भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 636, कुल 656 में से

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पृष्ठ 636

६३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ तिरपनवाँ अध्याय राजा सोमकान्तका विमानसे उतरकर पुत्र तथा नागरिकोंसे मिलना और उन सभीके साथ गणपतिलोकको जाना

सूतजी बोले—राजाके वे चारों अमात्य महाराज सोमकान्तके सामने उपस्थित हुए और [वहाँ विद्यमान] सभी लोगोंको प्रणामकर कहने लगे—हे नृप! आपका पुत्र आया हुआ है। समस्त वीरों और नागरिकोंसे वह वैसे ही घिरा है, जैसे इन्द्र देवताओंसे घिरे रहते हैं। उसने हर्ष तथा विषाद दोनों ही भावोंसे विमानको देखा है॥ १-२॥

इस प्रकार जबतक अमात्योंने सोमकान्तसे निवेदन किया, तबतक वह हेमकण्ठ भी बालक, स्त्री, वृद्ध तथा सेवकादिसे घिरा हुआ त्वरापूर्वक वहाँ आ पहुँचा। विमानकी शोभाका अवलोकनकर वे सभी (नगरवासी आदि) आनन्दविह्वल हो गये। वहाँपर महाराज सोमकान्त अपनी सुन्दरी पत्नी और गणपतिके दूतोंके साथ बैठे थे। उस (विमान)-के मध्यभागमें अवस्थित सोमकान्तको देखकर उन्होंने (हेमकण्ठ आदिने) पृथ्वीपर मस्तक रखकर प्रणाम किया। तब यानसे उतरकर सोमकान्तने प्रीतिपूर्वक पुत्रका आलिंगन किया॥ ३-५॥

वे दोनों (पिता-पुत्र) प्रसन्नताके आँसू बहाते हुए रोमांचित हो रहे थे और क्षणभरके लिये तो उन्हें शरीरका भानतक न रहा। वे आपसमें कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे॥ ६॥

वर्षभर बाद मिले पुत्रसे पिता सोमकान्त स्नेहपूर्वक कहने लगे कि [वत्स!] मेरे वंशको विभूषित करनेवाले तुझ सत्पुत्रका ही मैं नित्य चिन्तन करता था। लोगोंके बहुत-से पुत्र हैं, किंतु उनमें मैं तुम्हारे जैसा एक भी पुत्र नहीं देख पाता। इसी बीचमें स्नेहमयी रानी सुधर्मा दौड़ती हुई पुत्रके निकट आ पहुँचीं। रानीने वात्सल्यपूर्वक पुत्रका आलिंगन किया। उस समय माता और पुत्रकी आँखोंसे आँसू झर रहे थे। माताने पुत्रसे कहा—बालक! लम्बे समयके बाद तुमको देख सकी हूँ॥ ७-९॥

मेरा मन तुम्हारे लिये उत्कण्ठित रहता था, इसलिये मुझे तनिक भी सुखका अनुभव नहीं होता था। इस समय तुम्हारा मुख देखकर मेरा मन आह्लादित हो गया है। [देखो!] तुम्हारे वियोगके कारण मैं कितना अधिक दुर्बल हो गयी हूँ॥ १०१/२॥

इसके उपरान्त नगरवासियों तथा नामधारक अर्थात् सेनाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष आदि विभिन्न पदोंपर अधिष्ठित राजकीय कर्मचारियोंने राजाका आलिंगन किया। उस समय उनमें कुछ लोग राजाकी परिक्रमा कर रहे थे, कुछ लोग चरणस्पर्श करने लगे और कुछ उनका दर्शन करके ही नगरकी ओर लौट गये॥ ११-१२॥

इसके उपरान्त राजाने उन सभीसे कहा कि भृगु मुनिने कृपा करके जो मुझे पापनाशक गणेशपुराण सुनाया है, उससे मैं पापहीन तथा दिव्य देहवाला हो गया और अब विमानके द्वारा [गणपतिधामको] जा रहा हूँ। [मैं आप सबको देखना चाहता था और गणेशजीकी कृपासे] मैंने सबको देख भी लिया, अब मैं विमानपर आरूढ़ होकर जा रहा हूँ॥ १३-१४॥

हे पुत्र! मैंने स्वेच्छानुसार राज्य तथा सम्पत्तियोंका उपभोग किया। कृपालु गणपतिने मेरे निमित्त भूतलपर विमान भेजा। अब मैं [कृतकृत्य होकर] भृगुमुनिके अनुग्रहसे परमधामको जा रहा हूँ॥ १५१/२॥

जब उन लोगोंने सोमकान्तके द्वारा कही गयी ये बातें सुनीं तो वे सभी उच्चस्वरसे रोने लगे और कुछ लोग तो [शोकवश] भूमिपर गिर पड़े। तदुपरान्त [नगरके] प्रमुख व्यापारी एवं गणमान्यजन दयानिधि राजा सोमकान्तसे कहने लगे—'हे जगतीपाल! हमलोगोंके बिना आप उस परमधामको क्यों जा रहे हैं? हे नृप! [यदि आप ऐसा करेंगे तो] हम सभी लोग प्राण त्यागकर आपके पीछे-पीछे चले आयेंगे। ऐसी दशामें हमारी हत्याका पाप आपके सिरपर आयेगा। हमारे पास वैसा पुण्य तो है नहीं कि हम गणेश्वरका दर्शन कर

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