भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 639, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 639

क्री०ख०-अ०१५५] * गणेशपुराणीय माहात्म्य-निरूपणके प्रसंगमें विविध इतिहास * ६३७ विनायक—ये आठ विनायक स्थित हैं ॥ १७-१८१/२ ॥ इन [आवरणस्थ विनायकों]-के अतिरिक्त भी भगीरथविनायक, हरिश्चन्द्रविनायक, कपर्दीविनायक तथा बिन्दुविनायक आदि अन्य विनायक स्थित हैं। इन सभी विनायकोंका नित्यप्रति स्मरण सभी कामनाओंको फलीभूत करनेवाला है ॥ १९-२० ॥ जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर शुद्ध चित्तसे इनके नामोंका पाठ करता है, उसके किसी भी कार्यमें विघ्न (उपद्रवादि) बाधा नहीं पहुँचाते हैं। हे राजेन्द्र ! भक्तिमान् मनुष्यको चाहिये कि वह विनायकोंके एक-एक नामका उच्चारण करके दूर्वांकुर, तिल, अक्षत तथा शमीपत्रोंसे इनकी पूजा करे ॥ २१-२२ ॥ ऐसा करनेवाला मनुष्य असाध्य कार्योंको भी सिद्ध कर लेगा, उसे सर्वत्र विजय मिलेगी और वह आयुष्य, पुष्टि, धन तथा आरोग्य प्राप्त करेगा ॥ २३ ॥ हे नृप ! जो तुमने पूछा था, वह सब हमने बता दिया है, ऐसा कहकर वे दूत मौन हो गये और प्रसन्नतापूर्वक अपने (गणपतिके) धामको चले गये ॥ २४ ॥ सूतजी बोले—हे विप्रो ! यह जो विश्वेश्वरके आवरणोंके बारेमें आप लोगोंने पूछा था, वह मैंने बता दिया है। अब मैं गणेशपुराणकी फलश्रुतिका वर्णन करूँगा ॥ २५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'छप्पन विनायकोंका वर्णन' नामक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५४ ॥ एक सौ पचपनवाँ अध्याय गणेशपुराणीय माहात्म्य-निरूपणके प्रसंगमें विविध इतिहास एवं ग्रन्थकी फलश्रुति सूतजी बोले—हे द्विजो ! इस पुराणका एक बार भी श्रवण करनेसे जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्ति मिल जाती है। यदि इसे अनेक बार सुना जाय तो उस फलको बता पानेमें शेषनाग अथवा ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं। सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहणके अवसरपर कुरुक्षेत्रतीर्थमें ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे सहस्र भार सुवर्ण देकर मनुष्य जिस पुण्यफलको प्राप्त करता है, वही पुण्यफल उस भक्तिसम्पन्न मनुष्यको इस पुराणके श्रवणसे प्राप्त हो जाता है ॥ १-३ ॥ ब्रह्माजीने सांगोपांग रीतिसे अनुष्ठित और [प्रचुर] दक्षिणावाले समस्त यज्ञ-यागादिके पुण्यफलकी पुराणश्रवणके पुण्यफलसे तुलना की, जिसमें गणेशपुराणके श्रवणका जो पुण्यफल था, वह यज्ञफलकी अपेक्षा अधिक गौरवपूर्ण सिद्ध हुआ। [जब सांगोपांग अनुष्ठान किये गये यज्ञोंके पुण्यफलकी ऐसी दशा है, तो] वहाँपर सभी प्रकारके दान-व्रत आदि पुण्यकर्मोंके फलकी गणनाकी बात ही क्या हो सकती है ! ॥ ४-५ ॥ करोड़ों कन्यादान तथा हजारों गोदान करनेका जो पुण्यफल है, उससे कोटिगुणित अधिक पुण्यफल इस पुराणके श्रवणसे प्राप्त होता है। अंगोंसहित चारों वेदोंके स्वाध्याय-आवर्तनादिका, निरन्तर शास्त्रोंके निरूपण- चिन्तनादिमें तत्पर रहनेका और सत्पुरुषोंकी सेवाका जो पुण्यफल है, उससे करोड़ गुना अधिक पुण्यफल इस पुराणको सुननेसे मिल जाता है ॥ ६-७१/२ ॥ महाभारत तथा समस्त पुराणोंके श्रवणका जो फल होता है, उससे करोड़गुना अधिक पुण्यफल गणेशपुराणके श्रवणसे मिलता है। जिसके भवनमें लिखकर गणेशपुराण स्थापित किया जाता है, वहाँपर राक्षस, भूत, प्रेत, पूतना आदि बालग्रह तथा अन्य ग्रह कभी भी पीड़ा नहीं पहुँचाते। उस घरकी गणेशजी सर्वदा रक्षा करते रहते हैं ॥ ८-१०१/२ ॥ जो मनुष्य एकाग्र चित्तसे इस पुराणका श्रवण अथवा पूजन करता है, उसके दर्शनसे तो पतित जन भी पवित्र हो जाते हैं और वह ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मुनिजनोंका भी आदरणीय हो जाता है ॥ ११-१२ ॥ वह क्रुद्ध हो जाय तो पूरे विश्वको भस्म कर सकता है और सन्तुष्ट हो जाय तो इन्द्रपद प्रदान करनेमें समर्थ है। इस पुराणका नित्यप्रति श्रवण करनेसे