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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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पृष्ठ 630

६२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा सभी अभिलाषाएँ पूर्ण हो | वनकी ओर चल पड़े। जहाँपर कन्द, फलादि सुलभ थे, जाती हैं। इस पुराणको सुननेका अवसर मनुष्योंको | निर्मल जल था। जहाँ वायुकी प्रबलता नहीं थी और न पूर्वकृत पुण्योंके कारण ही मिलता है। सर्वसिद्धिप्रद यह | अग्नि अथवा घामका ही भय था। ऐसे [उत्तम तपः] पुराण दुर्जनको सुनानेयोग्य नहीं है॥ ४९-५०॥ | स्थानपर आसनस्थ होकर एकाग्र चित्तसे व्यासजी भृगुजी बोले—इस प्रकार कहकर व्यासजीने | [गणपतिके] एकाक्षर मन्त्र (गं)-का जप करने लगे। स्वयम्भू ब्रह्माजीको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा | जब तपस्या करते-करते व्यासमुनिके बारह वर्ष बीत गये, करके तपस्याहेतु आज्ञा प्राप्त की, तत्पश्चात् वे उत्तम | तब भगवान् गजानन उनके समक्ष प्रकट हुए॥ ५१-५३॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डके अन्तर्गत 'मुनिविसर्जन' नामक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४९॥


एक सौ पचासवाँ अध्याय

व्यासमुनिको गणपतिदेवका साक्षात्कार और उनसे वरकी प्राप्ति

सोमकान्तने कहा— हे भृगुजी! उन महात्मा व्यासजीके समक्ष गजाननदेव किस रूपमें प्रादुर्भूत हुए, वह सब बतलाइये, क्योंकि उस (के श्रवण)-से पापनाश होता है॥ १॥

भृगुजी बोले— हे भूमिप! जिस प्रकार गजाननदेव व्यासजीके समक्ष प्रादुर्भूत हुए थे, वह सब वृत्तान्त मैं बता रहा हूँ, उसका तुम आदरपूर्वक श्रवण करो। [जिस समय वे प्रकट हुए, उस समय] गजाननदेवने रक्तवर्णकी पुष्पमाला, रक्तवस्त्र तथा रक्तगन्धानुलेपन धारण कर रखा था। सिन्दूरके लेपनके कारण उनका मस्तक अरुणाभ था। कमलके समान नेत्रोंवाले गणपति अनेक सूर्योंके समान प्रतिभासित हो रहे थे। वे [कानोंमें] दिव्य कुण्डल, [बाहुयुगलमें] बाजूबन्द, [मस्तकपर] मुकुट, [हाथोंमें कंकण] तथा [यज्ञोपवीतके रूपमें] शेषनागको धारणकर शोभित हो रहे थे॥ २-४॥

मुनिने जब गणपतिके ऐसे रूपको देखा तो आँखें मूँद लीं, वे भयभीत होकर काँप उठे और मन्त्रका चिन्तन करते हुए मूच्छित हो गये। [जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई] तब गजाननने कहा—'हे मुनिसत्तम! भयभीत मत होइये। हे मुने! जिसका आप अहर्निश चिन्तन करते हैं और जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी अगम्य है, वह मैं तुमको वर प्रदान करनेके लिये तुम्हारे समीप आया हूँ'॥ ५-६ १/२॥

भृगुजी बोले— इस प्रकारकी मधुरवाणी सुनकर मुनिश्रेष्ठ व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए। गजाननदेवके चरणोंमें अपना मस्तक रखकर वे बारम्बार कहने लगे कि मैं धन्य हूँ, मेरे माता-पिता धन्य हैं, मेरी तपस्या धन्य है, यह पृथिवी धन्य है और [तपोवनके ये] वृक्ष धन्य हैं; क्योंकि सर्वरूप, गुणातीत, समस्त प्रपंचके आश्रय, चिदानन्दघन, अनन्त और सभी कारणोंके परमकारण [आप गजानन]-का मैंने साक्षात्कार किया है। वरप्रद गजाननका इस प्रकार स्तवन करके वे उनसे प्रार्थना करने लगे॥ ७-९॥

मुनि बोले— हे देवेश! मेरी समस्त भ्रमबुद्धिको दूर करके आप मुझे अपने प्रति स्थिर भक्तिभाव प्रदान कीजिये। मैं जिस प्रकार अठारह महापुराणोंके प्रणयनमें समर्थ हो सकूँ और आपका भी गुणगान करनेमें सक्षम हो सकूँ, वैसा [कृपापूर्ण] विधान कीजिये। हे अनघ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे हृदयमें निवास कीजिये॥ १०-११ १/२॥

गजानन बोले— वत्स! तुमने जो प्रार्थना की है, वह सब आज ही पूर्ण हो जायगी। व्यास नामवाले मुनिवर! आप सबके मान्य, सभी पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले, अपरोक्षज्ञान (अद्वैतबोध)-से सम्पन्न तथा गुरुओंके भी गुरु होंगे। आप प्रसिद्धि, सद्गुण, कीर्ति तथा श्रीके विषयमें नारायणके तुल्य होंगे। हे मुनीश्वर!