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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 629, कुल 656 में से

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पृष्ठ 629

क्री०ख०-अ०१४९] * ब्रह्माजीके द्वारा व्यासदेवकी जिज्ञासाका समाधान * ६२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] उपासनामें दत्तचित्त रहेंगे। ब्राह्मण भाँति-भाँतिके वेष धारण करके अपना उदर-भरण करने लगेंगे। कुछ क्षत्रिय अपने कुलोचित आचारसे भ्रष्ट होकर भिक्षावृत्तिसे भी जीवननिर्वाह करेंगे। लोग व्रत-नियमादिका अल्पमात्र भी अनुपालन नहीं करेंगे॥ २६-२८॥ पृथ्वीपर रहनेवाले लोग वर्णसांकर्यको जन्म देनेवाले कार्योंको करने लगेंगे और पतिव्रताएँ अपने पातिव्रत्यधर्मसे च्युत हो जायेंगी। सभी [वर्णाश्रमी] लोग म्लेच्छोंके समान पराये धनका अपहरण करनेवाले, दयाशून्य, कुमार्गगामी तथा सर्वदा सत्यसे रहित व्यवहार करनेवाले हो जायेंगे॥ २९-३०॥ भूमिमें सस्य अर्थात् फसल नहीं उगेगी और वृक्ष नीरस हो जायँगे। कन्याएँ पाँच-छः वर्षकी आयुमें ही प्रसव करने लगेंगी। कलियुगमें मनुष्योंकी परमायु सोलह वर्ष होगी अर्थात् उनकी अधिकतम सोलह वर्ष ही जीनेकी अवधि होगी। तीर्थ और देवालय अपने दिव्य स्वरूपको अन्तर्हित कर लेंगे॥ ३१-३२॥ जब इस प्रकार पाप बढ़ने लगेगा और धर्म क्षीण होता जायगा, तो देवगण [यज्ञ-यागादिके अभावमें] भूखों मरने लगेंगे। तब स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कारादि [के माध्यमसे जो हविष्य देवता प्राप्त करते थे, उस]- के अभावके कारण भयाकुल हुए देवगण अनामय गजाननदेवकी शरणमें जायँगे॥ ३३-३४॥ वे सभी विघ्नोंका नाश करनेवाले उन देवेश्वर गजाननका भाँति-भाँतिसे स्तवन और अभिवन्दन करेंगे तथा प्रार्थना करेंगे। देवताओंकी ऐसी प्रार्थनाका पूर्णतः विचार करनेके उपरान्त भगवान् गजानन अवतार ग्रहण करेंगे। उस समय उनके सूपके जैसे कान होंगे और वे धूम्रवर्ण नामसे विख्यात होंगे॥ ३५-३६॥ क्रोधसे मानो जलते हुए भगवान् गजानन तब हाथमें खड्ग लेकर नीलवर्ण अश्वपर आरूढ़ होंगे और अपनी इच्छाके अनुरूप अनेक रूपोंवाली सेनाका निर्माण करेंगे। वे बिना प्रयत्न किये [अपने संकल्पबलसे] बड़े- बड़े अस्त्र-शस्त्रोंको प्रकट करेंगे और सेनाके सहयोग तथा अपने तेजसे उन महाम्लेच्छोंका वध करेंगे। उस

[दायाँ स्तम्भ] समय गजाननदेव उन सारे लोगोंका वध करेंगे, जो म्लेच्छोंके जैसा आचरण कर रहे होंगे॥ ३७-३८ १/२॥ वे देवेश्वर [वनों और] कन्दराओंमें छिपे तथा वनके कन्द-मूल, फल खाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले ब्राह्मणोंको बुलवायेंगे और उन्हें समादृत करके भूमिदान करेंगे तथा समस्त जनताको सत्कर्मनिरत एवं सज्जन बनायेंगे अर्थात् लोगोंको अनुशासितकर नैतिक जीवन जीनेकी शिक्षा देंगे॥ ३९-४०॥ तब (उनके ऐसा करनेपर) सम्पूर्ण विश्व धर्ममर्यादामें आबद्ध हो जायगा और सत्ययुगका प्रारम्भ होगा। गजाननदेव इस प्रकार धूम्रवर्णावतारके द्वारा धर्ममर्यादाकी स्थापना करनेके अनन्तर अन्तर्धान हो जायँगे॥ ४१॥ हे अनघ व्यासजी! इस प्रकार मैंने महात्मा विघ्नेश्वरके चारों युगोंमें होनेवाले नाम तथा रूप तुमको बतलाये और उनके चित्र-विचित्र लीलाकृत्योंका भी सम्पूर्ण रूपसे वर्णन किया, जिनका केवल श्रवण करनेसे भी सभी प्राणी मोक्ष प्राप्त करते हैं॥ ४२-४३॥ गजाननदेवके स्वरूप अन्तहीन हैं, अतः [उनका समग्रतया] वर्णन कर पाना मेरी शक्तिके बाहर है। जिनकी महिमाका वर्णन करनेमें चारों वेद कुण्ठित हो जाते हैं, वहाँ मेरी अथवा मेरे जैसे किसी अन्य व्यक्तिकी तो बात ही क्या है? [हे व्यासजी!] अब आप अनुष्ठानके लिये प्रस्थान कीजिये और मैं भी अपने [सृष्टि-] प्रपंचको सम्हालता हूँ॥ ४४-४५॥ भृगुजी बोले—हे सोमकान्त! ब्रह्माजीके मुखसे सभी पापोंका नाश करनेवाली कथाका श्रवण करके व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए और उनसे कहने लगे॥ ४६॥ मुनि बोले—इस परम अद्भुत आख्यानको सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ। आपका मुझपर बड़ा अनुग्रह हुआ है, मैं धन्य हो गया हूँ; क्योंकि गणपतिचरित्र- मूलक इस कथानकके माध्यमसे आपने मेरे सभी सन्देह दूर कर दिये। इसे बारम्बार सुनकर भी मुझे वैसे ही तृप्ति नहीं मिल रही है, जैसे अमृत कितना ही पिया जाय, तृप्ति नहीं होती॥ ४७-४८॥ इस आख्यानके श्रवणमात्रसे जन्म-जन्मान्तरमें अर्जित