक सुख भोगता है ॥ २३ ॥ जिनके हृदयमें निष्ठा है, ज्ञानका प्रकाश है, सुख है तथा वैराग्य है, जो सब प्राणियोंका हित करता है, वह निश्चय ही अक्षय ब्रह्मको प्राप्त करता है ॥ २४ ॥ अहो ! जो काम-क्रोधादि छहों शत्रुओंको जीत चुके हैं, जो शम और दमका पालन करते हैं, उन आत्मज्ञानियोंको सर्वत्र ब्रह्म ही दीखता है ॥ २५ ॥ सभी बाह्य विषयोंका त्यागकर एकान्तमें आसनमें स्थित हो, दृष्टिको भ्रूमध्यमें स्थिरकर प्राणायाम करे ॥ २६ ॥ प्राण और अपान वायुके रोकनेको प्राणायाम कहते हैं, बुद्धिमान् ऋषियोंने उसके तीन भेद कहे हैं ॥ २७ ॥ प्रमाणके भेदसे प्राणायाम लघु, मध्यम और उत्तम- तीन प्रकारका है, बारह अक्षरका प्राणायाम लघु कहलाता है। चौबीस अक्षरोंका मध्यम और छत्तीस अक्षरोंका उत्तम कहा जाता है ॥ २८-२९ ॥ सिंह, व्याघ्र अथवा मतवाले हाथीको जैसे मनुष्य नम्र करके अपने अधीन करता है, इसी प्रकार प्राण और अपान वायुको साधना चाहिये ॥ ३० ॥ हे राजन् ! जिस प्रकार सिंहादि मृगोंको सताते हैं,

६१६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 किंतु वशमें करनेवाले लोगोंको पीड़ा नहीं देते, इसी | धारणाओंसे योग सिद्ध होता है, अतः योगी निरन्तर प्रकार यह वायु प्राणायामसे स्थिर होकर पापोंको तो | धारणाका अभ्यास करे। हे राजन् ! जो इस प्रकार साधना भस्म करता है, परंतु शरीरको नहीं जलाता ॥ ३१॥ | करते हैं, उन्हें त्रिकालका ज्ञान हो जाता है और जिस प्रकार क्रमसे मनुष्य सीढ़ियोंपर चढ़ता है, | अनायास त्रिलोकी उनके वशमें हो जाती है ॥ ३४-३५॥ इसी प्रकार योगीके लिये क्रमसे प्राण-अपानको वशमें | वह अपने अन्तरात्मामें समस्त जगत्को ब्रह्मरूप करना उचित है। *पूरक-कुम्भक और रेचकका अभ्यास | देखता है। इस प्रकारसे कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों करके यह प्राणी इस जगत्में भूत, भविष्य तथा वर्तमान | समान फलके देनेवाले हैं। सभी प्राणियोंके हितकारी तीनों कालोंका ज्ञाता हो जाता है ॥ ३२-३३ ॥ | और कर्मका फल देनेवाले एवं त्रिलोकीमें व्यापक मुझ बारह उत्तम प्राणायामोंसे उत्तम धारणा होती है, दो | ईश्वरको जानकर मनुष्य मुक्त हो जाते हैं ॥ ३६-३७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'वैध-संन्यासयोग' नामक एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४१ ॥ एक सौ बयालीसवाँ अध्याय योगावृत्तिकी प्रशंसा श्रीगणेशजी बोले- हे राजन् ! जो श्रुति और | अधिकतावाले देशमें, जिस स्थानमें ध्वनि अधिक हो, जो स्मृतिमें कहे हुए कर्मोंको फलकी इच्छा न करके करता | टूटा-फूटा हो, गोष्ठ, अग्निके निकट, जलके निकट, कूपके है, वह योगी कर्मका त्याग करनेवाले योगियोंसे श्रेष्ठ है। | निकट, श्मशान, नदी, दीवारके निकट तथा जहाँ शुष्क हे महाभुज ! मेरे मतमें योगप्राप्तिके निमित्त कर्म ही | पर्णका शब्द सुनायी पड़ता हो, चैत्य वृक्षके नीचे, वल्मीक कारण है, योगसिद्धिकी उपलब्धिके निमित्त शम और | (बाँबी)-वाले स्थानमें और पिशाचादिसे युक्त स्थानमें दम ही कारण हैं ॥ १-२॥ | योगध्यानपरायण योगी योगाभ्यास न करे ॥ ७-९ ॥ इन्द्रियोंके विषयोंका संकल्पकर कर्म करनेवाला | स्मृतिका लोप होना, गूँगापन, बधिरता, मन्दता, आत्माका शत्रु ही होता है और जो इनकी इच्छा न करके | ज्वर, जड़ता-ये सब विकार योगाभ्याससम्बन्धी दोषोंके कर्म करता है, वही योगी सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ | अज्ञानसे योगीको होते हैं। योगाभ्यासीको ये सब एकमात्र आत्मा ही आत्माका मित्र और शत्रु है, | दोषपूर्ण स्थान त्याग देने चाहिये, ऐसा न करनेसे अवश्य यही ज्ञान होनेसे उद्धार करता है और यही अज्ञान होनेसे | ही स्मृतिलोप आदि दोष होते हैं ॥ १०-११ ॥ बन्धनमें डालता है, दूसरा कोई नहीं ॥ ४ ॥ | हे राजन् ! योगी सदा थोड़ा भोजन करे, बिना मान, अपमान, सुख, दुःख, बन्धु, साधु, मित्र, | भोजन किये भी न रहे, न बहुत सोये, न बहुत जागे- अमित्र, उदासीन, द्वेषी, मिट्टीके ढेले और सुवर्ण इत्यादिमें | इस प्रकार सदा योगाभ्यास करनेसे सिद्धिको प्राप्त हो समान बुद्धि रखनेवाला, जितेन्द्रिय, विज्ञानी और जितात्मा | जाता है। सम्पूर्ण इच्छा और कामनाओंका त्याग करे, साधक सदा योगका अभ्यास करता रहे, जबतक कि | थोड़ा भोजन करे, जागरणशील हो, बुद्धिसे सब इन्द्रियोंको उसको योगकी सिद्धि न हो जाय ॥ ५-६॥ | वशमें करके शनैः शनैः [ऐन्द्रिय विषयोंसे] विरत हो जो सन्तप्त हो, श्रान्त हो, व्याकुल, क्षुधित अथवा | जाय ॥ १२-१३ ॥ व्यग्रचित्त हो, वह योगाभ्यास न करे। अतिशीतकाल | जिस-जिस स्थानमें मन जाय, उस-उस स्थानसे अथवा अति उष्णकाल, अग्नि, वायु और जलकी | उसे खींचे और धैर्यसे उसे अपने वशमें करे, क्योंकि वह *पूरक-वायुको ऊपर खींचना, कुम्भक - वायुका रोध करना, रेचक- वायुका त्याग करना- ये तीन प्राणायामके अंग हैं।

क्री०ख०-अ०१४३ ] * श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने तात्त्विक स्वरूपका परिचय देना * ६१७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 महाचंचल है। योगी सदा इस प्रकार करनेसे परम | कारण साधारण मनुष्य इसका छेदन करनेमें समर्थ नहीं शान्तिको प्राप्त होता है और वह संसारमें अपनी | होते ॥ २०-२१ ॥ आत्माको और अपनी आत्मामें संसारको देखता है। योगसे | अतिशय दुःख, वैराग्य, भोगतृष्णाका त्याग, गुरुकी जो मुझको प्राप्त होता है, उसको मैं आदरपूर्वक प्राप्त | कृपा, सत्संग-ये इस (मन)-को जीतनेके उपाय हैं। होता हूँ और जो मुझे नहीं छोड़ता है, उसको मैं नहीं | योगसिद्धिके निमित्त अभ्याससे मनको अपने वशमें छोड़ता हूँ तथा संसारसे मुक्त कर देता हूँ ॥ १४-१६ ॥ | करे, हे वरेण्य ! बिना मनको जीते योगसाधन महाकठिन सुख-दुःख, द्वेष, क्षुधा, सन्तोष और तृषा-इनमें | है ॥ २२-२३ ॥ जो आत्माके समान सब प्राणियोंको देखता है, जो मुझ | वरेण्य बोले-हे भगवन्! योगभ्रष्टको किस सर्वव्यापीको जानता है और जो केवल मुझमें संलग्न है, | लोककी प्राप्ति होती है, उसकी क्या गति होती है और वह जीवन्मुक्त है और वह त्रिलोकीमें ब्रह्मादि देवताओंद्धारा | क्या फल होता है? हे सर्वज्ञ ! हे बुद्धिरूपी चक्रको नमस्कार करनेयोग्य है ॥ १७-१८ ॥ | धारण करनेवाले ! मेरे इस सन्देहका छेदन कीजिये ॥ २४ ॥ वरेण्य बोले-हे भगवन् ! इन दोनों प्रकारके | श्रीगणेशजी बोले- [हे राजन् !] योगभ्रष्ट पुरुष योगोंको मैं महाकठिन देखता हूँ, कारण कि मन बड़ा दुष्ट | दिव्य देह धारणकर स्वर्गमें जाते हैं, वहाँ उत्तम सुख भोगकर और चंचल है तथा इसका निग्रह करना कठिन है ॥ १९ ॥ | पुनः शुद्ध आचरणवाले योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं। श्रीगणेशजी बोले- [हे राजन्!] जो निग्रह | और फिर पूर्वजन्मोंके संस्कारसे वे योगी होते हैं। कोई भी करनेमें कठिन इस मनका नियमन करता है, वह | पुण्यकर्म करनेवाला नरकको नहीं जाता ॥ २५-२६ ॥ घटीयन्त्रके समान घूमनेवाले इस संसारचक्रसे मुक्त हो | हे नराधिप ! योगनिष्ठ साधक ज्ञाननिष्ठ, तपोनिष्ठ जाता है। विषयरूपी अरोंसे यह दृढ़ चक्र बना हुआ है | तथा कर्मनिष्ठ साधकोंसे श्रेष्ठ है और जो मेरा भक्त है, और कर्मरूपी कीलोंसे अच्छी प्रकार जड़ा हुआ है, इस | वह तो इन सभीसे श्रेष्ठतम है ॥ २७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'योगावृत्तिप्रशंसनयोग' नामक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४२ ॥ एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने तात्त्विक स्वरूपका परिचय देना श्रीगणेशजी बोले- [हे राजन् !] इस प्रकार | और भी वृद्ध मुनिजन ऐसा वर्णन करते हैं कि मुझमें मन लगाकर मेरा वह तत्त्व जानो, जिसको जाननेसे | आने-जानेवाली, जीवत्वको प्राप्त हुई तथा त्रिलोकीमें मुझे सर्वगत और यथार्थ जानकर मुक्त हो जाओगे ॥ १ ॥ | व्याप्त भी मेरी दूसरी (परा) प्रकृति है ॥ ५ ॥ हे राजन् ! लोगोंके ऊपर अनुग्रहकी इच्छासे वह | इन दोनोंसे ही समस्त चराचर जगत् उत्पन्न होता तत्त्व मैं तुमसे वर्णन करता हूँ, जिसको जाननेसे दूसरे | है और इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और नाशका कर्ता मुक्तिके साधनको जाननेकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ २ ॥ | मैं ही हूँ। मेरे इस तत्त्वको जाननेके निमित्त वर्णाश्रमी प्रथम तो मेरी प्रकृतिको जानना चाहिये, उससे ज्ञान | पुरुषोंमें पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार कोई एक यत्न करता प्राप्त होता है, इसके उपरान्त मेरा ज्ञान होनेसे प्राणियोंको | है ॥ ६-७ ॥ विज्ञान-सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥ | उन यत्नवानोंमें कोई एक मेरा साक्षात् करता है, पृथ्वी, अग्नि, आकाश, अहंकार, जल, चित्त, | मुझसे अन्य और किसीको वह नहीं देखता और मुझमें बुद्धि, वायु, रवि, चन्द्र, यजमान-यह ग्यारह प्रकारकी | सम्पूर्ण जगत्को देखता है ॥ ८ ॥ मेरी (अपरा) प्रकृति है ॥ ४ ॥ | पृथ्वीमें सुगन्धिरूपसे, अग्निमें तेजरूपसे, सूर्य और

६१८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

क्री०ख०-अ०१४५ ] * श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने विराट्स्वरूपका दर्शन कराना * ६१९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अथवा कोई भी व्यक्ति हो, जो मेरी केवल पूजा ही | बहिर्मातृकान्यास तथा षडंगन्यास करे ॥ १४-१५ ॥ करता है अर्थात् अन्य साधन नहीं करता, वह भी | इसके उपरान्त मूलमन्त्रका न्यास करके ध्यान करे सिद्धिको प्राप्त होता है। मुझे छोड़कर और मुझसे | और स्थिर चित्तसे गुरुमुखसे सुने हुए मन्त्रका जप करे। [चित्र] | फिर देवताके निमित्त जपको निवेदनकर अनेक स्तोत्रोंसे | स्तवन करे। इस प्रकारसे जो मेरी उपासना करता है, वह | सनातनी मुक्तिको प्राप्त होता है ॥ १६-१७ ॥ | जो मनुष्य उपासनासे हीन है, उसे धिक्कार है और | उसका जन्म वृथा है। यज्ञ, औषध, मन्त्र, अग्नि, आज्य, | हवि और हुत—यह सब मेरा ही स्वरूप है ॥ १८ ॥ | ध्यान, ध्येय, स्तुति, स्तोत्र, नमस्कार, भक्ति, उपासना, | वेदत्रयीसे जाननेयोग्य, पवित्र, पितामहका पितामह— | सब मैं ही हूँ ॥ १९ ॥ | ओंकार, पावन, साक्षी, प्रभु, मित्र, गति, लय, | उत्पत्ति, पोषक, बीज, शरण, इसी प्रकार असत्, सत्, | मृत्यु, अमृत, आत्मा, ब्रह्म, दान, होम, तप, भक्ति, जप, | स्वाध्याय—यह सब मैं ही हूँ ॥ २०-२१ ॥ | यह जो कुछ भी करे, वह सब मुझे निवेदन कर द्वेषकर जो अन्य किसी देवताका भक्तिसे पूजन करता है। | दे। मेरा आश्रय ग्रहण करनेवाले स्त्री, दुराचारी, पापी, हे राजन्! वह भी मेरी ही पूजा करता है, किंतु | क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रादि भी मुक्त हो जाते हैं, फिर मेरे भक्त विधिपूर्वक नहीं। जो अन्य देवताका अथवा मेरा पूजन | द्विजातिकी तो बात ही क्या है? मेरा भक्त मेरी इन करके अन्यके प्रति द्वेष करता है, वह सहस्र कल्पवर्षतक | विभूतियोंको जानकर कभी नष्ट नहीं होता ॥ २२-२३ ॥ नरकमें पड़कर सदा दुःख भोगता है ॥ ११-१३ १/२ ॥ | मेरे प्रभव (उत्पत्ति) और मेरी विभूतियोंको देवता [पूजनार्थ उद्यत साधक] सर्वप्रथम भूतशुद्धि करके | और ऋषि भी नहीं जानते। मैं अनेक विभूतियोंसे विश्वको फिर प्राणायाम करे। फिर चित्तकी वृत्तियोंका निरोध | व्याप्त करके स्थित हूँ। जो-जो इस लोकमें श्रेष्ठतम हैं, वे करके न्यास करे, पहले अन्तर्मातृकान्यास करके फिर | सब मेरी विभूति हैं—ऐसा समझो ॥ २४-२५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'उपासनायोगका वर्णन' नामक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४४ ॥ एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने विराट्स्वरूपका दर्शन कराना वरेण्य बोले—हे भगवन्! नारदजीके मुखसे | इस समय आप अपना मनोहर और व्यापक रूप मुझे मैंने आपकी अनेक विभूतियोंका श्रवण किया है, | दिखाइये ॥ २ ॥ उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उन (विभूतियोंमें कुछ)- | श्रीगणेशजी बोले—अकेले मुझमें ही तुम यह को जानता हूँ, समस्त विभूतियोंको तो वे (गजानन) | चराचर संसार देखो और अनेक प्रकारके दिव्य आश्चर्य ही जानते हैं ॥ १ ॥ | देखो, जो पूर्वकालमें किसीने नहीं देखे हैं ॥ ३ ॥ हे गजानन! आप ही उन सबको तत्त्वसे जानते हैं, | मैं अपने प्रभावसे तुमको ज्ञाननेत्र देता हूँ; क्योंकि

६२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मुझ सर्वव्यापक, अजन्मा और अव्ययको चर्मचक्षु नहीं | तथा मैं भी डर गया हूँ, यह आपका मुख अनेक तीक्ष्ण देख सकते ॥ ४॥ | दाढ़ोंसे भयंकर है तथा आप अनेक विद्याओंके पारगामी व्यासजी बोले-तब वे राजा वरेण्य दिव्य | हैं ॥ १५-१६ ॥ दृष्टिको प्राप्तकर भगवान् गणेशजीके महान् अद्भुत | प्रलयकी अग्निके समान दीप्तिमान् आपका मुख परमरूपको देखनेमें समर्थ हुए ॥ ५ ॥ | है, आपका रूप जटिल एवं नभःस्पर्शी है। हे गणेशजी ! असंख्य शोभायमान मुख, असंख्य सूँड एवं हाथ | आपका यह रूप देखकर मैं भ्रान्त-सा हो गया हूँ ॥ १७ ॥ और सुगन्धिसे लिप्त, दिव्य भूषण, वसन और मालासे | देवता, मनुष्य, नागादि और खग तुम्हारे उदरमें शोभित, असंख्य नेत्र, करोड़ों सूर्योंकी किरणोंके समान | शयन करते हैं, वे अनेक योनियोंको भोगकर अन्तमें प्रकाशित आयुध धारण किये उन गजाननदेवके शरीरमें | आपमें ही उसी प्रकार प्रवेश करते हैं, जैसे सागरसे उत्पन्न राजाने अलग-अलग तीनों लोक देखे ॥ ६-७ ॥ | हुए मेघके जलबिन्दु फिर उसीमें लीन होते हैं ॥ १८ ॥ ईश्वरका यह परम रूप देखनेके बाद प्रणाम करके | इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, राजा (वरेण्य) बोले- हे भगवन् ! मैं आपकी इस देहमें | ईशान, सोम, सूर्य और सम्पूर्ण जगत्- यह सब आप ही देवता-ऋषिगण और पितरोंको देख रहा हूँ। हे विभो ! | हैं, हे स्वामिन् ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, आप मेरे मैं सात पाताल, सात समुद्र, सात द्वीप, सात पर्वत, सात | ऊपर अब कृपा करें ॥ १९-२० ॥ महर्षि और अनेक पदार्थोंके समूह देख रहा हूँ ॥ ८-९ ॥ | आप मेरेद्वारा पूर्वमें देखा हुआ अपना सौम्य रूप मैं पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, मनुष्य, सर्प, राक्षस, | मुझे दिखाइये, हे भूमन् ! अपनी इच्छासे क्रीडा करनेवाले ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, देवता और अनेक प्रकारके | आपकी लीलाको कौन जान सकता है ? आपकी कृपासे जन्तुओंको देख रहा हूँ ॥ १० ॥ | मैंने इस प्रकारका ऐश्वर्यशाली रूप देखा; क्योंकि आपने मैं अनादि, अनन्त, लोकादि, अनन्त भुजा और | प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानचक्षु दिये थे ॥ २१-२२ ॥ सिरोंसे युक्त तथा जलती हुई अग्निके समान प्रकाशमान | श्रीगणेशजी बोले- हे महाबाहु ! योग न करनेवाले अप्रमेय पुरातन आपको देख रहा हूँ ॥ ११ ॥ | लोग मेरे इस रूपका कभी भी दर्शन नहीं पाते, सनकादि मैं किरीट-कुण्डल धारण किये, कठिनाईसे देखनेयोग्य, | तथा नारदादि मेरे अनुग्रहसे इस रूपका दर्शन करते हैं। आनन्ददायक तथा विशाल वक्षःस्थलयुक्त आप प्रभुका | चारों वेदोंके अर्थके तत्त्वको जाननेवाले, सम्पूर्ण शास्त्रोंमें दर्शन कर रहा हूँ। देवता, विद्याधर, यक्ष, किन्नर, मुनि, | कुशल, यज्ञ, दान और तप करनेवाले भी मेरे रूपको मनुष्य, नृत्य करती हुई अप्सराओं और गान करते हुए | [यथार्थतः] नहीं जानते ॥ २३-२४ ॥ गन्धर्वोंसे आपका स्वरूप सेवित है ॥ १२-१३ ॥ | मैं भक्तिभावसे जानने, दीखने, प्राप्त होनेके योग्य आठ वसु, बारह आदित्योंके गण, सिद्ध, साध्य- | हूँ, अब तुम भय और मोहको त्यागकर मेरे सौम्य रूपको ये सब प्रसन्नतापूर्वक महाभक्तिसे आपकी सेवा कर रहे | देखो ॥ २५ ॥ हैं और विस्मयको प्राप्त होकर आपको देख रहे हैं ॥ १४ ॥ | हे राजन् ! जो भक्त मेरे परायण एवं सर्वसंगत्यागी ये आपको ज्ञाता, अक्षर, वेद्य, धर्मके रक्षक, | होकर सब कर्म मुझमें ही समर्पित करते हैं और क्रोध पाताल, दिशा, स्वर्ग और पृथ्वीमें व्यापक और ईश्वरके | त्यागकर सभी प्राणियोंमें समान दृष्टि रखते हैं, वे मुझको रूपमें जानते हैं। आपके रूपको देखकर सम्पूर्ण लोक | ही प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विश्वरूपदर्शन' नामक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४५ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_21_1_Back

एक सौ छियालीसवाँ अध्याय

क्री०ख०-अ०१४६] * सगुणोपासनाकी श्रेष्ठता; क्षेत्र, ज्ञान तथा ज्ञेयका वर्णन * ६२१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ छियालीसवाँ अध्याय सगुणोपासनाकी श्रेष्ठता; क्षेत्र, ज्ञान तथा ज्ञेयका वर्णन वरेण्य बोले-[हे भगवन्!] मूर्तिमान् आपकी जो अनन्यभावसे उपासना करते हैं और जो अक्षर एवं परम अव्यक्त आपकी उपासना करते हैं, उनमें श्रेष्ठ कौन है? हे विभो! आप सब जाननेवाले, सबके साक्षी, भूतभावन ईश्वर हैं, इस कारण मैं आपसे पूछता हूँ, आप कृपाकर कहिये ॥ १-२ ॥ श्रीगणेशजी बोले-जो भक्त मुझमें चित्त लगाकर मूर्तिमान् मेरी भक्तिपूर्वक उपासना करता है, ऐसा वह अनन्य भक्तिमान् मुझे [विशेष] मान्य है ॥ ३ ॥ सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने वशमें करके सब प्राणियोंका हित करता हुआ जो अक्षर, अव्यक्त, सर्वव्यापी और कूटस्थ स्थिर ब्रह्मका ध्यान करता है तथा जो जाननेमें अशक्य मेरी उपासना करता है, वह भी मुझे ही प्राप्त करता है, उसका भी मैं संसारसागरसे उद्धार करता हूँ ॥ ४-५ ॥ अव्यक्त ब्रह्मकी उपासना करनेवाले जनोंको अधिक क्लेश भोगना पड़ता है। जो व्यक्त स्वरूपकी भक्तिसे प्राप्त होता है, वही अव्यक्तकी उपासनासे भी होता है। थोड़ा जाननेवाला भी यदि भक्तिमान् हो तो वह सम्पूर्ण विद्वानोंमें श्रेष्ठ है। इसमें मुख्य कारण भक्ति ही है ॥ ६-७ ॥ जो भक्तिविहीन होकर भजन करता है, वह चाण्डाल है और जो जन्मसे चाण्डाल होकर भी मेरा भक्तिपूर्वक भजन करता है, वह उस ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है। शुकादि तथा सनकादि ऋषिगण भक्तिसे ही मुक्त हुए हैं और भक्तिसे ही नारद और चिरंजीवी मार्कण्डेयादि मुझको प्राप्त हुए हैं ॥ ८-९ ॥ इस कारण भक्तिसे मन और बुद्धि मुझमें लगानी चाहिये, हे राजन्! भक्तिपूर्वक मेरा यजन करोगे तो मुझको ही प्राप्त होओगे। हे राजन्! यदि मुझमें अपना मन न लगा सको, तो अभ्यासयोगसे मुझे प्राप्त करनेका यत्न करो ॥ १०-११ ॥ और जो यह भी न हो सके, तो जो कुछ कर्म करो, उसे मुझे अर्पित करो, मेरी कृपासे तुम परम शान्तिको प्राप्त होओगे और यदि यह भी न कर सको तो यत्नपूर्वक तीनों प्रकारके कर्मोंके फलका त्याग करो। प्रथमतः मुझमें बुद्धि लगाना श्रेष्ठ है, उससे ध्यान श्रेष्ठ है, उससे सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग श्रेष्ठ है, इससे अत्यन्त श्रेष्ठ शान्ति है ॥ १२-१४ ॥ जो अहंकारका त्याग करनेवाला, ममताबुद्धिसे रहित, द्वेष न करनेवाला, सबमें करुणा रखनेवाला और लाभ-अलाभ, सुख-दुःख, मान-अपमानमें एक दृष्टि रखनेवाला है, वह मेरा प्रिय है ॥ १५ ॥ जिसको देखकर किसीको भय नहीं होता और जो किसीसे भययुक्त नहीं होता है; उद्वेग, भय, क्रोध और हर्षसे जो रहित है, वही मेरा प्रिय है ॥ १६ ॥ शत्रु-मित्र, निन्दा-स्तुति, हर्ष-शोकमें जिसका चित्त एक है, जो मौनी, स्थिरचित्त, भक्तिमान् और असंग है, वह मेरा प्रिय है। जो मेरे इस उपदेशका पालन करता है, वह त्रिलोकीमें नमस्कारके योग्य है और वह मुक्तात्मा मेरा सदा प्रिय है। जो अनिष्टकी प्राप्तिमें द्वेष और इष्टकी प्राप्तिमें हर्ष नहीं करता है तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञको जानता है, वही मेरा सबसे प्रिय है ॥ १७-१९ ॥ वरेण्य बोले-हे गजानन! क्षेत्र क्या है और उसको जाननेवाला कौन है, उसका ज्ञान क्या है? हे करुणासागर ! मुझ प्रश्न करनेवालेको यह सब आप बताइये ॥ २० ॥ श्रीगणेशजी बोले- [पृथ्वी, जल आदि] पाँच महाभूत और उनकी [गन्ध, रस आदि] तन्मात्राएँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, अहंकार, मन, बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, अव्यक्त (मूल प्रकृति), इच्छा, धैर्य, द्वेष, सुख-दुःख और चेतनासहित यह सारा समूह क्षेत्र कहलाता है ॥ २१-२२ ॥ हे राजन्! उसको जाननेवाला सर्वान्तर्यामी सर्वव्यापक तुम मुझको जानो। मैं और यह समूह-ये दोनों ज्ञानके विषय हैं ॥ २३ ॥ सरलता, गुरुशुश्रूषा, इन्द्रियोंके विषयोंसे वैराग्य, पवित्रता, सहनशीलता, पाखण्डका त्याग, जन्ममरणादिमें दोषदृष्टि, समदृष्टि, दृढ़भक्ति, एकान्तता तथा शम-

६२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दमसहित जो ज्ञान है, हे राजन्! उसीको यथार्थ ज्ञान | अधिक होनेसे कर्मकी और तमोगुण अधिक होनेसे समझो। हे राजन्! इस ज्ञानके विषयको मैं कहता हूँ, | सुखसे इतर निद्रा और आलस्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३३ ॥ तुम श्रवण करो, जिसको जाननेसे संसारसागरसे छूटकर | इन तीनोंकी वृद्धिमें क्रमसे मुक्ति, संसार और मुक्त हो जाओगे ॥ २४-२६ ॥ | दुर्गंतिकी प्राप्ति मनुष्योंको होती है, इस कारण हे राजन्! जो अनादि, इन्द्रियरहित, सत्त्व-रज-तम आदि | सत्त्वगुणयुक्त होओ ॥ ३४ ॥ गुणोंका भोक्ता, किंतु गुणवर्जित, अव्यक्त, सत्-असत्से | हे नरेश्वर! इसलिये तुम सर्वत्र भलीभाँति विद्यमान परे तथा इन्द्रियोंके विषयोंका प्रकाशक है। जो विश्वको | मुझ परमात्माका निश्चल भक्तिपूर्वक सर्वभावसे भजन धारण करनेवाला, सर्वत्र व्यापक, एक होकर भी अनेक | करो। हे राजन्! अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण और विद्वान् रूपसे भासता है, वह बाहर-भीतरसे पूर्ण, असंग और | ब्राह्मणमें जो तेज है, उसे मेरा ही तेज जानो ॥ ३५-३६ ॥ अन्धकारसे परे है ॥ २७-२८ ॥ | मैं ही सम्पूर्ण संसारको उत्पन्नकर उसका संहार अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे वह जाना नहीं जाता, वह | करता हूँ और अपने तेजसे ओषधि और जगत्को मैं ही ज्योतियोंको भी प्रकाशित करनेवाला है, इस प्रकार | पुष्ट करता हूँ। इन्द्रियाधिष्ठातृ देवताओंके रूपमें इन्द्रियोंको ज्ञानसे जाननेयोग्य पुरातन पुरुषको ज्ञेय ब्रह्म जानो ॥ २९ ॥ | अधिष्ठित करके इन्द्रियविषयोंको और जठराग्निके रूपमें यही परब्रह्म ज्ञेय है, यही आत्मा, पर, अव्यय तथा | भुक्त-पीत अन्न-जलादिको मैं ही पुण्य-पापलेशशून्य प्रकृतिसे परे पुरुष कहलाता है। यह प्रकृतिसे उत्पन्न हुए | होकर भोगता हूँ। मैं ही विष्णु, रुद्र, ब्रह्मा, गौरी और गुणोंको भोगता है। प्रकृतिके तीन गुण ही इस पुरुषको देहमें | गणपति हूँ, इन्द्रादि देवता तथा लोकपाल मेरे ही अंशसे बाँधते हैं, जिस समय देहमें शान्ति और प्रकाशकी वृद्धि | उत्पन्न हुए हैं ॥ ३७-३९ ॥ हो, तब सत्त्वगुणकी अधिकता ज्ञात होती है ॥ ३०-३१ ॥ | जिस-जिस रूपसे प्राणी मेरी भक्तिपूर्वक उपासना लोभ, अशान्ति, स्पृहा और कर्मारम्भ—ये रजोगुणके | करते हैं, उनकी भक्तिके अनुसार मैं उन्हें वैसा ही रूप धर्म हैं। मोह, आलस्य, अज्ञान और प्रमाद—इन्हें ही | दिखाता हूँ। हे राजन्! इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञाता, ज्ञान तथा तमोगुण जानना चाहिये ॥ ३२ ॥ | ज्ञेयका विषय तुमसे मैंने वर्णन किया, जो तुमने पूछा था, सत्त्वगुण अधिक होनेसे सुख और ज्ञानकी, रजोगुण | वह सब मैंने बता दिया ॥ ४०-४१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'क्षेत्र-ज्ञातृ-ज्ञेय-विवेक' नामक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४६ ॥ एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय दैवी, आसुरी और राक्षसी प्रकृति श्रीगणेशजी बोले—दैवी, आसुरी, राक्षसी— | इत्यादि चिह्न दैवी प्रकृतिके समझने चाहिये। अब तीन प्रकारकी मनुष्योंकी प्रकृति होती है, उनके फल और | आसुरीके चिह्न सुनो ॥ ३ ॥ चिह्न संक्षेपसे अब तुम्हारे लिये वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ | हे राजन्! अतिवाद, अभिमान, दर्प, अज्ञान और दैवी प्रकृति मुक्तिको सिद्ध करती है, आगेकी दोनों | क्रोध—ये आसुरी प्रकृतिके चिह्न हैं ॥ ४ ॥ बन्धनमें डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृतिके चिह्न | [राक्षसी प्रकृतिके ये चिह्न हैं-] निष्ठुरता, मद, कहता हूँ, उन्हें तुम सुनो ॥ २ ॥ | मोह, अहंकार, गर्व, द्वेष, हिंसा, क्रूरता, क्रोध, उद्धतता, चुगली न करना, दया, अक्रोध, अचपलता, धैर्य, | विनयहीनता, दूसरोंके नाशके निमित्त अभिचारकर्म, क्रूर सरलता, तेज, अभय, अहिंसा, क्षमा, शौच, निरभिमानिता | कर्मोंमें प्रीति। श्रेष्ठ पुरुषोंके वाक्यमें अविश्वास, अपवित्रता, Kalyana Visheshank 2021_Section_21_2_Back

क्री०ख०-अ०१४८ ] * तप, दान, ज्ञान आदि एवं गणेशगीताकी महिमा * ६२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कर्मोंका न करना, वेद, भक्त, देवता, मुनि, श्रोत्रिय, | मुझमें भक्ति होना दुर्लभ है ॥ १५ ॥ ब्राह्मण तथा स्मृति और पुराणकी निन्दा करना, पाखण्ड- | मूर्ख लोग मोहजाल तथा अपने कर्मोंसे बन्धनमें वाक्योंमें विश्वास, दुष्टों तथा मलिन पुरुषोंकी संगति | पड़ते हैं, वे मैं ही हन्ता, मैं ही कर्ता, मैं ही भोक्ता हूँ— करना ॥ ५-८ ॥ | ऐसा कहा करते हैं। मैं ही ईश्वर, मैं शासक, मैं पाखण्डसहित कर्म करना, दूसरेकी वस्तुओंको | जाननेवाला, मैं सुखी हूँ—इस प्रकारकी मति मनुष्योंको पानेकी इच्छा, अनेक कामनाओंसे युक्त होना, सदा | नरकमें ले जाती है ॥ १६-१७ ॥ झूठ बोलना, दूसरेका उत्कर्ष न सहना, दूसरेके कृत्यको | इस कारण तुम इस (तामसी प्रकृति)-को छोड़कर नष्ट करना इत्यादि बहुत सारे दूसरे भी राक्षसी प्रकृतिके | दैवी प्रकृतिका आश्रय करो और दृढ़ चित्तसे मेरी निरन्तर गुण हैं ॥ ९-१० ॥ | भक्ति करो ॥ १८ ॥ पृथ्वी और स्वर्गलोकमें ये सब गुण रहते हैं। जो | हे राजन्! वह भक्ति भी सात्त्विकी, राजसी और लोग मेरी भक्तिसे रहित हैं, वे ही राक्षसी प्रकृतिको प्राप्त | तामसी—इन भेदोंसे तीन प्रकारकी है। जिस भक्तिसे होते हैं। हे राजन्! जो इस तामसी प्रकृतिका आश्रय लेते | देवताओंका भजन किया जाता है, वह कल्याणकारिणी हैं, वे रौरव नरकको प्राप्त होते हैं और वहाँ अकथनीय | सात्त्विकी भक्ति कही गयी है। जन्म-मृत्यु देनेवाली दुःखको भोगते हैं ॥ ११-१२ ॥ | भक्ति राजसी कही गयी है, जिसमें सर्वभावसे यक्ष और हे राजन्! वे तमोगुणी लोग दैववश नरकसे | राक्षसोंकी ही पूजा होती है ॥ १९-२० ॥ निकलकर भूलोकमें हीन जातियोंमें जन्मान्ध, पंगु, कुबड़े | जो लोग वेदविधानसे रहित, क्रूरता, अहंकार तथा और दीन होकर जन्म लेते हैं ॥ १३ ॥ | दम्भसहित हैं, जो प्रेतभूतादिकोंको भजते हैं और कामुक पापाचरणवाले तथा मुझमें भक्ति न करनेवाले | कर्म करते हैं तथा दुराग्रहपूर्वक अपने शरीर और उसमें पतित होते हैं, परंतु मेरे भक्त चाहे किसी भी योनिमें जन्म | स्थित मुझे भी क्लेश पहुँचाते हैं, उनकी यह तामसी लें, नष्ट नहीं होते, उनका उद्धार हो जाता है ॥ १४ ॥ | भक्ति नरक देनेवाली है ॥ २१-२२ ॥ हे राजन्! यज्ञसे अथवा दूसरे कर्मोंसे स्वर्गकी | काम, लोभ, क्रोध, दम्भ—ये नरकके चार महाद्वार प्राप्ति होती है, जो सकाम पुरुषोंको सुलभ है, परंतु | हैं, इस कारण इनको त्यागना चाहिये ॥ २३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'योगोपदेशवर्णन' नामक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४७ ॥ एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय तप, दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, सुख-दुःख, ब्रह्म एवं वर्णानुसार कर्मोंके भेद तथा गणेशगीताकी महिमा श्रीगणेशजी बोले—हे राजन्! कायिक, वाचिक | अन्तःकरणमें प्रसन्नता, शान्ति, मौन, जितेन्द्रियता, और मानसिक—इन तीन भेदोंसे तप भी तीन प्रकारका | सदा निर्मल भाव रखना—यह मानसिक तप है ॥ ४ ॥ है। ऋजुता, आर्जव, पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, गुरु- | निष्काम भाव और श्रद्धासे जो तप किया जाता है, पण्डित-ब्राह्मण एवं देवताका पूजन करना तथा नित्य | वह सात्त्विक है। ऐश्वर्य और सत्कार-पूजाके निमित्त स्वधर्मका पालन करना—यह कायिक तप है ॥ १-२ ॥ | तथा दम्भसहित जो तप किया जाता है, वह राजसी तप जो मर्मस्पर्शी न हों, ऐसे प्रिय वचन बोलना, | है। राजसी तप निश्चय ही जन्म-मृत्यु और अस्थिरताको उद्वेगरहित, हितकारी और सत्य भाषण करना, वेद- | देनेवाला है। जिसमें दूसरेको तथा अपनेको पीड़ा हो, वह शास्त्रोंका पढ़ना—यह वाचिक तप है ॥ ३ ॥ | तामस तप कहा गया है ॥ ५-६ ॥

६२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

[बायाँ स्तम्भ] विधियुक्त, उत्तम देश-कालमें सत्पात्रको श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है, वह सात्त्विक दान कहा गया है। उपकार या फलकी कामनासे मनुष्य जो दान करते हैं तथा ऐसा दान जो क्लेशपूर्वक अथवा भक्तिके कारण दिया जाय, वह राजसी दान कहलाता है॥७-८॥ जो देश-कालरहित, अपात्रमें अवज्ञापूर्वक दिया जाता है और जो दान अपमानपूर्वक दिया जाता है, वह तमोगुणी दान कहा गया है। हे राजन्! मन लगाकर सुनो, ज्ञान भी तीन प्रकारका है, कर्म और कर्ता भी तीन प्रकारके हैं, वह मैं प्रसंगसे कहता हूँ॥९-१०॥ जो अनेक प्रकारके प्राणियोंमें एक मुझको ही देखता है तथा नाशवान् भूतोंमें मुझ नित्यको जानता है, हे राजन्! वह सात्त्विक ज्ञान है। जो उन अनेक भूतोंसे मुझे पृथक् स्वरूपवाला और अव्यय जानते हैं, इस ज्ञानका नाम राजस है॥ ११-१२ ॥ हेतुरहित, असत्य तथा देह और मनके सुखके लिये असत् और अल्प अर्थयुक्त विषयोंमें लगना—इस ज्ञानका नाम तामस है। हे राजन्! सत्, रज, तम—इन भेदोंसे कर्म भी तीन प्रकारका है, जिसे मैं बताता हूँ; सुनो, कामना, द्वेष और दम्भसे रहित जो नित्य कर्म है और फलकी इच्छासे रहित जो कर्म किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है॥ १३-१४॥ जो बहुत क्लेशपूर्वक तथा फलकी इच्छासे किया गया है और जिसको मनुष्य दम्भपूर्वक करते हैं, वह राजस कर्म कहलाता है और जो अपनी शक्तिके बाहर तथा अर्थका क्षय करनेवाला कर्म अज्ञानपूर्वक किया जाता है, वह तामस कर्म कहा गया है॥ १५-१६॥ इसी प्रकार हे राजन्! तीन प्रकारके कर्ता होते हैं, जिन्हें मैं बताता हूँ। हे राजन्! धैर्य और उत्साहयुक्त, सिद्धि-असिद्धिमें समान दृष्टिवाला, विकार और अहंकारसे रहित सात्त्विक कर्ता कहलाता है॥ १७-१८॥ जो हर्ष-शोकसहित कर्म करता है, हिंसामें प्रवृत्ति और फलकी इच्छा रखता है, जिसमें अपवित्रता और लोभ है, वह राजसी कर्ता कहा जाता है। प्रमाद और अज्ञानयुक्त, दूसरोंका नाश करनेवाला, दुष्ट, आलसी और जो कुतर्क करनेवाला है, वह तामसी कर्ता कहा

[दायाँ स्तम्भ] जाता है। हे राजन्! इसी प्रकार सुख-दुःख भी तीन प्रकारके हैं, वह तुम क्रमसे सुनो, इनके भी सात्त्विक, राजस, तामस भेद हैं, उन्हें मैं कहता हूँ॥ १९–२१ ॥ जो पहले तो विषके समान प्रतीत हो, किंतु दुःखका अन्त करनेवाला हो और परमार्थोन्मुख बुद्धिसे जिसकी कामना की जाती हो, जो अन्तमें अमृतके समान हो तथा जो अपनी बुद्धिको आनन्द देनेवाला हो, वह सात्त्विक सुख कहा गया है। विषयोंका जो सुख प्रथम तो अमृतके समान विदित हो और अन्तमें विषके समान फल दे, उसे राजसी सुख कहते हैं॥ २२-२३॥ जो तन्द्रा तथा प्रमादसे उत्पन्न हुआ हो, आलस्यसे भरा हुआ हो तथा अपनेमें सदा मोह उत्पन्न करता हो, उसका नाम तामसी सुख है। ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो इन तीनों गुणोंसे मुक्त हो॥ २४-२५॥ हे राजन्! ब्रह्म भी ओम्, तत्, सत्—इस भेदसे तीन प्रकारका है और हे राजन्! इस त्रिलोकीमें सब कुछ तीन होकर ही व्याप्त हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र— ये स्वभावसे ही भिन्न कर्म करनेवाले हैं, इनके कर्म संक्षेपसे मैं तुमसे कहता हूँ॥ २६-२७॥ बाह्य और अन्तः इन्द्रियोंको वशमें करना, सरलता, क्षमा, अनेक प्रकारके तप, पवित्रता, दोनों प्रकार (अन्वय- व्यतिरेक)-से आत्माका ज्ञान, वेद, शास्त्र, पुराण और स्मृतियोंका ज्ञान होना तथा उनके अर्थोंका अनुष्ठान करना—ये ब्राह्मणके कर्म हैं॥ २८-२९॥ दृढ़ता, शूरता, चतुरता, युद्धसे पलायन न करना, शरणागतकी रक्षा, दान, धैर्य, स्वाभाविक तेज, प्रभुता, मनकी उदारता, अच्छी नीति, लोकपालन (तथा राज्यपालन)-के पाँच कर्मोंमें अधिकार—ये क्षत्रियोंके स्वाभाविक कर्म हैं। अनेक प्रकारकी वस्तुओंका क्रय- विक्रय, पृथ्वीकर्षण अर्थात् खेती आदि करना, गायोंकी रक्षा करना—ये तीन प्रकारके वैश्यके कर्म कहे गये हैं। हे राजन्! दान, ब्राह्मणोंकी सेवा तथा सदा शिवजीकी उपासना—यह शूद्रोंका कर्म कहा गया है॥ ३०-३३॥ हे राजन्! ये सब वर्ण अपने-अपने कर्म यथावत् करते हुए और सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए मेरी कृपासे निश्चल परम स्थानको प्राप्त करते हैं॥ ३४॥

उपांगसहित विस्तारपूर्वक अनादिसिद्ध योगका वर्णन

क्री०ख०-अ०१४९] * ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान * ६२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रिय राजन् ! इस प्रकार तुम्हारे स्नेहसे मैंने अंग- उपांगसहित विस्तारपूर्वक अनादिसिद्ध योगका वर्णन किया, यह योग परमोत्तम है ॥ ३५ ॥ हे राजन् ! मेरे द्वारा कहे गये इस योगको धारण करो और किसीसे इसे मत कहो, तुम इसे गुप्त रखोगे तो परम उत्तम सिद्धिको प्राप्त करोगे ॥ ३६ ॥ व्यासजी बोले—इस प्रकार प्रसन्नचित्त महात्मा गणेशजीके वचन सुनकर राजा वरेण्यने उनके वचनके अनुसार आचरण किया। राज्य और कुटुम्बको त्यागकर वेगसे वे वनको चले गये और उपदेश किये गये योगमें स्थित होकर मुक्त हो गये ॥ ३७-३८ ॥ इस महागुप्त योगका जो कोई श्रद्धासे श्रवण करता है, वह भी मुक्तिको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि वह भी योगीके समान ही होता है। जो बुद्धिमान् इस योगके तात्पर्यको भलीभाँति अधिगत करके दूसरोंको सुनाता है, वह भी योगीके समान मुक्त हो जाता है ॥ ३९-४० ॥ जो इस गीताका भलीप्रकार अभ्यासकर तथा गुरुमुखसे इसका अर्थ जानकर गणेशजीकी पूजाकर प्रतिदिन एक काल, दो काल अथवा तीनों कालोंमें पाठ करता है, वह ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है और उसके दर्शनसे भी मनुष्य मुक्त हो जाता है ॥ ४१-४२ ॥ न यज्ञ, न व्रत, न दान, न अग्निहोत्र, न महाधन (प्रचुर धनव्ययसे साध्य शास्त्रीय अनुष्ठान), न सांगोपांग वेदोंके उत्तम ज्ञान और अभ्यास, न पुराणोंके श्रवण, न भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्रोंसे भी ऐसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है, जैसे इस गीतासे मनुष्योंको प्राप्त होती है ॥ ४३-४४ ॥ ब्रह्महत्यारा, मद्यपी, चोर, गुरुदारगामी तथा इन चारों महापाप करनेवालोंका साथ करनेवाले और स्त्रीहिंसा, गोवध आदि करनेवाले पापी भी इस गीताको पढ़नेसे पापमुक्त हो जाते हैं। जो नियमसे इसे नित्य पढ़ता है, वह निःसन्देह श्रीगणेशस्वरूप हो जाता है और जो चतुर्थीके दिन इसे भक्तिसे पढ़ता है, वह भी मुक्त हो जाता है ॥ ४५-४७ ॥ उन-उन पुण्यक्षेत्रोंमें जाकर स्नान करके गणेशजीका पूजनकर एक बार भी भक्तिपूर्वक इस गीताका पाठ करनेवाला ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥ ४८ ॥ भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें चतुर्थीके दिन भक्तिपूर्वक वाहन और आयुधसहित श्रीगणेशकी मृत्तिकाकी चतुर्भुज मूर्ति बनाकर विधिपूर्वक पूजन करके जो यत्नपूर्वक सात बार इस गणेशगीताका पाठ करता है, उसपर सन्तुष्ट होकर गणेशजी पुत्र, पौत्र, धन-धान्य, पशु, रत्नादि सम्पत्ति और उत्तम भोग उसे प्रदान करते हैं ॥ ४९-५१ ॥ विद्यार्थीको विद्या, सुखार्थीको सुख, कामार्थीको नानाविध कामोंकी प्राप्ति होती है और अन्तमें वे मुक्तिको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार मैंने आपको समस्त [गीतोपदेश] बताया है, अब और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'त्रिविध वस्तुविवेकनिरूपण' नामक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४८ ॥

एक सौ उनचासवाँ अध्याय ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान, कलियुगवर्णन एवं कलियुगके अन्तमें गणपतिता अवतीर्ण होकर धर्म-संस्थापन

ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे [देवताओं, ऋषियों तथा राजाओंसे] पूजित होकर विभु गजानन उस राजपूजित सदन (राजसदन नामक स्थान)-में भक्तोंकी कामनाओंको पूर्ण करते हुए निवास करने लगे ॥ १ ॥ मुनिने कहा-हे देव! आपने विनायकके महिमावर्णनके प्रसंगमें विभिन्न प्रकारके कथानकोंका निरूपण किया है। उन्होंने वरेण्यके भवनमें अवतीर्ण होकर विघ्नासुर अर्थात् सिन्दूरासुरका वध किया। हे चतुरानन ! गजाननकी गजमुख-प्राप्तिका आपने वर्णन किया और इसी प्रसंगमें पार्वतीजीके गर्भसे गजाननरूपसे गणपतिके आविर्भावका भी आपने निरूपण किया है। इसके कारण मैं सन्देहमें पड़ गया हूँ। आपके अतिरिक्त

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६२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सन्देहोंको नष्ट करनेवाला तीनों लोकोंमें दूसरा कोई | कलियुगसे सम्बन्धित कथाका वर्णन करूँगा ॥ १४ १/२ ॥ नहीं है ॥ २-४ ॥ | हे मुने! कलियुगके आ जानेपर लोग सदाचारसे ब्रह्माजी बोले—हे व्यास! विभु गजानन नानाविध | च्युत तथा असत्यभाषी हो जायेंगे। ब्राह्मण स्नान-सन्ध्या शक्तियोंसे सम्पन्न हैं, अतः उनके विषयमें सन्देह नहीं | तथा वेदाभ्यासका परित्याग कर देंगे। उनकी यजन, करना चाहिये। वे स्वेच्छावश कल्पोंके भेदसे भिन्न- | याजन तथा दानकृत्योंमें प्रवृत्ति नहीं होगी और वे दुष्ट भिन्न रूपोंमें अवतीर्ण हुआ करते हैं ॥ ५ ॥ | पुरुषोंसे अत्यन्त गर्हित दान ग्रहण करेंगे, सभी लोग कभी वे भगवान् शंकरके मुखसे, कभी उनके | दूसरेके कलंककी चर्चा करेंगे, निन्दामें तत्पर रहेंगे और क्रोधावेशसे, कभी पार्वतीजीके तेजसे, तो कभी उनके | परस्त्रियोंके साथ अनुचित व्यवहार करेंगे ॥ १५-१७ ॥ उदरसे और कभी उनके शरीरके मैल (उबटन)-से | वे लोग सब प्रकारसे कर्तव्योंका परित्याग कर देंगे अवतीर्ण हुए हैं। उनका स्वरूप कभी तो दो मुखोंवाला | और प्रत्येक स्थितिमें अवश्य ही विश्वासघात करेंगे। प्रकट हुआ और कभी पाँच एवं छः मुखोंसे युक्त | अवैध कार्योंको सफल बनानेके लिये वे मिथ्या शपथ दृष्टिगोचर होता रहा है। कभी वे दो भुजाओंसे समन्वित | ग्रहण करेंगे। हे मुनीश्वर! उस समय धरातलपर मेघ होते हैं, तो कभी [चार भुजाओं, छः भुजाओं और | कहीं भी [भलीभाँति] वर्षा नहीं करेंगे। महानदियोंके कभी] दश भुजाओं, द्वादश भुजाओं और सहस्र | तटवर्ती भूभाग भी कृषिके उपयोगमें लिये जायँगे। जो भुजाओंसे भी शोभित होते हैं। सभी आगमग्रन्थ उनके | बलवान् होगा, वह निर्बलके धनका बलात् अपहरण कर नानाविध ध्येय स्वरूपोंका निर्देश करते हैं। हे मुने! | लेगा और उससे दूसरे दो लोग मिलकर हरण करेंगे तथा [इसलिये] प्रभु गजाननके सम्बन्धमें तुम्हें विस्मय या | ऐसे ही उन दो बलवानोंसे तीन (अथवा अधिक) लोग संशय नहीं करना चाहिये ॥ ६-८ १/२ ॥ | बलपूर्वक [धन आदि] छीन लेंगे ॥ १८-२० १/२ ॥ लिंगपुराणमें शिवसे ब्रह्मा और विष्णुकी उत्पत्ति | कलियुगमें शूद्र वेदाभ्यास करेंगे और ब्राह्मण बतायी गयी है। स्कन्दपुराणमें ब्रह्माके नेत्रोंसे शिवका | शूद्रोचित कर्मोंमें प्रवृत्त हो जायँगे। क्षत्रिय वैश्योंके और प्रादुर्भाव वर्णित है। विष्णु शिवका ध्यान करते हैं और | वैश्य शूद्रोंके लिये विहित [जीविका-सम्बन्धी] कर्मोंका शिव भी विष्णुके ध्यानमें निरत रहते हैं। वे प्रभु शिव | सम्पादन करेंगे। ब्राह्मण चाण्डालतकसे दान ग्रहण पंचाक्षर मन्त्रके साथ तारक मन्त्रका उपदेश करते हैं। | करेंगे ॥ २१-२२ ॥ भगवान् शंकरने सौ करोड़ श्लोकोंमें रामचरित [का | [कलियुगके] विचारशून्य लोग धनहीन [और प्रणयन किया और उस]-को तीन भागोंमें विभक्तकर | शोकवश] हाहाकार करनेवाले होंगे। वे अपनी [एक-एक भाग स्वर्ग तथा पातालमें रखा और तीसरे | आवश्यकताओंको सामने रखकर दूसरोंसे धनकी याचना भागके सहित] तारकमन्त्र (रामनाम)-को पृथिवीलोकमें | करेंगे और [लौटानेके समय] कहेंगे कि हमने तो तुमसे स्थापित किया। यह सृष्टि कभी शिवसे, कभी विष्णुसे, | तनिक-सा भी धन नहीं लिया है। लोग रिश्वत लेकर कहीं देवीसे, कहीं सूर्यसे, कहीं गजाननसे तो कहीं | झूठी गवाही देंगे और सज्जनोंकी निन्दा तथा दुर्जनोंसे [निर्गुण निराकार] ब्रह्म [की सिसृक्षा]-से उत्पन्न | मित्रता करेंगे। द्विज व्यर्थमें ही [पशुओंको मारकर] बतायी गयी है। ये सभी परस्पर विरोधी बातें शास्त्रसम्मत | मांसका भक्षण करेंगे ॥ २३-२५ ॥ हैं। इनमें जो सन्देह करता है, वह निश्चय ही नरकगामी | [कलियुगमें] सत्पुरुषोंका उन्मूलन और दुराचारियोंका होता है ॥ ९-१३ १/२ ॥ | अभ्युदय देखा जायगा। लोग देवताओंकी अर्चनाका ब्रह्माजी बोले—हे मुने! इस प्रकार द्वापरयुगकी | त्याग करके ऐन्द्रिक अर्थात् इन्द्रजालसम्बन्धिनी (जादू- समस्त [लीला] कथा मैंने आपको बतलायी, अब मैं | टोना) विद्याओंका आश्रय लेंगे। वे भूत-प्रेत-पिशाचादिकी

क्री०ख०-अ०१४९] * ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान * ६२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] उपासनामें दत्तचित्त रहेंगे। ब्राह्मण भाँति-भाँतिके वेष धारण करके अपना उदर-भरण करने लगेंगे। कुछ क्षत्रिय अपने कुलोचित आचारसे भ्रष्ट होकर भिक्षावृत्तिसे भी जीवननिर्वाह करेंगे। लोग व्रत-नियमादिका अल्पमात्र भी अनुपालन नहीं करेंगे॥ २६-२८॥ पृथ्वीपर रहनेवाले लोग वर्णसांकर्यको जन्म देनेवाले कार्योंको करने लगेंगे और पतिव्रताएँ अपने पातिव्रत्यधर्मसे च्युत हो जायेंगी। सभी [वर्णाश्रमी] लोग म्लेच्छोंके समान पराये धनका अपहरण करनेवाले, दयाशून्य, कुमार्गगामी तथा सर्वदा सत्यसे रहित व्यवहार करनेवाले हो जायेंगे॥ २९-३०॥ भूमिमें सस्य अर्थात् फसल नहीं उगेगी और वृक्ष नीरस हो जायँगे। कन्याएँ पाँच-छः वर्षकी आयुमें ही प्रसव करने लगेंगी। कलियुगमें मनुष्योंकी परमायु सोलह वर्ष होगी अर्थात् उनकी अधिकतम सोलह वर्ष ही जीनेकी अवधि होगी। तीर्थ और देवालय अपने दिव्य स्वरूपको अन्तर्हित कर लेंगे॥ ३१-३२॥ जब इस प्रकार पाप बढ़ने लगेगा और धर्म क्षीण होता जायगा, तो देवगण [यज्ञ-यागादिके अभावमें] भूखों मरने लगेंगे। तब स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कारादि [के माध्यमसे जो हविष्य देवता प्राप्त करते थे, उस]- के अभावके कारण भयाकुल हुए देवगण अनामय गजाननदेवकी शरणमें जायँगे॥ ३३-३४॥ वे सभी विघ्नोंका नाश करनेवाले उन देवेश्वर गजाननका भाँति-भाँतिसे स्तवन और अभिवन्दन करेंगे तथा प्रार्थना करेंगे। देवताओंकी ऐसी प्रार्थनाका पूर्णतः विचार करनेके उपरान्त भगवान् गजानन अवतार ग्रहण करेंगे। उस समय उनके सूपके जैसे कान होंगे और वे धूम्रवर्ण नामसे विख्यात होंगे॥ ३५-३६॥ क्रोधसे मानो जलते हुए भगवान् गजानन तब हाथमें खड्ग लेकर नीलवर्ण अश्वपर आरूढ़ होंगे और अपनी इच्छाके अनुरूप अनेक रूपोंवाली सेनाका निर्माण करेंगे। वे बिना प्रयत्न किये [अपने संकल्पबलसे] बड़े- बड़े अस्त्र-शस्त्रोंको प्रकट करेंगे और सेनाके सहयोग तथा अपने तेजसे उन महाम्लेच्छोंका वध करेंगे। उस

[दायाँ स्तम्भ] समय गजाननदेव उन सारे लोगोंका वध करेंगे, जो म्लेच्छोंके जैसा आचरण कर रहे होंगे॥ ३७-३८ १/२॥ वे देवेश्वर [वनों और] कन्दराओंमें छिपे तथा वनके कन्द-मूल, फल खाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले ब्राह्मणोंको बुलवायेंगे और उन्हें समादृत करके भूमिदान करेंगे तथा समस्त जनताको सत्कर्मनिरत एवं सज्जन बनायेंगे अर्थात् लोगोंको अनुशासितकर नैतिक जीवन जीनेकी शिक्षा देंगे॥ ३९-४०॥ तब (उनके ऐसा करनेपर) सम्पूर्ण विश्व धर्ममर्यादामें आबद्ध हो जायगा और सत्ययुगका प्रारम्भ होगा। गजाननदेव इस प्रकार धूम्रवर्णावतारके द्वारा धर्ममर्यादाकी स्थापना करनेके अनन्तर अन्तर्धान हो जायँगे॥ ४१॥ हे अनघ व्यासजी! इस प्रकार मैंने महात्मा विघ्नेश्वरके चारों युगोंमें होनेवाले नाम तथा रूप तुमको बतलाये और उनके चित्र-विचित्र लीलाकृत्योंका भी सम्पूर्ण रूपसे वर्णन किया, जिनका केवल श्रवण करनेसे भी सभी प्राणी मोक्ष प्राप्त करते हैं॥ ४२-४३॥ गजाननदेवके स्वरूप अन्तहीन हैं, अतः [उनका समग्रतया] वर्णन कर पाना मेरी शक्तिके बाहर है। जिनकी महिमाका वर्णन करनेमें चारों वेद कुण्ठित हो जाते हैं, वहाँ मेरी अथवा मेरे जैसे किसी अन्य व्यक्तिकी तो बात ही क्या है? [हे व्यासजी!] अब आप अनुष्ठानके लिये प्रस्थान कीजिये और मैं भी अपने [सृष्टि-] प्रपंचको सम्हालता हूँ॥ ४४-४५॥ भृगुजी बोले—हे सोमकान्त! ब्रह्माजीके मुखसे सभी पापोंका नाश करनेवाली कथाका श्रवण करके व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए और उनसे कहने लगे॥ ४६॥ मुनि बोले—इस परम अद्भुत आख्यानको सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ। आपका मुझपर बड़ा अनुग्रह हुआ है, मैं धन्य हो गया हूँ; क्योंकि गणपतिचरित्र- मूलक इस कथानकके माध्यमसे आपने मेरे सभी सन्देह दूर कर दिये। इसे बारम्बार सुनकर भी मुझे वैसे ही तृप्ति नहीं मिल रही है, जैसे अमृत कितना ही पिया जाय, तृप्ति नहीं होती॥ ४७-४८॥ इस आख्यानके श्रवणमात्रसे जन्म-जन्मान्तरमें अर्जित

६२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो | वनकी ओर चल पड़े। जहाँपर कन्द, फलादि सुलभ थे, जाती हैं। इस पुराणको सुननेका अवसर मनुष्योंको | निर्मल जल था। जहाँ वायुकी प्रबलता नहीं थी और न पूर्वकृत पुण्योंके कारण ही मिलता है। सर्वसिद्धिप्रद यह | अग्नि अथवा घामका ही भय था। ऐसे [उत्तम तपः] पुराण दुर्जनको सुनानेयोग्य नहीं है॥ ४९-५०॥ | स्थानपर आसनस्थ होकर एकाग्र चित्तसे व्यासजी भृगुजी बोले—इस प्रकार कहकर व्यासजीने | [गणपतिके] एकाक्षर मन्त्र (गं)-का जप करने लगे। स्वयम्भू ब्रह्माजीको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा | जब तपस्या करते-करते व्यासमुनिके बारह वर्ष बीत गये, करके तपस्याहेतु आज्ञा प्राप्त की, तत्पश्चात् वे उत्तम | तब भगवान् गजानन उनके समक्ष प्रकट हुए॥ ५१-५३॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'मुनिविसर्जन' नामक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४९॥


एक सौ पचासवाँ अध्याय

व्यासमुनिको गणपतिदेवका साक्षात्कार और उनसे वरकी प्राप्ति

सोमकान्तने कहा— हे भृगुजी! उन महात्मा व्यासजीके समक्ष गजाननदेव किस रूपमें प्रादुर्भूत हुए, वह सब बतलाइये, क्योंकि उस (के श्रवण)-से पापनाश होता है॥ १॥

भृगुजी बोले— हे भूमिप! जिस प्रकार गजाननदेव व्यासजीके समक्ष प्रादुर्भूत हुए थे, वह सब वृत्तान्त मैं बता रहा हूँ, उसका तुम आदरपूर्वक श्रवण करो। [जिस समय वे प्रकट हुए, उस समय] गजाननदेवने रक्तवर्णकी पुष्पमाला, रक्तवस्त्र तथा रक्तगन्धानुलेपन धारण कर रखा था। सिन्दूरके लेपनके कारण उनका मस्तक अरुणाभ था। कमलके समान नेत्रोंवाले गणपति अनेक सूर्योंके समान प्रतिभासित हो रहे थे। वे [कानोंमें] दिव्य कुण्डल, [बाहुयुगलमें] बाजूबन्द, [मस्तकपर] मुकुट, [हाथोंमें कंकण] तथा [यज्ञोपवीतके रूपमें] शेषनागको धारणकर शोभित हो रहे थे॥ २-४॥

मुनिने जब गणपतिके ऐसे रूपको देखा तो आँखें मूँद लीं, वे भयभीत होकर काँप उठे और मन्त्रका चिन्तन करते हुए मूच्छित हो गये। [जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई] तब गजाननने कहा—'हे मुनिसत्तम! भयभीत मत होइये। हे मुने! जिसका आप अहर्निश चिन्तन करते हैं और जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अगम्य है, वह मैं तुमको वर प्रदान करनेके लिये तुम्हारे समीप आया हूँ'॥ ५-६ १/२॥

भृगुजी बोले— इस प्रकारकी मधुरवाणी सुनकर मुनिश्रेष्ठ व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए। गजाननदेवके चरणोंमें अपना मस्तक रखकर वे बारम्बार कहने लगे कि मैं धन्य हूँ, मेरे माता-पिता धन्य हैं, मेरी तपस्या धन्य है, यह पृथिवी धन्य है और [तपोवनके ये] वृक्ष धन्य हैं; क्योंकि सर्वरूप, गुणातीत, समस्त प्रपंचके आश्रय, चिदानन्दघन, अनन्त और सभी कारणोंके परमकारण [आप गजानन]-का मैंने साक्षात्कार किया है। वरप्रद गजाननका इस प्रकार स्तवन करके वे उनसे प्रार्थना करने लगे॥ ७-९॥

मुनि बोले— हे देवेश! मेरी समस्त भ्रमबुद्धिको दूर करके आप मुझे अपने प्रति स्थिर भक्तिभाव प्रदान कीजिये। मैं जिस प्रकार अठारह महापुराणोंके प्रणयनमें समर्थ हो सकूँ और आपका भी गुणगान करनेमें सक्षम हो सकूँ, वैसा [कृपापूर्ण] विधान कीजिये। हे अनघ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे हृदयमें निवास कीजिये॥ १०-११ १/२॥

गजानन बोले— वत्स! तुमने जो प्रार्थना की है, वह सब आज ही पूर्ण हो जायगी। व्यास नामवाले मुनिवर! आप सबके मान्य, सभी पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले, अपरोक्षज्ञान (अद्वैतबोध)-से सम्पन्न तथा गुरुओंके भी गुरु होंगे। आप प्रसिद्धि, सद्गुण, कीर्ति तथा श्रीके विषयमें नारायणके तुल्य होंगे। हे मुनीश्वर!

ब्रह्माजीके मुखसे मेरा माहात्म्य सुन लिया है, जिसके

क्री०ख०-अ०१५१ ] * गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति * ६२९ आप अठारह पुराणों तथा उतने ही उपपुराणोंके प्रणेता बनेंगे। आपने पूर्वकालमें दम्भवश मेरा स्मरण-पूजन नहीं किया था, यही कारण है कि आपकी वाणी आश्चर्यजनक रीतिसे स्तम्भित हो गयी। हे अनघ! अब आपने ब्रह्माजीके मुखसे मेरा माहात्म्य सुन लिया है, जिसके कारण इस समय आपका समस्त [दम्भजनित] पाप विलीन हो चुका है। अब मैं तुम्हारे अन्तःकरणमें [निर्मल बोधके रूपमें] प्रविष्ट हो रहा हूँ॥ १२-१६१/२ ॥ भृगुजी बोले-ऐसा कहकर वे विभु व्यासमुनिके अन्तःकरणमें प्रविष्ट हो गये। [गणपतिके प्रवेश करते ही] मुनिवर व्यासजीने करोड़ों सूर्योंके जैसा अतुलनीय तेज प्राप्त कर लिया। वह [गणपतिका] तेज सभी दिशाओंको उद्भासित करने लगा। तदुपरान्त व्यासजीने गजाननकी एक विशाल मूर्ति बनवायी और उसे देवप्रासाद (देवमन्दिर)-में स्थापित कर दिया तथा उसका विविध उपचारोंसे पृथक्-पृथक् (उपचारोंके क्रमभेदसे) पूजन किया॥ १७-१९॥ यह सिद्धिक्षेत्र सभी लोगोंके नेत्रोंको पवित्र करनेवाला, शुभावह तथा मन्त्रानुष्ठानमें तत्पर जनोंको अनेकविध सिद्धियाँ देनेवाला होगा- ऐसा कहकर तथा उन गणपतिदेवसे अनुज्ञा प्राप्तकर नारायणस्वरूप व्यासदेवने [वहाँसे प्रस्थान किया और अपने आश्रममें आकर] ब्रह्माजीके मुखसे सुने गये उस गणेशपुराणका महर्षि वैशम्पायनको श्रवण कराया। इसके अनन्तर वह पुराण भूतलपर विख्यात हुआ॥ २०-२११/२ ॥ हे नृप! उसी पुराणको समग्ररूपमें आज मैंने तुम्हें सुनाया है। हे नृपसत्तम! इसके सदृश पवित्र करनेवाला कोई अन्य साधन तीनों लोकोंमें नहीं है। यह सभी लोगोंको परमानन्दकी प्राप्ति करानेवाला है॥ २२-२३ ॥ हे सोमकान्त! तुम्हें इस पुराणका प्रवचन कभी दुष्टोंसे नहीं करना चाहिये और विनयशील भक्तोंको प्रयत्नपूर्वक अवश्य ही सुनाना चाहिये। मैं तो इसका निरन्तर स्मरण और पारायण किया करता हूँ। हे राजसत्तम! तुमपर करुणा होनेके कारण मैंने इसे सुनाया है। तुमको गजाननदेवका निरन्तर ध्यान, स्मरण तथा [उनके मन्त्रका] जप करते रहना चाहिये॥ २४-२५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'व्यासानुग्रह-सिद्धिक्षेत्रवर्णन' नामक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५०॥ एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति और गणपतिके द्वारा प्रेषित विमानपर आरूढ़ होकर परमधामगमन सूतजी बोले-राजा सोमकान्त मुनीश्वर भृगुसे इस प्रकार नित्यप्रति कथाश्रवण करते और कथाश्रवणके पुण्यकी भावना करके सूखे आम्रके मूलमें जल डाल देते। जब ऐसा करते हुए उनको एक वर्ष व्यतीत हो गया, तब वह आम्रवृक्ष पुराणश्रवणजनित पुण्यके प्रभावसे [नूतन] पल्लव, मंजरी और फलोंके कारण अतीव कान्तिमय तथा शोभासम्पन्न हो गया॥ १-२॥ वे सोमकान्त कुष्ठ व्याधिसे मुक्त और दिव्य कान्तिसम्पन्न हो गये। उनका शरीर व्रणरहित हो गया, शरीरसे निकलनेवाली दुर्गन्ध समाप्त हो गयी और उत्तम गन्ध आने लगी। राजा सोमकान्तको दसों दिशाओंमें फैलती हुई उत्तम गन्धसे युक्त, दिव्यदेह, कोटि-कोटि चन्द्रमाओंके सदृश आह्लादक, सूर्यतुल्य तेजस्वी और विषादशून्य देखकर लोग विस्मयमें पड़ गये कि अरे! यह तो वैसा अर्थात् गलित कुष्ठके कारण विकृत शरीरवाला था, फिर यह गणेशपुराणकी दोषहारिणी महिमाके प्रभावसे कैसे ऐसा अर्थात् नीरोग और सुदर्शन हो गया है?॥ ३-५॥ भृगुजी बोले-हे नृपशार्दूल! यह उपलब्धि तो तुम्हें पुराणश्रवणके कारण ही हुई है। अब तुम जाओ, जब वर्षभरकी लम्बी अवधिसे उत्कण्ठित अपने पुत्र, मन्त्रिगण और प्रजाजनोंको देखोगे तो

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६३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ कॉलम]

बड़ी प्रसन्नता होगी ॥ ६१/२ ॥ सूतजी बोले—महर्षि भृगुकी ऐसी बातें सुनकर राजा सोमकान्त उनके चरणोंमें गिर पड़े और मानो आनन्दसागरमें डूबे हुए-से वे कहने लगे ॥ ७१/२ ॥ राजा बोले—हे मुने! मैंने आज आपके तपकी अद्भुत महिमाका दर्शन किया और पुराणश्रवणके महत्त्वका भी अनुभव किया, जिसके कारण कुष्ठसे गलती देहवाला मैं पतित व्यक्ति भी दिव्य शरीरवाला हो गया। हे मुनिसत्तम! इस [दिव्य] देहका निर्माण करनेवाले [सच्चे] माता-पिता तो आप ही हैं। [आपकी कथाका प्रभाव कुछ ऐसा है कि] रसहीन आम्रवृक्ष भी फल- पुष्पादिसे युक्त हो गया। इसलिये मैं आपको छोड़कर जाना ही नहीं चाहता, अब मुझे पुत्र (आदि बन्धु- बान्धवों) तथा प्रजाजनोंसे क्या प्रयोजन है? राजाके इस कथनको सुनकर महर्षि भृगु पुनः कहने लगे ॥ ८-११ ॥ भृगुजी बोले—हे जनेश्वर! जन्मान्तरीय पुण्योंके प्रभावसे तुमने मेरे द्वारा वर्णित इस श्लाघनीय पुराणका श्रवण किया, जिसके कारण तुम्हारा पाप नष्ट हो गया। [वास्तवमें] इस गणेशपुराणकी महिमाका वर्णन कर ही कौन सकता है? अब तुम अपने नगरको प्रस्थान करो और मेरा स्मरण करते रहना ॥ १२-१३ ॥ जब वे लोग इस प्रकार संवाद कर रहे थे, तभी उन्होंने एक विशाल विमान देखा, जो करोड़ों सूर्योंके समान तेजोमय था ॥ १४ ॥ भृगुजी बोले—हे नृप! तुम्हारे लिये ही यह अद्भुत विमान आया है। अब तुम इसपर आरूढ़ हो जाओ और गणपतिका सान्निध्य पानेके लिये प्रस्थान करो। हे राजन्! जिस विमानको मुनीश्वर साधनानुष्ठानादिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर पाते, उसे तुमने पुराणश्रवणके कारण हुए गणपतिके अनुग्रहसे पा लिया है ॥ १५-१६ ॥ जब वे लोग इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, तभी विमान क्षणभरमें भूतलपर आ पहुँचा। उसमें विनायकके गण विद्यमान थे। चार भुजाओंसे युक्त वे गण मुकुट, बाजूबन्द, हार आदि आभूषणोंसे अलंकृत थे। उन्होंने दिव्य चन्दनानुलेपन तथा दिव्याम्बर धारण किया था।

[दायाँ कॉलम]

उनके हाथोंमें कमल तथा परशु शोभायमान थे। [उस विमानमें गणोंके साथ] नृत्य करती हुई किन्नरकन्याएँ थीं और मृदंग, ताल (एक विशिष्ट वाद्य) तथा करताल बजाते हुए किन्नर थे, जो गायन कर रहे थे। यह देखकर राजा सोमकान्त पुनः कहने लगे ॥ १७-१९ ॥ राजा बोले—हे मुनीश्वर! हे ब्रह्मन्! मैंने यद्यपि विमानोंकी चर्चा तो अनेक बार सुनी थी, किन्तु उसे प्रत्यक्ष देख पानेका सौभाग्य तो आज आपके तपोबलके कारण ही मुझे मिला है। आपकी महिमाका वर्णन बारम्बार बहुत-से मुखोंसे होता रहा है, जिसे मैं अपने कानोंसे सुनता आया हूँ, किंतु आपसे पुराणश्रवण करके मैंने उसका आज स्वयं अनुभव भी कर लिया है ॥ २०-२१ ॥ जब राजा इस प्रकार कह रहे थे, तभी वे दूत विमानसे उतरे और प्रणाम करके राजा सोमकान्तसे कहने लगे कि हे शुद्धात्मन्! तुमने पुराणश्रवणादिसे जो पुण्य अर्जित किया है, उसके कारण परात्पर गजाननदेवने तुम्हारा स्मरण किया है। उन्हींकी आज्ञासे हम दूत लोग पवित्र कीर्तिवाले तुमको ले जानेके लिये विमान लेकर आये हैं। अब तुम उस उत्तमोत्तम गणपतिलोकके लिये प्रस्थान करो। उन गजाननका दर्शन करके तुम जन्म- मरणसे मुक्त हो जाओगे और वहाँ गणपतिदेवके समीप जाकर उनके अनुग्रहसे तुम आत्यन्तिक सुख प्राप्त करोगे ॥ २२-२५ ॥ दूतोंकी वे बातें सुनकर राजाको देहका भान न रहा और सारा शरीर रोमांचित हो गया। वे गद्गद वाणीमें बोले—'हे निष्पाप दूतो! चराचर विश्वकी सृष्टि करनेवाले, निर्गुण, गुणोंको [सृष्टिहेतु] क्षुब्ध करनेवाले, विश्वके प्रधान कारण, दीनरक्षक, परात्पर उन गजाननदेवने कृपापूर्वक मेरा स्मरण किया है। ब्रह्मा आदि देवगण तथा सनक आदि परमर्षिगण ध्यानावस्थित होकर भी जिनका स्वरूपसाक्षात्कार नहीं कर पाते और जो अनन्त गुणोंसे परिपूर्ण हैं, उन्होंने मेरे लिये यह उत्तम विमान भेजा है ॥ २६-२८१/२ ॥ जो परम मायावी, नानाविध अवतार धारण करनेवाले तथा अनेकानेक रूपोंवाले हैं, उन गजाननदेवने मेरा