श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 631, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१५१ ] * गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति * ६२९ आप अठारह पुराणों तथा उतने ही उपपुराणोंके प्रणेता बनेंगे। आपने पूर्वकालमें दम्भवश मेरा स्मरण-पूजन नहीं किया था, यही कारण है कि आपकी वाणी आश्चर्यजनक रीतिसे स्तम्भित हो गयी। हे अनघ! अब आपने ब्रह्माजीके मुखसे मेरा माहात्म्य सुन लिया है, जिसके कारण इस समय आपका समस्त [दम्भजनित] पाप विलीन हो चुका है। अब मैं तुम्हारे अन्तःकरणमें [निर्मल बोधके रूपमें] प्रविष्ट हो रहा हूँ॥ १२-१६१/२ ॥ भृगुजी बोले-ऐसा कहकर वे विभु व्यासमुनिके अन्तःकरणमें प्रविष्ट हो गये। [गणपतिके प्रवेश करते ही] मुनिवर व्यासजीने करोड़ों सूर्योंके जैसा अतुलनीय तेज प्राप्त कर लिया। वह [गणपतिका] तेज सभी दिशाओंको उद्भासित करने लगा। तदुपरान्त व्यासजीने गजाननकी एक विशाल मूर्ति बनवायी और उसे देवप्रासाद (देवमन्दिर)-में स्थापित कर दिया तथा उसका विविध उपचारोंसे पृथक्-पृथक् (उपचारोंके क्रमभेदसे) पूजन किया॥ १७-१९॥ यह सिद्धिक्षेत्र सभी लोगोंके नेत्रोंको पवित्र करनेवाला, शुभावह तथा मन्त्रानुष्ठानमें तत्पर जनोंको अनेकविध सिद्धियाँ देनेवाला होगा- ऐसा कहकर तथा उन गणपतिदेवसे अनुज्ञा प्राप्तकर नारायणस्वरूप व्यासदेवने [वहाँसे प्रस्थान किया और अपने आश्रममें आकर] ब्रह्माजीके मुखसे सुने गये उस गणेशपुराणका महर्षि वैशम्पायनको श्रवण कराया। इसके अनन्तर वह पुराण भूतलपर विख्यात हुआ॥ २०-२११/२ ॥ हे नृप! उसी पुराणको समग्ररूपमें आज मैंने तुम्हें सुनाया है। हे नृपसत्तम! इसके सदृश पवित्र करनेवाला कोई अन्य साधन तीनों लोकोंमें नहीं है। यह सभी लोगोंको परमानन्दकी प्राप्ति करानेवाला है॥ २२-२३ ॥ हे सोमकान्त! तुम्हें इस पुराणका प्रवचन कभी दुष्टोंसे नहीं करना चाहिये और विनयशील भक्तोंको प्रयत्नपूर्वक अवश्य ही सुनाना चाहिये। मैं तो इसका निरन्तर स्मरण और पारायण किया करता हूँ। हे राजसत्तम! तुमपर करुणा होनेके कारण मैंने इसे सुनाया है। तुमको गजाननदेवका निरन्तर ध्यान, स्मरण तथा [उनके मन्त्रका] जप करते रहना चाहिये॥ २४-२५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'व्यासानुग्रह-सिद्धिक्षेत्रवर्णन' नामक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५०॥ एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय गणेशपुराणके श्रवणसे राजाकी रोगनिवृत्ति और गणपतिके द्वारा प्रेषित विमानपर आरूढ़ होकर परमधामगमन सूतजी बोले-राजा सोमकान्त मुनीश्वर भृगुसे इस प्रकार नित्यप्रति कथाश्रवण करते और कथाश्रवणके पुण्यकी भावना करके सूखे आम्रके मूलमें जल डाल देते। जब ऐसा करते हुए उनको एक वर्ष व्यतीत हो गया, तब वह आम्रवृक्ष पुराणश्रवणजनित पुण्यके प्रभावसे [नूतन] पल्लव, मंजरी और फलोंके कारण अतीव कान्तिमय तथा शोभासम्पन्न हो गया॥ १-२॥ वे सोमकान्त कुष्ठ व्याधिसे मुक्त और दिव्य कान्तिसम्पन्न हो गये। उनका शरीर व्रणरहित हो गया, शरीरसे निकलनेवाली दुर्गन्ध समाप्त हो गयी और उत्तम गन्ध आने लगी। राजा सोमकान्तको दसों दिशाओंमें फैलती हुई उत्तम गन्धसे युक्त, दिव्यदेह, कोटि-कोटि चन्द्रमाओंके सदृश आह्लादक, सूर्यतुल्य तेजस्वी और विषादशून्य देखकर लोग विस्मयमें पड़ गये कि अरे! यह तो वैसा अर्थात् गलित कुष्ठके कारण विकृत शरीरवाला था, फिर यह गणेशपुराणकी दोषहारिणी महिमाके प्रभावसे कैसे ऐसा अर्थात् नीरोग और सुदर्शन हो गया है?॥ ३-५॥ भृगुजी बोले-हे नृपशार्दूल! यह उपलब्धि तो तुम्हें पुराणश्रवणके कारण ही हुई है। अब तुम जाओ, जब वर्षभरकी लम्बी अवधिसे उत्कण्ठित अपने पुत्र, मन्त्रिगण और प्रजाजनोंको देखोगे तो