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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 635, कुल 656 में से

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पृष्ठ 635

क्री०ख०-अ०१५२ ]* अमात्योंका राजसभामें जाकर हेमकण्ठको राजाके आगमनकी सूचना देना * ६३३ सत्यताके विषयमें] सन्देह करने लगे। वे उसपर सन्देहपूर्वक विचार कर ही रहे थे कि तभी उनके शरीरसे श्वेत वर्णके पक्षी निकले और वे राजाको नोचने लगे। उनके चंचुप्रहारसे महाराज व्याकुल होकर गिर पड़े तथा 'रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये'-इस प्रकार मुनिसे प्रार्थना करने लगे। राजाकी प्रार्थनाको सुनकर मुनिने कृपापूर्वक उनकी ओर देखा। मुनिके अवलोकनमात्रसे क्षणभरमें वे पक्षी अन्तर्धान हो गये॥ २९-३२॥ तदुपरान्त महाराज अंजलि बाँधकर मुनिके समक्ष बैठ गये और कृपानिधि भृगुमुनिने राजाके महापापको जान लेनेके उपरान्त उनको भक्तिभावसे एक वर्षपर्यन्त गणेशपुराणका श्रवण कराया ॥ ३३१/२॥ मुनिने सर्वप्रथम गणपतिके एक सौ आठ नामोंसे अभिमन्त्रित जल राजाके ऊपर छिड़ककर अपनी तपस्याके प्रभावसे राजाके शरीरसे एक ऐसे भयानक पुरुषको बाहर निकाला, जिसके केश आकाशतक लम्बे थे, जिह्वा लटक रही थी और जो भूखसे अत्यन्त पीड़ित था॥ ३४-३५॥ उसने भृगुमुनिसे भोजनकी याचना की, तो मुनिने कहा कि यह जो सामने सूखा हुआ विशाल आम्रवृक्ष है, तुम उसीका भक्षण करो। तब जैसे ही उस पुरुषने आम्रवृक्षका स्पर्श किया, वैसे ही वह क्षणभरमें भस्म हो गया। उसके बाद [जब धीवररूपधारी पापपुरुषने पुनः भोजन माँगा तो] मुनिने धीवरसे कहा कि इसे (भस्मको) ही खाओ। तब वह पुरुष मुनिके भयके कारण उसी भस्ममें विलीन हो गया ॥ ३६-३७॥ इसके बाद मुनिने राजासे कहा- हे भूमिपाल ! पुराणश्रवणके इस महान् पुण्यको [जलरूप प्रतीकके माध्यमसे] तुम वृक्षकी भस्ममें तबतक प्रतिदिन डालते रहो, जबतक कि भस्मके स्थानपर पहलेके जैसा दूसरा आम्रवृक्ष उत्पन्न न हो जाय। हे राजेन्द्र! ऐसा होते ही तुम दिव्य शरीरवाले हो जाओगे॥ ३८-३९॥ दोनों मन्त्रियोंने कहा- हे नृप! [मुनिने जैसा कहा था,] महाराजने वैसा ही किया। वे प्रतिदिन स्नान करके बहुत देरतक कथाश्रवण करते और इसके बाद भक्तिपूर्वक वह पुण्यफल उस भस्ममें डाल देते। जब ऐसा करते-करते एक वर्ष बीत गया और गणेशपुराणकी कथा भी पूर्ण हो गयी, तो वहाँ पहलेकी भाँति फूलों- फलोंसे लदा हुआ एक वृक्ष उत्पन्न हो गया तथा महाराज भी दिव्य कान्तिसे समन्वित और सूर्य-चन्द्रमाके समान तेजोमय हो गये॥ ४०-४११/२॥ [इस प्रकारके दिव्य नैरोग्यलाभके कारण कृतज्ञतावश] जबतक महाराज मुनिका स्तवन करते अर्थात् उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते, तबतक एक विमान वहाँपर आया। उसमें नृत्य-गान हो रहा था और वह वाद्योंकी ध्वनिसे गूँज रहा था। गणेशजीके दूतोंसे युक्त वह विमान आश्रमके निकट आ पहुँचा। हे नाथ! उस विमानकी शोभाका अवलोकन करके हम दोनोंके नेत्र सफल हो गये॥ ४२-४३१/२ ॥ आपके पिताके पुण्योंकी अधिकताके कारण गजाननदेवकी आज्ञासे उन दूतोंने आपके पिता महाराज सोमकान्तको विमानमें बैठा लिया और महाराजके संकेतसे दूतोंने हमलोगोंको भी प्रसन्नतापूर्वक विमानमें बैठाया। महारानी सुधर्मा भी भृगुमुनिसे आज्ञा प्राप्तकर विमानमें आरूढ़ हो गयीं ॥ ४४-४५॥ [गणपतिधामको जाते समय मार्गमें] जैसे ही देवपुर दिखायी पड़ा, [आपके माता-पिताको] वैसे ही आपका स्मरण हो आया। हे नृप! इसीलिये नगरके उत्तरी भूभागमें विमानको उतारा गया है। आपके माता-पिता आपको देखना चाहते हैं, इसीलिये हमलोग आपको बतानेके लिये यहाँ आये हैं। उनके दर्शनार्थ आप शीघ्र चलिये, अन्यथा वे लोग चले जायँगे ॥ ४६-४७॥ उन (मन्त्रियों)-की ऐसी बातें पूर्णरूपसे सुनकर राजाको रोमांच हो आया, वह रोने लगा और अपने माता-पिताको देखनेकी उत्कण्ठाके कारण मन्त्रियोंको आगे करके त्वरापूर्वक वह दौड़ने लगा। नागरिकों और सेवकोंसे घिरा, आँसू बहाता हुआ तथा गिरते हुए आभूषणोंवाला वह हेमकण्ठ गणेशजीके दूतोंसे युक्त विमानके समीप क्षणभरमें जा पहुँचा ॥ ४८-४९॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'हेमकण्ठदर्शन' नामक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५२॥