श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 634, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- रोदन सुनकर हमको बड़ी दया आ रही है। हम लोग अभी क्षणभरमें यहीं विमानको उतार देते हैं, आप अपने पुत्रको देखकर शीघ्रतासे चले आइये। आप लोगों (की समस्या)-का समाधान करके हमें भी अत्यन्त सन्तुष्टि होगी॥ ७-८१/२॥ तदुपरान्त दूतोंने देवपुरके उत्तरी भूभागमें विमानको उतार दिया। गणेशपुराणश्रवणरूप पुण्यके कारण आये उस विमानने अपनी प्रभासे नगरको आच्छादित कर लिया तथा वाद्यध्वनियोंसे उसे गुँजा दिया॥ ९-१०॥ तदुपरान्त [राजाके अमात्य] सुबल और ज्ञानगम्यने राजा तथा दूतोंको नमस्कार किया और [उनसे अनुमति लेकर] उस हेमकण्ठको समस्त वृत्तान्त बतलानेके लिये वहाँ जा पहुँचे॥ ११॥ उन्होंने क्षणभरमें भद्रासनपर विराजमान हेमकण्ठको देखा, जो अमात्यों, नागरिकों एवं सन्नद्ध [अस्त्र- शस्त्रादिसे संयुक्त] महाबली वीरशिरोमणियोंसे घिरा हुआ उत्तम नृत्यका अवलोकन कर रहा था॥ १२१/२॥ तभी हेमकण्ठके मन्त्रियोंकी दृष्टि [सहसा] सुबल और ज्ञानगम्यपर पड़ी। [मन्त्रियोंके संकेतपर] सभी वीर और मन्त्रिगंणसहित हेमकण्ठ उठ खड़ा हुआ। वे सब लोग ज्ञानगम्य और सुबलका आलिंगन करनेके लिये संभ्रमपूर्वक वहाँ जा पहुँचे॥ १३-१४॥ जब उन सभीकी आपसी भेंट-मुलाकात हो गयी, तब परमहर्षित राजपुत्र हेमकण्ठ उनके पास गया और रोमांचित होता हुआ उनसे कहने लगा-'मन्त्रियो ! मेरे माता-पिता सकुशल हैं या नहीं। उन दोनोंको छोड़कर आपलोग अकेले ही यहाँ कैसे चले आये ?' ऐसा कहकर हेमकण्ठने उन दोनोंको उत्तम आसनपर बैठाया और वस्त्र, चन्दन, आभूषण, फल, ताम्बूल, सुवर्ण आदिसे पूजन किया ॥ १५-१७॥ [पूजनके उपरान्त वह पुनः कहने लगा कि] उन दोनों (माता-पिता)-के न होनेके कारण मेरे प्राण सर्वदा कण्ठमें ही अटके रहते हैं। मैं रातों-दिन उन्हींके बारेमें सोचा करता हूँ, उनके अतिरिक्त और कोई बात मेरे मनमें आती ही नहीं है। मेरे पिताश्रीने मुझसे पहले ऐसा कहा था कि एक बार दर्शन देने अवश्य आऊँगा, अतः वे अपनी उस बातको मिथ्या कैसे होने देंगे ?॥ १८-१९॥ वे दोनों (मन्त्री) बोले-हे नृप ! व्यर्थमें चिन्ता मत करो, तुम्हारे माता-पिता सकुशल हैं। उन दोनोंके पुण्यप्रभावको तीनों लोकोंमें कौन जान सकता है ? ॥ २० ॥ जब आपसे अनुमति लेकर हम चारों लोग (दो मन्त्री, राजा और रानी) नगरसे निकले तो सुकुमार होनेके कारण आपके पिताको अत्यन्त कष्टका अनुभव होने लगा। उनके कमलतुल्य चरण रक्तरंजित हो गये। वे क्षुधासे अत्यधिक पीड़ित रहने लगे, उन महाराजको कन्द, मूल, फलादिसे सन्तुष्टि नहीं होती थी ॥ २१-२२ ॥ आपकी माताकी भी वैसी ही दशा हो गयी। वे दोनों उस समय [सुखपूर्वक] एक डग भी नहीं चल पाते थे। हम सभी बहुत समयतक भटकते रहे, तब हमें एक विशाल और मनोरम सरोवर दिखायी पड़ा। [वहाँका परिसर] वृक्षों तथा लताओंके कारण [अत्यन्त] शीतल था। अतः महाराज वहीं विश्राम करने लगे और रानी सुधर्मा थकी होनेपर भी उनके पैर दबाती रहीं ॥ २३-२४ ॥ [इधर जब] हम लोग कन्द-मूल आदि लेनेके लिये निकले हुए थे, इसी बीचमें वहाँपर मुनीश्वर च्यवन जल लेनेके लिये आये और उन्होंने दोनों (महाराज एवं महारानी)-को देखा। मुनीश्वरने [बातचीतके द्वारा] उन दोनोंकें हार्दिक अभिप्रायको जाना और अपने आश्रमकी ओर चले गये। तबतक बहुत-से कन्द-मूल-फलादिको लेकर हमलोग भी लौट आये ॥ २५-२६ ॥ [इसके उपरान्त च्यवनमुनिके पिता महर्षि भृगुकी आज्ञासे] हम सभी लोग उनके आश्रममें गये, जहाँ मुनिने हमारा प्रचुर सत्कार किया। [उन लोगोंने] हमें षड्रसयुक्त भोजन कराया, जिससे हमें अत्यधिक विश्राम मिला। इसके उपरान्त महर्षि भृगु और महाराज सोमकान्त परस्पर बातचीत करने लगे। तब महाराजने अपना समस्त वृत्तान्त उन मुनिवरको सुना दिया ॥ २७-२८ ॥ तदुपरान्त मुनिवर ध्यानके द्वारा [जान करके] उनका पूर्वजन्म बतलाने लगे और करुणावश होकर [पूर्वजन्मके] पाप तथा उसकी शान्तिका उपाय भी उन्होंने बतलाया। हे नृप ! राजाके [पूर्वजन्मके] पापको सुनकर हम लोग भयभीत हो उठे और महाराज