भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 632, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 632

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य (Text) दिया गया है:

६३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ कॉलम]

बड़ी प्रसन्नता होगी ॥ ६१/२ ॥ सूतजी बोले—महर्षि भृगुकी ऐसी बातें सुनकर राजा सोमकान्त उनके चरणोंमें गिर पड़े और मानो आनन्दसागरमें डूबे हुए-से वे कहने लगे ॥ ७१/२ ॥ राजा बोले—हे मुने! मैंने आज आपके तपकी अद्भुत महिमाका दर्शन किया और पुराणश्रवणके महत्त्वका भी अनुभव किया, जिसके कारण कुष्ठसे गलती देहवाला मैं पतित व्यक्ति भी दिव्य शरीरवाला हो गया। हे मुनिसत्तम! इस [दिव्य] देहका निर्माण करनेवाले [सच्चे] माता-पिता तो आप ही हैं। [आपकी कथाका प्रभाव कुछ ऐसा है कि] रसहीन आम्रवृक्ष भी फल- पुष्पादिसे युक्त हो गया। इसलिये मैं आपको छोड़कर जाना ही नहीं चाहता, अब मुझे पुत्र (आदि बन्धु- बान्धवों) तथा प्रजाजनोंसे क्या प्रयोजन है? राजाके इस कथनको सुनकर महर्षि भृगु पुनः कहने लगे ॥ ८-११ ॥ भृगुजी बोले—हे जनेश्वर! जन्मान्तरीय पुण्योंके प्रभावसे तुमने मेरे द्वारा वर्णित इस श्लाघनीय पुराणका श्रवण किया, जिसके कारण तुम्हारा पाप नष्ट हो गया। [वास्तवमें] इस गणेशपुराणकी महिमाका वर्णन कर ही कौन सकता है? अब तुम अपने नगरको प्रस्थान करो और मेरा स्मरण करते रहना ॥ १२-१३ ॥ जब वे लोग इस प्रकार संवाद कर रहे थे, तभी उन्होंने एक विशाल विमान देखा, जो करोड़ों सूर्योंके समान तेजोमय था ॥ १४ ॥ भृगुजी बोले—हे नृप! तुम्हारे लिये ही यह अद्भुत विमान आया है। अब तुम इसपर आरूढ़ हो जाओ और गणपतिका सान्निध्य पानेके लिये प्रस्थान करो। हे राजन्! जिस विमानको मुनीश्वर साधनानुष्ठानादिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर पाते, उसे तुमने पुराणश्रवणके कारण हुए गणपतिके अनुग्रहसे पा लिया है ॥ १५-१६ ॥ जब वे लोग इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, तभी विमान क्षणभरमें भूतलपर आ पहुँचा। उसमें विनायकके गण विद्यमान थे। चार भुजाओंसे युक्त वे गण मुकुट, बाजूबन्द, हार आदि आभूषणोंसे अलंकृत थे। उन्होंने दिव्य चन्दनानुलेपन तथा दिव्याम्बर धारण किया था।

[दायाँ कॉलम]

उनके हाथोंमें कमल तथा परशु शोभायमान थे। [उस विमानमें गणोंके साथ] नृत्य करती हुई किन्नरकन्याएँ थीं और मृदंग, ताल (एक विशिष्ट वाद्य) तथा करताल बजाते हुए किन्नर थे, जो गायन कर रहे थे। यह देखकर राजा सोमकान्त पुनः कहने लगे ॥ १७-१९ ॥ राजा बोले—हे मुनीश्वर! हे ब्रह्मन्! मैंने यद्यपि विमानोंकी चर्चा तो अनेक बार सुनी थी, किन्तु उसे प्रत्यक्ष देख पानेका सौभाग्य तो आज आपके तपोबलके कारण ही मुझे मिला है। आपकी महिमाका वर्णन बारम्बार बहुत-से मुखोंसे होता रहा है, जिसे मैं अपने कानोंसे सुनता आया हूँ, किंतु आपसे पुराणश्रवण करके मैंने उसका आज स्वयं अनुभव भी कर लिया है ॥ २०-२१ ॥ जब राजा इस प्रकार कह रहे थे, तभी वे दूत विमानसे उतरे और प्रणाम करके राजा सोमकान्तसे कहने लगे कि हे शुद्धात्मन्! तुमने पुराणश्रवणादिसे जो पुण्य अर्जित किया है, उसके कारण परात्पर गजाननदेवने तुम्हारा स्मरण किया है। उन्हींकी आज्ञासे हम दूत लोग पवित्र कीर्तिवाले तुमको ले जानेके लिये विमान लेकर आये हैं। अब तुम उस उत्तमोत्तम गणपतिलोकके लिये प्रस्थान करो। उन गजाननका दर्शन करके तुम जन्म- मरणसे मुक्त हो जाओगे और वहाँ गणपतिदेवके समीप जाकर उनके अनुग्रहसे तुम आत्यन्तिक सुख प्राप्त करोगे ॥ २२-२५ ॥ दूतोंकी वे बातें सुनकर राजाको देहका भान न रहा और सारा शरीर रोमांचित हो गया। वे गद्गद वाणीमें बोले—'हे निष्पाप दूतो! चराचर विश्वकी सृष्टि करनेवाले, निर्गुण, गुणोंको [सृष्टिहेतु] क्षुब्ध करनेवाले, विश्वके प्रधान कारण, दीनरक्षक, परात्पर उन गजाननदेवने कृपापूर्वक मेरा स्मरण किया है। ब्रह्मा आदि देवगण तथा सनक आदि परमर्षिगण ध्यानावस्थित होकर भी जिनका स्वरूपसाक्षात्कार नहीं कर पाते और जो अनन्त गुणोंसे परिपूर्ण हैं, उन्होंने मेरे लिये यह उत्तम विमान भेजा है ॥ २६-२८१/२ ॥ जो परम मायावी, नानाविध अवतार धारण करनेवाले तथा अनेकानेक रूपोंवाले हैं, उन गजाननदेवने मेरा