श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 638, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें६३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- हुए विस्मयपूर्वक कहने लगे—'अहो! इन (महाराज सोमकान्त)-का महान् पुण्य है, जिसके कारण हम गजाननदेवका साक्षात्कार कर सके।' [गणपति- धाममें गये हुए] उन सभी लोगोंने सामीप्यमुक्ति प्राप्त की और राजाको [गणपतिका] सायुज्य प्राप्त हुआ॥ ३८-३९१/२॥ सूतजी बोले-हे विप्रो! इस प्रकारसे मैंने गणेशपुराणकी कथा आप लोगोंको सुनायी, जो श्रवण की जानेपर सभी लोगोंके पापोंका ध्वंस कर देती है। हे विप्रो! अब उसे सुनो, जो राजाने [विमानमें] देवदूतोंसे पूछा था। मैं उस समस्त कथानकका आप लोगोंसे वर्णन करता हूँ॥ ४०-४१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'सोमकान्तको देवपदकी प्राप्तिका वर्णन' नामक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १५३॥ एक सौ चौवनवाँ अध्याय राजाके पूछनेपर गणपतिदूतोंका काशीमें स्थित विनायकोंके आवरणोंका क्रमिक वर्णन ऋषिगण बोले-हे अनघ! विमानमें बैठे हुए राजा सोमकान्तने [दूतोंसे] क्या पूछा था, उसे हम सभी सुनना चाहते हैं, अतः वह सब हमें पूर्णरूपसे बतलाइये॥ १॥ सूतजी बोले-हे अनघ ऋषियो! आकाशमार्गसे जाते हुए महामना नरेशने दूतोंसे महात्मा गणेशके वाराणसीमें स्थित परिवारों (आवरणों)-के नामोंको जानना चाहा था। उनका आप लोग श्रवण कीजिये॥ २१/२॥ राजाने कहा-हे दूतो! स्मरणमात्रसे समस्त सिद्धियोंको देनेवाले और विश्वेशके परिवारदेवताओंमें परिगणित गणपतिविग्रहोंके बारेमें आपलोग कृपापूर्वक मुझको सम्पूर्ण रूपसे बतलाइये॥ ३१/२॥ दूत बोले-हे राजन्! समस्त भयोंको दूर करनेवाले और विश्वेश्वरके परिवारदेवताओंके रूपमें परिगणित गणपतिविग्रहोंके विषयमें हम बता रहे हैं; आप श्रवण कीजिये॥ ४१/२॥ [वाराणसीको आवृतकर स्थित गणपतिके सात आवरणोंमें अन्यतम] प्रथम आवरणके अन्तर्गत दुर्ग- विनायक, अर्कविनायक, भीमचण्डीविनायक, देहली- विनायक, उद्दण्डविनायक, पाशपाणिविनायक, खर्व- विनायक तथा सिद्धिप्रद सिद्धिविनायक—ये आठ विनायक हैं॥ ५-६१/२॥ द्वितीय आवरणमें लम्बोदर विनायक, कूट- दन्तविनायक, शूलटंकविनायक, चौथे कूष्माण्डविनायक, पाँचवें मुण्डविनायक, विकटद्विजविनायक, राजपुत्र- विनायक तथा अन्तिम प्रणवविनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं॥ ७-८१/२॥ तृतीय आवरणमें वक्रतुण्डविनायक, एकदन्तविनायक, त्रिमुखविनायक, पंचमुखविनायक, हेरम्बविनायक, विघ्नराजविनायक, वरदविनायक तथा मोदकप्रिय विनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं॥ ९-१०१/२॥ चतुर्थ आवरणमें अभयप्रद विनायक, सिंहतुण्ड- विनायक, कूर्णिताक्षविनायक, क्षिप्रप्रसादविनायक, चिन्तामणिविनायक, दन्तहस्तविनायक, प्रचण्डविनायक तथा उद्दण्डमुण्ड-विनायक—ये आठ विनायक स्थित जानने चाहिये॥ ११-१३॥ पंचम आवरणमें स्थूलदन्तविनायक, कलिप्रिय- विनायक, चतुर्दन्तविनायक, द्वितुण्डविनायक, ज्येष्ठ- विनायक, गजविनायक, कालविनायक तथा मार्गेश- विनायक (नागेश या नागविनायक)—ये आठ विनायक जानने चाहिये॥ १४-१५॥ षष्ठ आवरणमें मणिकर्णिविनायक, आशाविनायक, सृष्टिविनायक, यक्षविनायक, गजकर्णविनायक, चित्रघण्ट- विनायक, सुमंगलविनायक तथा मित्रविनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं॥ १६१/२॥ सप्तम आवरणमें मोदविनायक, प्रमोदविनायक, सुमुखविनायक, दुर्मुखविनायक, गणपविनायक, ज्ञान- विनायक, द्वारविनायक तथा आठवें मोक्षप्रद अविमुक्त-