भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 637, कुल 656 में से

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क्री०ख०-अ०१५३ ] * राजा सोमकान्तका विमानसे उतरकर पुत्र तथा नागरिकोंसे मिलना * ६३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सकें, किंतु आप यदि कृपा करें तो हमलोग भी गणपति- देवके उत्तम लोकको प्राप्त कर सकेंगे। इस संसारमें तो तनिक भी सुख नहीं है, अपितु व्यर्थमें ही यहाँ आयुका नाश होता रहता है। इसके अतिरिक्त, हम लोगोंसे कोई साधना-उपासना भी तो नहीं हो सकती, जो गणपतिधामकी प्राप्तिका साधन बन सके' ॥ १६-२०१/२ ॥ इसके बाद हेमकण्ठ भी अपने पिता राजा सोमकान्तसे आदरपूर्वक कहने लगा—हे तात! अपने बालकको छोड़कर गजाननके दर्शनार्थ आप किसलिये जा रहे हैं ? मेरा राज्यसे क्या प्रयोजन हो सकता है, मैंने तो केवल आपकी आज्ञासे वर्षपर्यन्त समग्र राज्यका परिपालन किया। अब मेरी भी राज्य करनेकी इच्छा नहीं है। राजन् ! अब मेरी भी आपको शपथ है, इसलिये आपको मुझे भी साथ ले चलना चाहिये ॥ २१-२३ ॥ सोमकान्तने कहा—हे जनो (नगरवासियो एवं बन्धु-बान्धवो) ! आप सभी लोगोंकी इच्छा गजाननदेवके चरणारविन्दोंको देखनेकी है, किंतु मैं तो स्वयं ही पराधीन हूँ, तब मैं कैसे आपकी इच्छापूर्ति कर सकता हूँ ? आप लोगोंके स्नेहके कारण और विशेषरूपसे पुत्रके प्रति वात्सल्यवश चिन्तित था, इसीलिये ऊपर-ऊपर जा रहे विमानको [आग्रहपूर्वक] उतारकर मैं देखनेके लिये चला आया ॥ २४-२५ ॥ सूतजी बोले—तदुपरान्त (राजाकी बातें सुननेके बाद) नगरनिवासी शोकाकुल हो गये और [स्वयं राजा] सोमकान्त तथा उनका पुत्र हेमकण्ठ—ये दोनों रोने लगे, तब देवदूतों (के मन)-में दया आ गयी। वे राजा सोमकान्तसे कहने लगे—'हे राजन् ! आप धन्य हैं; क्योंकि आपकी प्रजा आपके लिये वैसे ही प्राण न्योछावर कर चुकी है, जैसे कि आपने अपने-आपको जगदीश्वर गजाननको समर्पित किया है। अतः हम गजाननके समीप सबको लेकर शीघ्र ही चलेंगे' ॥ २६-२७१/२ ॥ राजाने कहा—यदि सारे नगरको [गणपतिधाम] ले जाया जा रहा है, तो निश्चय ही मेरी कीर्ति भूतलपर स्थिर रहेगी, ऐसा न होनेपर [कीर्ति भी] नहीं रहेगी ॥ २८१/२ ॥ सूतजी बोले—ऐसा कहनेके बाद राजाने गणेशपुराणके श्रवणका जो पुण्यफल था, उसे दूतोंकी आज्ञासे [धाम जानेके इच्छुक] लोगोंके हाथोंमें जलके रूपमें छोड़ दिया। जैसे ही [पुण्यफलका प्रतीकरूप] जल उनके हाथोंमें गिरा, वैसे ही वे लोग पापोंसे रहित तथा पुण्यशाली हो गये ॥ २९-३० ॥ तदुपरान्त स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध सभी लोग उस उत्तम विमानपर आरूढ़ हुए और वे गणपतिदूत ऊपर (आकाश-) मार्गसे चल पड़े। उस समय कुछ ऐसे पापात्मा भी थे, जिन्होंने हाथमें जल नहीं लिया। वे पुनः नगरको लौट गये और जो लोग वहाँ बचे थे, उनसे सारा समाचार कह सुनाया। तब उन [बचे हुए] लोगोंने ऊपर आकाशमें जाते हुए विमानका बहुत [उत्कण्ठावश] अवलोकन किया ॥ ३१-३२१/२ ॥ इसके उपरान्त [गये हुए लोगोंके] धनको पाकर सन्तुष्ट हुए वे शेष नागरिक परस्पर वार्तालाप करने लगे और प्रसन्न चित्तसे नानाविध क्रियाकलापोंमें निरत हो गये। [विमानमें आरूढ़ कुछ लोग] भागना चाह रहे थे, उन्हें गणपतिदूतोंने दण्डसे ताड़ित करते हुए पकड़ लिया और बलपूर्वक विमानके भीतर बैठा दिया। यह बड़े कौतुककी बात थी ! जो लोग भाँति-भाँतिके बहाने बनाकर निकल पड़े थे, उन्हें भी दूतोंने वैसे ही बैठा दिया ॥ ३३-३५ ॥ विमानके मध्यभागमें राजा सोमकान्त, पत्नी सुधर्मा और पुत्र हेमकण्ठ आदि विराजमान हुए, उनके चारों ओर अमात्यगण तथा [यथास्थान] सुखपूर्वक नागरिक बैठे। वे लोग 'मयूरेश ! तुम्हारी जय हो, मयूरेश ! तुम्हारी जय हो' इस प्रकारका जयघोष कर रहे थे। वहाँ अप्सराएँ नाच रही थीं, देववाद्य बज रहे थे और इसके कारण दिशामण्डल प्रतिध्वनित हो रहा था ॥ ३६-३७१/२ ॥ अतिशय वेगपूर्वक वे सभी गणपतिके मंगलमय धाममें जा पहुँचे और वहाँकी सुन्दरताको निहारते