श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 633, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१५२] * अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना * ६३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
किसलिये स्मरण किया, यह बात आश्चर्यजनक है?' ॥ २९१/२ ॥ राजाने इस प्रकार [दूतोंसे] कहकर महर्षि भृगुको नमस्कार किया और उनसे कहा—[हे मुनीश्वर!] आपके अनुग्रहके कारण और आपकी आज्ञासे अब मैं गजाननके विमानपर आरूढ़ होकर दूतोंके साथ प्रस्थान कर रहा हूँ, आप [कभी] मेरा विस्मरण नहीं कीजियेगा ॥ ३०-३१ ॥ सूतजी बोले-राजाके कथनको सुनकर सम्भ्रमविह्वल महर्षि भृगुके नेत्र आनन्दाश्रुपूरित हो गये, उनका शरीर रोमांचित हो उठा। भृगुजीने राजाको कण्ठसे लगा लिया और कहने लगे- 'हे नृपते! मैं बड़ा ही भाग्यहीन ब्राह्मण हूँ। तुमने उत्तम पुण्यफल प्राप्त किया है। गणेशलोकमें पहुँचकर मुझको कभी भूल मत जाना' ॥ ३२-३३ ॥ इस प्रकार [अपने-अपने मनोभावोंको एक-दूसरेसे] कहकर राजा सोमकान्त और महर्षि भृगु एक-दूसरेका हाथ पकड़े हुए [आश्रमसे] बाहर निकले। [तदुपरान्त] परमप्रसन्न राजाने उन मुनिवर भृगुको नमस्कार किया और दूतोंके कथनके कारण उतावले-से होकर उस विमानमें आरूढ़ हो गये। [राजाकी पत्नी] सुधर्मा तथा [राजाके अनुगामी] दोनों अमात्य भी उस उत्तम विमानपर आरूढ़ हुए। इसके बाद वे दूत भी विमानमें आरूढ़ हो गये। [विमानमें बज रहे] वाद्योंके घोषने दिग्दिगन्तको व्याप्त कर लिया। विमानकी शोभाको देखकर राजा सोमकान्त आनन्दमग्न हो गये ॥ ३४-३६ ॥ राजा सोचने लगे कि यह अवसर मुझे जन्मान्तरीय पुण्यके ही कारण प्राप्त हुआ है। इसके अनन्तर महर्षि भृगुके देखते-देखते विमान आकाशमें उड़ चला ॥ ३७ ॥ इस पार्थिव शरीरसे सर्वोत्कृष्ट पदकी प्राप्तिको देखकर राजा अत्यन्त विस्मित हुए और दूतोंको प्रणाम करके उस परम-धामकी ओर चल पड़े ॥ ३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'सोमकान्तको विमानप्राप्तिका वर्णन' नामक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५१ ॥
एक सौ बावनवाँ अध्याय अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना और उसी प्रसंगमें राजा सोमकान्तके ऊपर हुए गणपति-अनुग्रह आदिका वर्णन करना
सूतजी बोले-[विमानमें बैठे हुए] राजा सोमकान्तने ऊपरसे ही अपनी राजधानी देवपुरका अवलोकन किया और वहाँके मुख्यद्वार, अट्टालिका आदिकी स्वर्णिम कान्तिको देखकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥ तदुपरान्त [महारानी] सुधर्माने रमणीय सभाभवनको देखकर अपने पुत्रका स्मरण किया और स्नेहके कारण गद्गद वाणीसे कहने लगीं- 'मेरा पुत्र हेमकण्ठ भद्रासन-पर बैठा होगा और आज वर्षभरकी अवधि पूर्ण होनेसे वह हम माता-पिताकी प्रतीक्षा कर रहा होगा। हे स्वामिन्! हे कृपानिधे! आपको [वहाँ जाकर] उसे अवश्य ही दर्शन देना चाहिये।' तब पत्नीकी ऐसी बातको सुनकर राजा चिन्तित हो उठे ॥ २-४ ॥ राजा बोले-मेरा पुत्र हेमकण्ठ पता नहीं इस समय जीवित होगा या मर चुका होगा। मैंने उससे कहा था कि वर्षभरके बाद तुम मुझे देख सकोगे। मैंने कभी असत्य भाषण नहीं किया, किन्तु इस असत्यसे बचकर अब कैसे निकलूँ? इस समय न तो मैं [पुत्रके पास] जा पा रहा हूँ और न ही परमपद (गणपतिधाम)-को त्यागनेमें ही सक्षम हो पा रहा हूँ। ये दोनों बातें अर्थात् परमधामगमन और पुत्रसे भेंट-परस्पर विरोधी हैं, अतः इन दोनोंका साथ-साथ पूर्ण होना कठिन है-ऐसा [कहते हुए] राजा फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ५-६१/२ ॥ उन दोनों (राजा-रानी)-को शोकाकुल देखकर दूत उन नृपश्रेष्ठसे कहने लगे- [राजन्!] आप दोनोंका